उत्तराखंड में 30 हजार मानचित्रों पर तय होगी आबादी की तस्वीर, 16 साल बाद जनगणना में तकनीक का सहारा
उत्तराखंड में भी जनगणना को लेकर कसरत तेज हो गई है, खास बात यह है कि इस बार जनगणना काफी हद तकनीक पर आधारित होगी.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 2, 2026 at 6:39 AM IST
देहरादून: उत्तराखंड में सालों के लंबे अंतराल के बाद देश में जनगणना की प्रक्रिया एक बार फिर शुरू होने जा रही है. लेकिन इस बार इसका स्वरूप पूरी तरह बदला हुआ होगा. साल 2011 के बाद पहली बार होने वाली यह जनगणना न सिर्फ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित होगी, बल्कि इसके जरिये राज्य की सामाजिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति की एक बेहद विस्तृत और सटीक तस्वीर सामने आएगी. खास बात यह है कि इस बार जनगणना के पहले चरण में मकान सूचीकरण के लिए 30 हजार डिजिटल मानचित्रों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिनके आधार पर आगे की पूरी गणना तय होगी.
34 हजार कर्मी और पूरी तरह डिजिटल प्रक्रिया: राज्य सरकार और जनगणना निदेशालय की तैयारियों के मुताबिक उत्तराखंड में इस विशाल अभियान को सफल बनाने के लिए करीब 34 हजार कर्मियों की तैनाती की जाएगी. ये कर्मी मोबाइल एप के जरिये घर-घर जाकर आंकड़े दर्ज करेंगे. कागज फॉर्म की जगह डिजिटल एंट्री होने से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि आंकड़ों की शुद्धता भी कहीं अधिक होगी. मकान सूचीकरण और हाउस होल्ड एन्यूमरेशन के दौरान हर मकान का भौगोलिक स्थान, उपयोग और संरचना डिजिटल मैपिंग के जरिये दर्ज की जाएगी. यही 30 हजार मानचित्र आगे चलकर पूरी जनगणना की रीढ़ साबित होंगे.
बर्फबारी वाले इलाकों में पहले होगी गणना: उत्तराखंड के भौगोलिक हालात को देखते हुए जनगणना की समय-सारिणी को विशेष रूप से तैयार किया गया है. राज्य के ऊंचाई वाले और बर्फबारी से प्रभावित क्षेत्रों में यह कार्य अक्टूबर से नवंबर के बीच ही पूरा कर लिया जाएगा. इसके तहत कुल 131 गांवों के अलावा तीर्थस्थलों बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में भी जनगणना की जाएगी. इन क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी और रास्ते बंद होने की वजह से समय से पहले गणना करना प्रशासन के लिए अनिवार्य होता है.
पूरे प्रदेश में 2027 में चलेगा अभियान: राज्य के शेष हिस्सों में जनगणना का कार्य देशभर में होने वाली जनगणना के साथ ही किया जाएगा. तय कार्यक्रम के अनुसार 9 फरवरी से 28 फरवरी 2027 के बीच उत्तराखंड के मैदानी और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में जनगणना पूरी की जाएगी. इस दौरान हर नागरिक से व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक जानकारी ली जाएगी.
10 साल नहीं, 16 साल का बनेगा रिकॉर्ड: अब तक जनगणना हर 10 साल में होती रही है, लेकिन इस बार 2011 के बाद सीधे 2027 में आंकड़े सामने आएंगे. यानी प्रशासन के पास 16 वर्षों का अंतराल होगा, जिसका विश्लेषण बेहद अहम माना जा रहा है. अधिकारी न सिर्फ नए आंकड़े जुटाएंगे, बल्कि 2011 की जनगणना से तुलना कर यह भी देखेंगे कि आबादी, शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार में कितना बदलाव आया है.
नीति निर्माण में अहम भूमिका: विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल जनगणना से मिलने वाला यह डेटा आने वाले वर्षों में राज्य की योजनाओं की दिशा तय करेगा. सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेयजल और रोजगार जैसी योजनाएं इन्हीं आंकड़ों के आधार पर बनाई जाएंगी.
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