75 साल के विमलेश शंकर अवस्थी को मिलेगी एमए हिंदू स्टडीज की उपाधि, कानपुर के CSJMU के दीक्षांत समारोह में होंगे सम्मानित
सहपाठियों के बीच दादा जी के नाम से मशहूर विमलेश प्राचीन भारतीय स्पर्श चिकित्सा को वैज्ञानिक धरातल पर लाने के लिए पीएचडी करना चाहते हैं.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : July 4, 2026 at 5:29 PM IST
कानपुर : शिक्षा और सेवा की कोई उम्र नहीं होती, इस बात को सच कर दिखाया है विकासनगर के विमलेश शंकर अवस्थी (75) ने. छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के आगामी दीक्षांत समारोह में विमलेश को एमए हिंदू स्टडीज की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा. सहपाठियों के बीच दादा जी के नाम से मशहूर विमलेश प्राचीन भारतीय स्पर्श चिकित्सा को वैज्ञानिक धरातल पर लाने के लिए पीएचडी करना चाहते हैं, जिसके लिए उन्होंने यूजीसी नेट की परीक्षा भी दी है.
विमलेश शंकर अवस्थी की यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है, क्योंकि उन्होंने एक लंबे अंतराल के बाद अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की है. उन्होंने वर्ष 1972 में हलीम कॉलेज से स्नातक किया था. इसके बाद पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियों के कारण उनकी पढ़ाई में लगभग 51 वर्षों का लंबा गैप आ गया. इस लंबे अंतराल के बाद, 73 वर्ष की उम्र में उन्होंने विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ लाइफलांग लर्निंग एक्सटेंशन से एमए हिंदू स्टडीज कोर्स में दाखिला लिया था.
विमलेश के पिता कानपुर महापालिका के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे, जबकि उनकी माता गृहणी थीं. वह चार भाई हैं. बैंकिंग सेवा में आने से पहले विमलेश का कार्यक्षेत्र अलग था. उन्होंने वर्ष 1971 में जनगणना विभाग में नौकरी की थी, जहां उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें जीनियस वर्कर के रूप में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इसके बाद वर्ष 1974 में वे बैंकिंग सेवा से जुड़े और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से बतौर मैनेजर सेवानिवृत्त हुए.
नौकरी में रहते हुए ही वर्ष 1997 में उन्होंने स्पर्श चिकित्सा सीखना शुरू किया, जिसे वैश्विक स्तर पर या जापान में रेकी के नाम से जाना जाता है. पिछले ढाई दशकों से वे न केवल खुद इस विधा से लोगों का बिना दवा और बिना मंत्र के उपचार कर रहे हैं, बल्कि सैकड़ों शिष्यों को भी इसका प्रशिक्षण दे चुके हैं. उन्होंने अपने पाठ्यक्रम के तहत इफेक्ट ऑफ प्राण हीलिंग ऑन इनसोमेनिया, स्ट्रेस एंड डिप्रेशन विषय पर एक लघु शोध पत्र भी प्रस्तुत किया है.
इस शोध में उन्होंने स्पर्श चिकित्सा के माध्यम से स्वस्थ हुए सैकड़ों मरीजों के केस स्टडीज और प्रामाणिक आंकड़े भी शामिल किए हैं, जो इस विधा की प्रासंगिकता को दर्शाते हैं. चिकित्सा पद्धति के वैज्ञानिक पक्ष को समझाते हुए विमलेश शंकर बताते हैं कि मानव शरीर के किसी अंग में नकारात्मक ऊर्जा का संचय ही बीमारी का मूल कारण है. इस पद्धति में चिकित्सक ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को अपने एक हाथ से ग्रहण कर, दूसरे हाथ के स्पर्श से मरीज के प्रभावित हिस्से में प्रवाहित करता है. कुछ ही दिनों में इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगते हैं. उनका कहना है कि माइग्रेन, अवसाद और अनिद्रा जैसी आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में यह स्पर्श चिकित्सा अत्यंत कारगर और अचूक साबित होती है.
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