बेटे की दिव्यांगता देख बदला मां का मन...खोला ऐसा 'मधुर' स्कूल, जो बदल रहा 'स्पेशल बच्चों' का जीवन
वर्ष 2013 में केवल दो बच्चों से शुरू स्कूल में आज 80 से ज्यादा स्पेशल चाइल्ड निशुल्क पढ़ रहे.

Published : May 28, 2026 at 3:27 PM IST
चूरू: मां के लिए संतान की खुशी सबसे बड़ा सुख होती है. बच्चे की पीड़ा उसे झकझोर देती है. कुछ ऐसा ही हुआ चूरू की अंजू नेहरा के साथ. अपने दिव्यांग बेटे की स्थिति से उबरते हुए सैकड़ों परिवारों की उम्मीद बन गईं. ये ऐसे परिवार हैं, जिनमें विशेष बच्चे हैं. अंजू एक दशक से मधुर स्पेशल शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान चला रही हैं, जहां 80 से अधिक दिव्यांग बच्चों को निशुल्क शिक्षा, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भर बनने की सीख दी जा रही है.
ऐसे बदला जीवन का लक्ष्य: अंजू नेहरा ने बताया कि बेटे मधुर के जन्म के कुछ समय बाद दिव्यांग होने का पता चला. इससे परिवार एक बार सदमे में आ गया. बेटे को विशेष स्कूल में दाखिला दिलाया तो वहां अन्य बच्चों की स्थिति देखकर पीड़ा बढ़ गई. दिव्यांग बेटे का मुंबई में इलाज न हो पाने की हताशा ने अंजू के जीवन का लक्ष्य ही बदल दिया. अंजू ने खुद को संभाला एवं दिव्यांग बच्चों को शिक्षा से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया. स्पेशल बच्चों के लिए मधुर स्पेशल शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान खोला. जहां 13 साल से निशुल्क तालीम दे रही हैं. अंजू आज 80 स्पेशल बच्चों की अभिभावक बन इनका भविष्य संवार रही है.स्कूल खोलने के लिए अंजू ने मुंबई जाकर स्पेशल डीएड कोर्स किया. लौटकर चूरू में निशुल्क स्कूल शुरू कर दिया. शुरुआत आसान नहीं थी. लोगों में जागरूकता की कमी थी. कई परिवारों ने अपने बच्चों को मधुर स्कूल भेजने में हिचकिचाहट दिखाई. अंजू खुद घर-घर जाकर लोगों को समझाती थी कि विशेष बच्चों को भी शिक्षा और प्रशिक्षण की जरूरत होती है. धीरे-धीरे बच्चों में सकारात्मक बदलाव दिखने लगे तो अभिभावकों का भरोसा बढ़ा. आज यह संस्थान जिले में विशेष बच्चों की उम्मीद का बड़ा केंद्र बन चुका है. वर्ष 2013 में केवल दो बच्चों से इस स्कूल की शुरुआत हुई थी.
दिनचर्या से शुरुआत: मधुर संस्थान में मानसिक विमंदित, ऑटिज्म, मल्टीपल डिसेबिलिटी और मूकबधिर सहित हर तरह के दिव्यांग बच्चे पढ़ रहे हैं. संस्थान में स्पेशल एजुकेटर बच्चों को फ्लैश कार्ड और विशेष पद्धतियों से पढ़ाते हैं. संस्थान की शिक्षिका सुदेश और सुमन कंवर ने बताया कि बच्चों को सबसे पहले दैनिक जीवन की जरूरी आदतें सिखाते हैं. जैसे उठना-बैठना, खाना खाना, कपड़े पहनना, बाथरूम का उपयोग और खुद की देखभाल. इसके बाद सामान्य शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण देते हैं. बच्चों को फूलों की माला, पेपर प्लेट बनाना, योग, व्यायाम, खेलकूद, डांस, फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी जैसी गतिविधियों से जोड़ते हैं ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.

अब सामान्य जीवन जीने लगे: अंजू ने बताया कि कई बच्चे ऐसे भी आए, जिन्हें परिजन संभाल नहीं पाते थे. कुछ बच्चों को घरों में बांधकर रखा जाता था. उन्हें शौचालय तक की समझ नहीं थी, लेकिन नियमित प्रशिक्षण और देखभाल के बाद उनमें बड़ा बदलाव आया. कई बच्चे, जो कभी बंधनों में रहते थे, आज सामान्य जीवन जी रहे हैं. संस्थान की मदद से कई परिवारों की परेशानियां कम हुई. अंजू ने बताया कि इस सेवा कार्य में नौसेना से रिटायर्ड पति का बड़ा सहयोग रहा. पति की पेंशन का बड़ा हिस्सा स्कूल संचालन में जाता है. वे व्यवस्था में भी पूरा सहयोग करते हैं.
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जन सहयोग एवं भामाशाहों से सहयोग: संस्थान में करीब 12 जनों का स्टाफ हैं. इनमें स्पेशल शिक्षक, केयर टेकर और अन्य कर्मचारी हैं. बच्चों को लाने-ले जाने के लिए कई वाहन हैं. यहां बच्चों से फीस नहीं ली जाती. स्टडी मटेरियल भी निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है. पूरा संचालन जनसहयोग और भामाशाहों की मदद से चल रहा है. शुरुआती वर्षों में स्कूल के लिए भवन की बड़ी समस्या रही. कई लोग दिव्यांग बच्चों के स्कूल को किराए पर जगह देने से हिचकते थे. कई बार स्कूल की जगह बदलनी पड़ी. बाद में भामाशाह हनीफ खान ने देपालसर में एक बीघा जमीन दान की, जहां संस्थान संचालित है. शिक्षक आशीष के अनुसार, अनुदान के अलावा जन सहयोग से स्कूल चलता है. बच्चों से फीस नहीं लेते हैं.
यहां शिक्षक भी मूकबधिर: इस शिक्षक संस्थान की खास बात है कि यहां मूकबधिर बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक स्वयं मूकबधिर हैं. संचालक अंजू नेहरा का मानना है कि ऐसे बच्चों की भावनाओं और जरूरतों को वही बेहतर समझ सकता है, जिसने खुद उस जीवन को जिया हो. मनोचिकित्सक डॉ. भवानी शंकर कुमावत ने बताया कि मानसिक बीमारियां व्यक्ति के सोचने, समझने और व्यवहार की क्षमता प्रभावित करती हैं. तनाव और अवसाद से बचाव के लिए नियमित व्यायाम, सकारात्मक माहौल और चिकित्सकीय सलाह बेहद जरूरी है. समाज को ऐसे बच्चों और उनके परिवारों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए.



