पटना में RTE से बच रहे बड़े स्कूल, DEO ने दी चेतावनी.. सिर्फ 855 स्कूलों ने अपलोड की क्षमता
पटना में आरटीई के तहत निजी स्कूलों में 25% गरीब बच्चों का निशुल्क दाखिला चुनौतीपूर्ण. 1315 में से 855 स्कूलों ने इनटेक कैपेसिटी अपलोड की.

Published : February 15, 2026 at 2:03 PM IST
पटना: राजधानी पटना में निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट 2009) के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के निशुल्क नामांकन की प्रक्रिया एक बार फिर सुर्खियों में है. सरकार की मंशा है कि हर निजी स्कूल अपनी इनटेक कैपेसिटी स्पष्ट करे ताकि 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब बच्चों को पारदर्शी तरीके से दाखिला मिल सके, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में निजी स्कूल अब भी इनटेक कैपेसिटी बताने से बच रहे हैं. वहीं दूसरी ओर अभिभावकों की ओर से भी सीमित संख्या में स्कूलों को ही प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
855 स्कूलों ने किया इनटेक अपडेट: पटना के जिला शिक्षा पदाधिकारी साकेत रंजन के अनुसार, जिले में कुल 1315 निजी स्कूल संचालित हैं. इनमें से अब तक 855 स्कूलों ने ही ज्ञानदीप पोर्टल पर अपनी इनटेक कैपेसिटी अपलोड की है. यानी करीब 460 स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने अब तक यह जानकारी नहीं दी है. आरटीई के तहत नामांकन के लिए अब तक कुल 4635 आवेदन प्राप्त हुए हैं. इनमें से 2700 से अधिक आवेदनों को क्लीयरेंस मिल चुका है, जबकि कई आवेदन विभिन्न कारणों से रिजेक्ट भी कर दिए गए हैं. डीईओ ने साफ किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से तय नियमों और पात्रता मानकों के आधार पर की जा रही है.
माइनॉरिटी बेस्ड स्कूलों में आरटीई नहीं: डीईओ साकेत रंजन ने यह भी स्पष्ट किया कि माइनॉरिटी बेस्ड स्कूलों को आरटीई के तहत अनिवार्य दाखिले से छूट मिली हुई है. उन्होंने बताया कि मिशनरी स्कूल जैसे संत जोसेफ, संत माइकल, डॉन बॉस्को और मुस्लिम कम्युनिटी से जुड़े कुछ निजी स्कूल आरटीई के दायरे में नहीं आते हैं. ऐसे स्कूलों में आरटीई के तहत गरीब बच्चों का नामांकन अनिवार्य नहीं है. यही कारण है कि इन स्कूलों का डेटा इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया है.

बड़े स्कूल नहीं कर रहे इनटेक अपडेट: उन्होंने यह भी बताया कि जिले के कुछ बड़े और चर्चित स्कूलों ने अब तक अपनी इनटेक कैपेसिटी अपलोड नहीं की है. इसमें डीपीएस जैसे बड़े स्कूलों का नाम भी सामने आ रहा है. विभाग का कहना है कि सभी गैर-माइनॉरिटी निजी स्कूलों के लिए इनटेक कैपेसिटी अपलोड करना अनिवार्य है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कक्षा एक में कुल कितनी सीटें हैं और उनमें से 25 प्रतिशत सीटें आरटीई के तहत गरीब बच्चों के लिए आरक्षित हैं.
50 स्कूलों में आवेदन के लिए डिमांड: डीईओ ने यह भी जानकारी दी कि जिले में निजी स्कूलों की संख्या काफी अधिक है, लेकिन महज 50 के करीब विद्यालय ऐसे हैं जिनमें आरटीई के तहत दाखिले के लिए आवेदन प्राप्त हुए हैं. शेष अधिकांश निजी स्कूलों में अभिभावकों की ओर से कोई खास रिस्पांस नहीं मिल रहा है. इसका मतलब यह है कि गरीब और वंचित वर्ग के अभिभावक भी कुछ चुनिंदा स्कूलों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं. लिट्रा वैली, त्रिभुवन और ज्ञान निकेतन जैसे स्कूलों में सबसे अधिक आवेदन आए हैं. इससे यह साफ होता है कि अभिभावक गुणवत्ता और ब्रांड वाले स्कूलों की ओर ज्यादा आकर्षित हैं, जबकि छोटे निजी स्कूलों में दाखिले के लिए वे आगे नहीं आ रहे हैं.
