70 साल पुराने स्कूल पर ताला, 300 बच्चों की पढ़ाई पर संकट, हाईकोर्ट जाएगा शिक्षा विभाग
देवघर में 70 साल पुराने स्कूल को बंद कर दिया गया है. अब 300 बच्चों की पढ़ाई पर संकट है. हितेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट.

Published : July 9, 2026 at 2:14 PM IST
देवघर: कोर्ट के आदेश के बाद ताले लगाए गए राज्यकृत मध्य विद्यालय जरका चंदना में पढ़ने वाले करीब 300 बच्चों का भविष्य अंधकार में पड़ गया है. बंद पड़े इस विद्यालय को दोबारा खोलने की मांग को लेकर ग्रामीण, अभिभावक और छात्र लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
स्कूल बंद होने से शिक्षा का संकट
बिना ठोस वैकल्पिक व्यवस्था किए स्कूल बंद कर दिए जाने को ग्रामीणों ने बच्चों की शिक्षा के अधिकार के साथ अन्याय बताया है. स्कूल बंद होने के बाद पिछले तीन दिनों से स्थानीय लोग प्रशासन से विद्यालय को पुनः खोलने की मांग कर रहे हैं. हालांकि प्रशासन लोगों को समझाकर शांत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ग्रामीणों का आक्रोश कम नहीं हो रहा है.
बच्चों की पढ़ाई पर असर, वैकल्पिक व्यवस्था नाकाफी
सबसे अधिक चिंता उन करीब 300 बच्चों की है, जिनकी पढ़ाई अचानक प्रभावित हो गई है. विद्यालय के छात्र-छात्राओं निधि कुमारी, सूरज कुमार और राजीव कुमार ने बताया कि शिक्षा विभाग द्वारा की गई वैकल्पिक व्यवस्था उनके लिए व्यवहारिक नहीं है. नए विद्यालय की दूरी अधिक होने के कारण वहां नियमित रूप से पहुंचना कठिन होगा.
बच्चों ने मांग की कि उनका पुराना विद्यालय जल्द से जल्द दोबारा खोला जाए. कुछ छात्रों ने चेतावनी दी कि यदि स्कूल नहीं खुला तो वे जिला प्रशासन और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी करेंगे.

70 वर्ष पुराना स्कूल, कई गांवों का केंद्र
ग्रामीण तारीख अनवर, दिलीप मंडल और पंचानन मंडल ने बताया कि यह विद्यालय करीब 70 वर्षों से संचालित हो रहा है और जरका तथा चंदना पंचायत सहित आसपास के कई गांवों के बच्चे यहीं शिक्षा प्राप्त करते हैं. उनके अनुसार विद्यालय बंद होने से सबसे अधिक नुकसान गरीब और छोटे बच्चों को होगा.
दूरी, जंगल और जंगली कुत्तों का खतरा
ग्रामीणों का आरोप है कि शिक्षा विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था तो की है, लेकिन वह बच्चों के हित में नहीं है. नए विद्यालय की दूरी गांव से करीब ढाई से तीन किलोमीटर है. जहां पहुंचने के लिए जंगल से होकर गुजरना पड़ता है. रास्ते में जंगली कुत्तों का भी खतरा बना रहता है, जिससे छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित हैं.

गांव की महिलाओं ने कहा कि छोटे-छोटे बच्चों को इतनी दूर स्कूल भेजना सुरक्षित नहीं है. उनका कहना है कि जब जंगली कुत्ते बड़ों पर हमला कर देते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा को लेकर डर स्वाभाविक है.
विभाग पर लापरवाही का आरोप
ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि शिक्षा विभाग को पहले से पता था कि भूमि विवाद का मामला उनके खिलाफ जा सकता है और स्कूल खाली करने के निर्देश पहले ही मिल चुके थे, तो समय रहते स्थायी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई. उनका कहना है कि सरकार एक किलोमीटर के दायरे में विद्यालय उपलब्ध कराने की बात करती है, लेकिन यहां वर्षों से संचालित स्कूल को ही बंद कर दिया गया.

जिला शिक्षा अधीक्षक का बयान
पूरे मामले पर जिला शिक्षा अधीक्षक मधुकर कुमार ने स्वीकार किया कि पूर्व के अधिकारियों की उदासीनता के कारण विभाग को अदालत में हार का सामना करना पड़ा. उन्होंने कहा कि यदि समय पर आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत किए गए होते तो संभवतः यह स्थिति नहीं आती. मधुकर कुमार ने बताया कि यह निर्णय निचली अदालत का है और विभाग जल्द ही इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेगा. साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए फिलहाल वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कक्षाएं संचालित की जा रही हैं तथा जल्द ही स्थायी समाधान भी निकाला जाएगा.
क्या होगा बच्चों का भविष्य?
अब चिंता इस बात की है है कि क्या ढाई से तीन किलोमीटर दूर स्थित विद्यालय में छोटे बच्चे नियमित रूप से पढ़ाई कर पाएंगे? क्या अभिभावक सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच अपने बच्चों को वहां भेजने के लिए तैयार होंगे? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या जिला प्रशासन बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जल्द कोई ठोस समाधान निकाल पाएगा?
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