'एक सप्ताह में खुद हटाएं कब्जा, वरना निगम तोड़ेगा', अतिक्रमणकारियों को नगर निगम कमिश्नर की सीधी चेतावनी
पानीपत में प्रस्तावित मिनी बाईपास को लेकर नगर निगम ने कार्रवाई तेज कर दी है.

Published : September 1, 2026 at 2:15 PM IST
|Updated : September 1, 2026 at 2:32 PM IST
पानीपत: शहर को जाम से निजात दिलाने के लिए प्रस्तावित मिनी बाईपास को लेकर प्रशासन ने अब कार्रवाई तेज कर दी है. मिनी बाईपास की प्रस्तावित राह में आ रहे अवैध कब्जों और निर्माण को हटाने के लिए नगर निगम ने सख्त रुख अपनाया है. नगर निगम कमिश्नर डॉ. पंकज यादव ने अधिकारियों की टीम के साथ छोटूराम चौक स्थित ड्रेन का मौके पर निरीक्षण किया. इस दौरान डीजीपीएस मशीन से दोबारा पैमाइश कर कब्जों की स्थिति को सत्यापित किया गया.
350 कब्जों को चिह्नित किया गया: नगर निगम कमिश्नर डॉ. पंकज यादव ने मौके पर कहा कि "स्काईपार्क से शुरू होकर मित्तल मेगा मॉल तक शहर के बीचों-बीच मिनी बाईपास बनाने का प्रस्ताव है. इसके रास्ते में ड्रेन की जमीन पर बड़ी संख्या में कब्जे सामने आए हैं. एचएसवीपी अधिकारियों के साथ बैठक के बाद करीब 350 कब्जों को चिह्नित किया गया है."
डीजीपीएस से दो बार कराई पैमाइशः कमिश्नर डॉ. पंकज यादव ने बताया कि "कब्जों की पैमाइश को लेकर किसी तरह का भ्रम न रहे, इसके लिए डीजीपीएस मशीन से दो बार कोर्डिनेट लिए गए हैं. पहले चरण में आठ प्वाइंट के पत्थर लगाए गए थे, जबकि सोमवार को दोबारा मौके पर जाकर सात और प्वाइंट चिह्नित किए गए. दोनों पैमाइश में लगभग एक जैसे परिणाम सामने आए हैं."
राजस्व विभाग की पूरी टीम काम में जुटीः उन्होंने कहा कि "राजस्व विभाग की पूरी टीम को इस काम में लगाया गया है. तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर दो-दो बार जांच कराई जा रही है. निगम की कार्रवाई रिकॉर्ड के आधार पर पूरी तरह पारदर्शी है और जरूरत पड़ने पर संबंधित रिकॉर्ड लोगों के सामने भी रखा जाएगा."

'एक सप्ताह में खुद हटाएं कब्जा, वरना निगम तोड़ेगा': कमिश्नर ने कहा कि "मौके पर मकान मालिकों को बुलाकर डीजीपीएस मशीन के माध्यम से उनके कब्जे की वास्तविक स्थिति बताई जा रही है. एक सप्ताह के भीतर अपने स्तर पर अवैध निर्माण हटाने के लिए कहा जा रहा है. निर्धारित समय में निर्माण नहीं हटाने पर नगर निगम कार्रवाई करेगा और तोड़फोड़ में आने वाला खर्च भी संबंधित कब्जाधारक से वसूला जाएगा." उन्होंने स्पष्ट किया कि "किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की अनुमति भी नहीं दी जा सकती."
रजिस्ट्री और इंतकाल अलग-अलग, रिकॉर्ड से होगी कार्रवाई: कमिश्नर ने कहा कि "रजिस्ट्री और इंतकाल दो अलग-अलग विषय हैं. न्यायालय के विभिन्न आदेशों के मुताबिक केवल रजिस्ट्री को मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, जब तक वह राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज इंतकाल से समर्थित न हो. ड्रेन और सरकारी जमीन की स्थिति राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है."
रिकॉर्ड में छेड़छाड़ पर खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिशः डॉ. यादव ने चेतावनी दी कि "यदि किसी ने राजस्व रिकॉर्ड या इंतकाल में किसी तरह की छेड़छाड़ की है तो इसकी जांच कराई जाएगी. सरकारी जमीन को किसी निजी व्यक्ति के नाम गलत तरीके से दर्ज कराने या रिकॉर्ड में अनधिकृत बदलाव करने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी."
‘मेरी कार्रवाई पर कोई संदेह नहीं, फिर भी दोबारा जांच करा रहा हूं’: कमिश्नर ने कहा कि दोबारा पैमाइश कार्रवाई पर संदेह के कारण नहीं, बल्कि लोगों की शंकाओं को दूर करने के लिए कराई जा रही है. कुछ लोगों और समाचार माध्यमों के जरिए उनके संज्ञान में आया था कि लोग खुद निर्माण हटाने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट नहीं है कि उनका कितना हिस्सा सरकारी जमीन में आ रहा है. इसी वजह से मौके पर डीजीपीएस मशीन से घरों पर वास्तविक सीमा की मार्किंग कर लोगों को स्थिति दिखाई जा रही है.
डिजिटल मार्किंग के आधार पर कार्रवाईः उन्होंने कहा कि ड्रेन की डिजिटल मार्किंग पहले ही राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर की जा चुकी है. उसी रेफरेंस प्वाइंट से मकानों की स्थिति स्पष्ट की जा रही है. कहीं टाइपिंग या अन्य तकनीकी त्रुटि की संभावना हो सकती है, लेकिन कार्रवाई राजस्व रिकॉर्ड और मौके की पैमाइश के आधार पर की जा रही है.
दुकानदार बोले- रजिस्ट्री और इंतकाल है तो जमीन कहां गई? वहीं, मौके पर मौजूद दुकानदार सुरेश ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि "उन्होंने करीब 7-8 साल पहले जमीन खरीदी थी. उनके पास जमीन की रजिस्ट्री के साथ इंतकाल भी दर्ज है. जब सरकार ने रजिस्ट्री के दौरान स्टांप शुल्क लिया और उनके पास पूरे दस्तावेज मौजूद हैं तो अब उनकी जमीन को अवैध कैसे बताया जा रहा है." सुरेश ने कहा कि "यदि यह जमीन पहले से ड्रेन की थी तो संबंधित विभाग को रजिस्ट्री नहीं करनी चाहिए थी. खरीद के समय पटवारी और संबंधित अधिकारियों को जमीन की वास्तविक स्थिति बतानी चाहिए थी."
सरकारी और निजी जमीन को चिह्नित करने की मांगः उन्होंने प्रशासन से मांग की कि "उन्हें स्पष्ट रूप से बताया जाए कि उनके दस्तावेजों में दर्ज जमीन में से कौन सा हिस्सा सरकारी या ड्रेन की जमीन में आता है." उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कई सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा है. अब प्रशासन की दोबारा पैमाइश के बाद यह तस्वीर साफ होने की उम्मीद है कि मिनी बाईपास की प्रस्तावित जमीन पर कितने लोगों का कब्जा है और कितने निर्माण राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार सरकारी जमीन पर आते हैं."

