पारिस्थितिक संतुलन की दिशा में कदम: केवलादेव से मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व भेजे जाएंगे 500 चीतल
बाघों के प्रे-बेस को मजबूत करने के लिए केवलादेव से 500 चीतल मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व और रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व भेजे जाएंगे.

Published : December 18, 2025 at 6:27 PM IST
भरतपुर: राजस्थान के वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक कदम उठाते हुए, विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (घना पक्षी विहार) से चीतलों को मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व और रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया फिर से शुरू होने जा रही है. सर्दियों के अनुकूल मौसम का लाभ उठाते हुए, कुल 500 चीतलों को दोनों रिजर्व में 250-250 की संख्या में शिफ्ट किया जाएगा.
यह पहल न केवल घना पार्क में बढ़ती चीतल आबादी के कारण उत्पन्न पारिस्थितिक दबाव को कम करेगी, बल्कि राजस्थान के टाइगर रिजर्व में बाघों और अन्य मांसाहारियों के लिए मजबूत शिकार आधार (प्रे-बेस) प्रदान करके बड़े शिकारियों के संरक्षण को नई गति देगी. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है, मुख्य रूप से पक्षी विहार के लिए जाना जाता है. यहां साइबेरियन क्रेन सहित सैकड़ों प्रवासी पक्षी आते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां चीतल (स्पॉटेड डियर) की आबादी तेजी से बढ़ी है.

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बोमा तकनीक का होगा इस्तेमाल: पार्क के निदेशक चेतन कुमार बी.वी. ने बताया कि वर्तमान में यहां करीब 2500 चीतल हैं, जो पार्क की वहन क्षमता (कैरींग कैपेसिटी) से काफी अधिक है. मानसून के कारण पहले यह स्थानांतरण रुका हुआ था, लेकिन अब सर्दी का मौसम इस कार्य के लिए आदर्श है. बोमा तकनीक का उपयोग करके चीतलों को सुरक्षित तरीके से पकड़ा जाएगा और नए आवासों में छोड़ा जाएगा.
क्या है बोमा तकनीक?: बोमा तकनीक दक्षिण अफ्रीका से आयातित एक वैज्ञानिक और मानवीय पद्धति है, जिसमें जानवरों को एक बड़े घेरे (बोमा) में धीरे-धीरे हांककर लाया जाता है. यहां अस्थायी बाड़े बनाए जाते हैं, जहां चीतलों की स्वास्थ्य जांच की जाती है और फिर उन्हें विशेष वाहनों में लादकर नए स्थान पर ले जाया जाता है. इस प्रक्रिया में पशु चिकित्सकों, वन कर्मियों और विशेषज्ञों की टीम पूरे समय मौजूद रहती है, ताकि जानवरों को किसी तरह का तनाव या चोट न पहुंचे. निदेशक चेतन कुमार ने बताया कि यह तकनीक बेहद सुरक्षित है और पहले के स्थानांतरणों में इसका सफल उपयोग हो चुका है.

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पारिस्थितिक संतुलन की अनिवार्यता: किसी भी संरक्षित क्षेत्र में जीवों की आबादी का संतुलित होना आवश्यक है. केवलादेव में चीतलों की अत्यधिक संख्या से घास के मैदान, झाड़ियां और जल स्रोतों पर भारी दबाव पड़ रहा है. चीतल शाकाहारी होने के कारण बड़े पैमाने पर चराई करते हैं, जिससे वनस्पति का अत्यधिक दोहन होता है. इसका सीधा असर मिट्टी की उर्वरता, जलधारण क्षमता और जैव विविधता पर पड़ता है. अन्य शाकाहारी जीवों जैसे सांभर, नीलगाय और पक्षी प्रजातियों के लिए भोजन की प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है. स्थानांतरण से घना पार्क के इकोसिस्टम को राहत मिलेगी और पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण बहाल होगा.
पहले की सफलताएं और आंकड़े: निदेशक चेतन कुमार ने बताया कि यह कोई नई पहल नहीं है. इससे पहले दोनों रिजर्व में कुल 543 चीतल सफलतापूर्वक स्थानांतरित किए जा चुके हैं. इनमें मुकुंदरा में 400 और रामगढ़ विषधारी में 143 चीतल शामिल हैं. ये चीतल नए पर्यावास में अच्छी तरह बस चुके हैं और वहां की जैव विविधता को समृद्ध कर रहे हैं.

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अब तक के स्थानांतरण आंकड़े
- कुल स्थानांतरित चीतल: 543
- मुकुंदरा टाइगर रिजर्व: 400
- रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व: 143
निदेशक ने बताया कि सर्दियों में यह शिफ्टिंग इसलिए चुनी गई है क्योंकि इस मौसम में तापमान मध्यम रहता है, गर्मी या लू का खतरा नहीं होता. बरसात के बाद जंगलों में भरपूर हरियाली और भोजन उपलब्ध होता है, जो नए आए चीतलों के लिए अनुकूल है. मानसून में दलदली भूमि और फिसलन से ऑपरेशन जोखिम भरा हो जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास भारत के टाइगर प्रोजेक्ट को और सफल बनाएंगे और जैव विविधता संरक्षण में मील का पत्थर साबित होंगे.
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