सोमवार से शुरू होगा एक्शन: डीईओ साकेत रंजन ने बताया कि इनटेक कैपेसिटी अपलोड करने की अंतिम तिथि समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद निजी स्कूलों को रविवार तक का अतिरिक्त समय दिया गया है. उन्होंने कहा कि यदि इसके बाद भी कोई स्कूल इनटेक कैपेसिटी अपलोड नहीं करता है तो सोमवार से कार्रवाई शुरू की जाएगी. ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द करने और उनका यू-डाइस कोड निरस्त करने के लिए प्राथमिक शिक्षा निदेशालय को पत्र भेजा जाएगा. विभाग का मानना है कि बिना इनटेक कैपेसिटी बताए आरटीई का क्रियान्वयन संभव नहीं है और इससे गरीब बच्चों का अधिकार प्रभावित होता है.
25% सीट पर निशुल्क नामांकन अनिवार्य: आरटीई एक्ट 2009 के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों का निशुल्क नामांकन अनिवार्य है. सरकार इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन करती है. डीईओ ने बताया कि प्रति बच्चा लगभग 11000 रुपये सालाना की राशि सरकार संबंधित स्कूल को भुगतान करती है. इसमें बच्चों की फीस, किताब और अन्य शैक्षणिक खर्च शामिल हैं. इसके बावजूद कई निजी स्कूल आरटीई के तहत दाखिला देने से बचने के तरीके खोजते नजर आ रहे हैं.
पिछले सत्र के नामांकन की रिपोर्ट भी ली जा रही: इनटेक कैपेसिटी अपलोड करते समय स्कूलों से यह भी जानकारी मांगी जा रही है कि 2025-2026 शैक्षणिक सत्र में उन्होंने कक्षा एक में कितने नामांकन लिए थे. इसके अलावा 2026-2027 सत्र के लिए उनकी इनटेक कैपेसिटी कितनी होगी, यह भी पूछा जा रहा है. लेकिन विभागीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि बड़ी संख्या में स्कूल अपने पुराने नामांकन के मुकाबले मौजूदा इनटेक कैपेसिटी काफी कम दिखा रहे हैं. जहां पिछले शैक्षणिक सत्र में 100 से अधिक बच्चों का नामांकन हुआ था, वहीं अब वही स्कूल अपनी इनटेक कैपेसिटी 30 से 50 के बीच बता रहे हैं. गिने-चुने ही कुछ विद्यालय ऐसे हैं जिन्होंने लगभग 200 के करीब अपनी इनटेक कैपेसिटी दिखाई है. विभाग को शक है कि कुछ स्कूल जानबूझकर सीटों की संख्या कम दिखा रहे हैं ताकि आरटीई के तहत कम बच्चों को दाखिला देना पड़े. ऐसे में नामांकन सत्र के बाद स्कूलों का निरीक्षण किया जाएगा की कितने बच्चे वास्तव में नामांकित हुए हैं.
एडमिशन के लिए यह है क्राइटेरिया: आरटीई के तहत कक्षा एक में नामांकन के लिए बच्चों की पात्रता को लेकर भी स्पष्ट मानक तय किए गए हैं. डीईओ साकेत रंजन के अनुसार, कक्षा एक में दाखिले के लिए बच्चों की जन्मतिथि 1 अप्रैल 2018 से 1 अप्रैल 2020 के बीच होनी चाहिए. इसके अलावा सामाजिक और आर्थिक श्रेणी के आधार पर भी आय सीमा तय की गई है. एससी, एसटी, ओबीसी और ईबीसी श्रेणी के बच्चों के अभिभावकों की सालाना आय 1 लाख रुपये या उससे कम होनी चाहिए. वहीं ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लिए अभिभावक की आय 1 लाख से 2 लाख रुपये के बीच, यानी 2 लाख रुपये से कम होनी चाहिए.
इस कारण रिजेक्ट हो रहे आवेदन: आरटीई के तहत प्राप्त आवेदनों की स्क्रुटनी करने वाले कर्मियों ने बताया कि बड़ी संख्या में आवेदन आय प्रमाण पत्र के कारण रिजेक्ट हो रहे हैं. नियम के अनुसार, एससी, एसटी, ओबीसी और ईबीसी वर्ग के अभिभावकों की आय 1 लाख रुपये से कम होनी चाहिए, जबकि ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लिए यह सीमा 2 लाख रुपये से कम तय है. लेकिन अधिकांश अभिभावकों का आय प्रमाण पत्र 1.20 लाख रुपये का बनकर आ रहा है. कर्मियों का कहना है कि यदि आय प्रमाण पत्र 1 लाख से थोड़ा भी अधिक है तो वे उसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि नियमों में इसकी अनुमति नहीं है. इसी कारण कई आवेदन रिजेक्ट हो गए हैं.
