Holi 2026 : धुलंडी पर सोनार दुर्ग में सजा 400 साल पुराना शाही दरबार, गूंजा जयघोष
धर्मांतरण से बचाने के लिए जैसलमेर के सोनार दुर्ग में शुरू की गई शाही दरबार की परंपरा 400 साल से चली आ रही है.

Published : March 3, 2026 at 5:52 PM IST
जैसलमेर: राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर में धुलंडी का पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास को जीवंत करने वाली अद्भुत परंपरा का गवाह बना. विश्वप्रसिद्ध सोनार दुर्ग में मंगलवार को 400 साल पुराना शाही दरबार सजा, जहां पुष्करणा ब्राह्मण समाज के एक युवक को बादशाह बनाया गया. 'बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत' के जयघोष से पूरा किला गूंज उठा.
इस अनोखी परंपरा की पृष्ठभूमि में एक ब्राह्मण की जान बचाने की रोचक कहानी है, जब मुगल काल में एक व्यक्ति को धर्मांतरण के भय से बचाने के लिए उसे शाही तख्त पर बैठा दिया गया था. आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जा रही है, जहां भव्य पोशाक में सजे बादशाह और शहजादे रंग-गुलाल के साथ सदियों पुराने साहस और मानवता के संदेश को जीवंत कर रहे हैं.
पुष्करणा ब्राह्मण समाज की व्यास उपजाति से किसी युवक को बादहशा चुना जाता है. इस वर्ष गिरिराज व्यास पुत्र स्वर्गीय सुरेश व्यास 'भणिया' को समाज ने सर्वसम्मति से 'बादशाह' चुना. भारी मखमली पोशाक, शाही साफा और सिर पर सजा ताज जब वे तख्त पर विराजमान हुए, तो पूरा दुर्ग जयघोष से गूंज उठा- 'बादशाही बरकरार...शहजादा सलामत...'. उनके साथ दो मासूम बालकों को 'शहजादा' बनाया गया, जो पारंपरिक वेशभूषा में दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे.
यह परंपरा केवल एक स्वांग नहीं, बल्कि साहस और चातुर्य की जीवंत मिसाल है. गत वर्षों में बादशाह बने विकास कुमार व्यास और हेमंत व्यास इस परंपरा का इतिहास बताते हुए कहते हैं कि सदियों पहले एक ब्राह्मण धर्म परिवर्तन के भय से भागकर जैसलमेर आया था. उस दिन होली का उत्सव था. दुर्ग के लोगों ने उसकी जान बचाने के लिए एक अनोखी योजना बनाई. उन्होंने उस ब्राह्मण को बादशाह का रूप देकर शाही तख्त पर बैठा दिया. जब उसे खोजते हुए सैनिक वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि जिस व्यक्ति की तलाश थी, वह तो शाही ठाठ में तख्त पर बैठा है. उन्हें भ्रम हुआ कि उसका धर्म परिवर्तन हो चुका है और अब वह स्वयं बादशाह है. सैनिक लौट गए और इस तरह एक होली के स्वांग ने किसी की जान बचा ली. उसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई, जो आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह से निभाई जा रही है.

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पयर्टकों का रहता है जमावड़ा: धुलंडी के दिन सजने वाला यह दरबार न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है. दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए सैलानी जब इस अनूठी परंपरा को देखते हैं, तो भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं. दरबार में पारंपरिक ढोल-चंग की थाप पर फाग गीत गूंजते हैं. साथ ही महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और पुरुष गुलाल उड़ाते हुए शाही अंदाज में दरबार की शोभा बढ़ाते हैं. बादशाह व शहजादे बनने वाले समाज के वरिष्ठजनों का आशीर्वाद लेते हैं और सभी को होली की शुभकामनाएं देते हैं. धुलंडी की दोपहर तक यह दरबार रंगों और जयकारों से सराबोर रहता है. बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सभी इस आयोजन में भाग लेते हैं. विदेशी पर्यटक अपने कैमरों में इस अद्भुत दृश्य को कैद करते नजर आते हैं.
400 साल से चली आ रही परंपरा: पुष्करणा समाज के वरिष्ठ गिरिराज पुरोहित और कैलाश कुमार व्यास ने बताया कि इस आयोजन में किसी प्रकार का राजनीतिक या सामाजिक भेदभाव नहीं होता. यह परंपरा समाज की एकता और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है. व्यास समाज के लोग इसे अपनी आन-बान और पहचान मानते हैं. 400 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी गरिमा के साथ निभाई जा रही है. बदलते समय के साथ जहां कई रीति-रिवाज धूमिल हो गए. वहीं, सोनार दुर्ग का यह शाही दरबार आज भी जीवंत है. यह केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि उस साहस का उत्सव है, जिसने मानवता को बचाने का संदेश दिया.

