ETV Bharat / state

काशी में श्रद्धा की छांव को मिला विज्ञान का साथ; सुरक्षित होगा बाबा दरबार का प्राचीन पीपल

काशी के अति प्राचीन वृक्षों का धर्म और आस्था से अटूट रिश्ता, जानिए महत्व औऱ इतिहास.

7 old ancient trees varanasi connection kashi vishwanath sankatmochan ravivas mandir story
काशी विश्ववाथ मंदिर के वृक्ष का क्यों हो रहा खास ट्रीटमेंट? (Shri Kashi Vishwanath Temple Trust)
author img

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 26, 2026 at 8:32 AM IST

|

Updated : February 26, 2026 at 4:55 PM IST

5 Min Read
Choose ETV Bharat

वाराणसी: धर्मनगरी काशी का काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Mandir) हिंदू धर्म की बड़ी आस्था का केंद्र है. इस मंदिर में हर वर्ष बड़ी संख्या में भोलेनाथ के दर्शन को आते हैं. इस दौरान वे बाबा के दर्शन के अलावा यहां स्थित अति प्राचीन पीपल के पेड़ की भी पूजा करते हैं. मंदिर परिसर में स्थित इस वृक्ष का आजकल विशेष ट्रीटमेंट किया जा रहा है. आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी और काशी में ऐसे प्राचीन कितने पेड़ हैं, ये सब आपको आगे बताइएंगे. चलिए जानते हैं इस बारे में.


1. काशी विश्वनाथ मंदिर का पीपल क्यों सूख रहा: काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थित पीपल का पेड़ सैकड़ों साल पुराना बताया जाता है. मंदिर प्रशासन के पास इस पेड़ की प्राचीनता के लिखित साक्ष्य तो नहीं है लेकिन इसे अति प्राचीन माना जाता है. यह पेड़ भक्तों की आस्था का भी बड़ा केंद्र हैं. मंदिर आने वाले भक्त इस वृक्ष की भी पूजा अर्चना करते हैं.

आजकल इस वृक्ष के संरक्षण के लिए यहां प्रयास किए जा रहे हैं. इस पवित्र वृक्ष को आगामी 100 से 200 वर्षों तक सुरक्षित और सजीव बनाए रखने के उद्देश्य से वैज्ञानिक तथा पारंपरिक विधियों के समन्वय से उपचार की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है.

वैज्ञानिक क्या बोले: प्रोफेसर एसपी सिंह, डॉ. प्रशांत, डॉ. कल्याण बर्मन, ओम प्रकाश का कहना है कि वृक्ष के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं. बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना की कि इस प्राचीन वृक्ष की कीर्ति और गरिमा बनी रहे. वृक्ष पर औषधियों के साथ नीम के तेल का मिश्रण तैयार कर छिड़काव किया गया. यह संपूर्ण प्रक्रिया जैविक पद्धति से संपन्न की गई. उपचार में लगभग 1200 लीटर गंगाजल तथा त्रिवेणी का जल सम्मिलित किया गया है. इस पेड़ की पवित्रता का पूरा ध्यान रखा गया है.

7 old ancient trees varanasi connection kashi vishwanath sankatmochan ravivas mandir story
काशी विश्ववाथ मंदिर के वृक्ष का क्यों हो रहा खास ट्रीटमेंट? (Shri Kashi Vishwanath Temple Trust.)
आखिर क्यों सूख रहा वृक्ष:
इस बारे में डॉ. प्रशांत ने बताया कि इसकी पत्तियां पूर्णतः पीली हो गई हैं, जो हरितहीनता तथा पोषक तत्त्वों की कमी के स्पष्ट संकेत हैं. सामान्य पत्तियों की तुलना में इस वृक्ष की पत्तियों में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है. यह स्थिति पोषक तत्त्वों के अभाव के पारंपरिक लक्षणों को दर्शाती है. यदि समय रहते उपचार न किया जाए तो भविष्य में गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है. इसी कारण नियमित अंतराल पर वृक्ष का उपचार एवं छिड़काव निरंतर जारी है. कोशिश है कि यह वृक्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आस्था का केंद्र रहे.

2. संकटमोचन मंदिर का पीपल का पेड़ भी अति प्राचीन: बनारस के संकट मोचन मंदिर परिसर में स्थित पीपल का पेड़ करीब 400 से अधिक वर्ष पुराना बताया जाता है. संकट मोचन हनुमान मंदिर की स्थापना 16वीं शताब्दी में संत तुलसीदास ने की थी. कहा जाता है कि इस मंदिर में रहकर उन्होंने रामचरित मानस की रचना की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर हनुमानजी ने इसी स्थान पर तुलसीदास जी को दर्शन दिए थे. मान्यता है कि तुलसीदासजी को यहां हनुमान जी कुष्ठ रोगी के रूप में मिले थे. इसके बाद तुलसीदास जी चित्रकूट चले गए थे.


3. काशी का वटकूप: वाराणसी के धर्मकूप स्थित वट सावित्री वृक्ष आज भी है. यह वृक्ष 300 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है. यहां वट सावित्री की पूजा भी होती है और इस स्थान को धार्मिक दृष्टि से अति पवित्र माना जाता है.


4. सारनाथ का बोधि वृक्ष: सारनाथ स्थित महाबोधि सोसाइटी कि कैंपस के पास मूलगंध कुटी बिहार में बोधि वृक्ष के नाम से मशहूर पीपल का पेड़ लगभग 105 वर्ष पुराना है. श्रीलंका के अनुराधपुर में लगे बोधिवृक्ष की एक शाखा को महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया के तत्कालीन संस्थापक अनागारिक धर्मपाल ने 12 नवंबर 1931 को मंदिर परिसर में लगाया था, जो अब विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है.


5. पिशाचमोचन का नीम वृक्ष: काशी का पिशाच मोचन तीर्थ पिंडदान और पिशाच योनि से मुक्ति के लिए जाना जाता है यहां पर 115 वर्ष पुराना नीम का पेड़ है. 15 दिनों के पितृपक्ष के दौरान इस पर में जल देने और यहां पर श्राद्ध संबंधी अनुष्ठान भी पूरे किए जाते हैं.


6. रविदास मंदिर का नीम वृक्ष: वाराणसी के सीर गोवर्धन में संत रविदास की जन्मस्थली है. यहां एक 600 वर्ष पुराना नीम का पेड़ है जिसके नीचे संत रविदास बैठकर उपदेश हुआ प्रवचन दिया करते थे, आज भी यह पेड़ सुरक्षित है और दूर-दूर से आने वाले रविदास धर्म के लोगों के लिए आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है.

7. कचहरी का बरगद का पेड़: वाराणसी के कचहरी चौराहे पर लगभग 200 वर्ष से भी ज्यादा पुराना बरगद का पेड़ है. जिसमें निकली लताएं इस पेड़ की प्राचीनता की गवाही देतीं हैं. यह पेड़ इस पूरे चौराहे की सुंदरता के साथ अपनी पुरातन स्थिति को स्पष्ट करता है.

ये भी पढ़ेंः काशी में 27 फरवरी को होगा मां गौरा का गौना; पारंपरिक सिल्वर पालकी में निकलेगी झांकी

Last Updated : February 26, 2026 at 4:55 PM IST