आय प्रमाण पत्र बनवाने में हो रही दिक्कत: आवेदन रिजेक्ट होने से नाराज अभिभावकों का कहना है कि अंचल कार्यालय में 1 लाख रुपये से कम का आय प्रमाण पत्र बन ही नहीं रहा है. अभिभावकों के अनुसार, सीओ ऑफिस के अधिकारी यह कहकर 1 लाख से कम की आय नहीं लिख रहे हैं कि पटना सदर इलाके में कोई व्यक्ति 8000 रुपये मासिक वेतन पर गुजारा नहीं कर सकता. इसी वजह से उन्हें मजबूरी में 1.20 लाख रुपये का आय प्रमाण पत्र बनवाना पड़ रहा है, जो आरटीई के मानक में फिट नहीं बैठता. इसका सीधा असर गरीब बच्चों के दाखिले पर पड़ रहा है.
नियमों में रहकर ही आवेदन स्वीकार हो रहे: शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे नियमों के दायरे में रहकर ही आवेदन स्वीकार कर सकते हैं. यदि आय प्रमाण पत्र में तय सीमा से अधिक राशि दर्ज है तो आवेदन को मंजूरी नहीं दी जा सकती. विभाग का तर्क है कि नियमों में बदलाव करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है. हालांकि, यह भी माना जा रहा है कि यदि इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो बड़ी संख्या में गरीब बच्चे आरटीई के तहत निजी स्कूलों में दाखिले से वंचित रह जाएंगे.
गरीब बच्चों को भी निजी स्कूल में पढ़ने का मौका मिले: आरटीई व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि निजी स्कूलों की बेहतर सुविधाओं का लाभ गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को भी मिले. इसके लिए सरकार निजी स्कूलों को आर्थिक मदद भी देती है. लेकिन पटना जिले की मौजूदा स्थिति यह बताती है कि एक ओर स्कूल इनटेक कैपेसिटी कम दिखाकर आरटीई से बचने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर आय प्रमाण पत्र की शर्तें गरीब परिवारों के लिए बड़ी बाधा बन रही हैं. ऊपर से अभिभावकों का झुकाव केवल कुछ बड़े स्कूलों की ओर होने से छोटे निजी स्कूलों में आरटीई सीटें खाली रह जाने की आशंका भी बढ़ गई है.
क्या कहते हैं अधिकारी: डीईओ साकेत रंजन ने कहा कि विभाग की प्राथमिकता यह है कि आरटीई के तहत अधिक से अधिक जरूरतमंद बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिल सके. इसके लिए स्कूलों को अपनी इनटेक कैपेसिटी ईमानदारी से अपलोड करनी होगी.
"जो स्कूल तय समय सीमा के बाद भी डेटा अपलोड नहीं करेंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. इसमें मान्यता रद्द करने और यू-डाइस कोड निरस्त करने की अनुशंसा जैसी सख्त कार्रवाई भी शामिल है."-साकेत रंजन, डीईओ
समस्याओं का हो समाधान: इस स्थिति पर शिक्षाविद प्रोफेसर बीएन प्रसाद कहते हैं कि पटना जिले में आरटीई के तहत नामांकन की प्रक्रिया कई स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रही है. एक तरफ निजी स्कूलों की अनिच्छा और इनटेक कैपेसिटी में हेराफेरी का आरोप है, तो दूसरी तरफ आय प्रमाण पत्र को लेकर सरकारी दफ्तरों की सख्ती गरीब अभिभावकों के लिए परेशानी का कारण बन रही है.

"निजी स्कूलों की अनिच्छा और इनटेक कैपेसिटी में हेराफेरी का आरोप है, तो दूसरी तरफ आय प्रमाण पत्र को लेकर सरकारी दफ्तरों की सख्ती गरीब अभिभावकों के लिए परेशानी का कारण है. यदि इन दोनों समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है और गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने का सपना अधूरा रह सकता है."-प्रोफेसर बीएन प्रसाद, शिक्षाविद
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