बारिश को रिझाने के लिए 300 साल से चली आ रही परंपरा, चारभुजानाथ को 11 क्विंटल चूरमे का भोग, 6000 की महाप्रसादी
समाज का विश्वास है कि इस आयोजन के बाद अधिकांश वर्षों में पूरे मेवाड़ में अच्छी वर्षा होती है.

Published : July 5, 2026 at 7:30 PM IST
|Updated : July 5, 2026 at 7:49 PM IST
उदयपुर: राजस्थान में मानसून की सुस्त चाल के बीच मेवाड़ में सदियों पुरानी एक परंपरा फिर जीवंत हुई. जब बादल नहीं बरसते, तब यहां लोग सिर्फ मौसम के भरोसे नहीं बैठते, बल्कि सामूहिक आस्था के साथ इंद्रदेव को मनाने निकल पड़ते हैं. उदयपुर के पानेरियों की मादड़ी में मेनारिया समाज ने करीब 300 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए भगवान चारभुजानाथ को 11 क्विंटल से अधिक चूरमे का भोग लगाया और हजारों लोगों ने एक साथ अच्छी बारिश की कामना की.
300 साल पुरानी परंपरा: उदयपुर के पानेरियों की मादड़ी गांव में मेनारिया समाज ने करीब 300 वर्ष पुरानी परंपरा को निभाते हुए भगवान श्री चारभुजानाथ की महाप्रसादी का आयोजन किया. यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और समाज की एकजुटता का ऐसा संदेश है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना रियासतकाल में था.
6000 लोग एक साथ करते हैं भोजन: अच्छी बारिश, किसानों की समृद्धि और प्रदेश की खुशहाली की कामना को लेकर आयोजित इस महाप्रसादी में समाज के 700 परिवारों के करीब 6000 महिला, पुरुष और बच्चों ने भाग लिया. भगवान चारभुजानाथ को 11 क्विंटल चूरमा, चावल और दाल का भोग अर्पित किया गया. इसके बाद हजारों लोगों ने सामूहिक रूप से प्रसाद ग्रहण किया. इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि समाज का हर परिवार किसी न किसी रूप में इसमें सहभागी बना. किसी ने आर्थिक सहयोग दिया तो किसी ने व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाली. समाज के सैकड़ों युवाओं ने पूरे आयोजन को व्यवस्थित रूप से संपन्न कराया, जबकि महिलाओं ने पारंपरिक मंगल गीत गाकर इंद्रदेव से समय पर वर्षा की प्रार्थना की.

कैसे शुरू हुआ आयोजन: ग्राम सभा के प्रवक्ता कैलाश मेनारिया ने बताया कि यह परंपरा उस दौर से चली आ रही है, जब मेवाड़ की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी. बारिश नहीं होने पर समाज के लोग भगवान चारभुजानाथ की महाप्रसादी का आयोजन कर इंद्रदेव को प्रसन्न करने की कामना करते थे. समाज का विश्वास है कि इस आयोजन के बाद अधिकांश वर्षों में पूरे मेवाड़ में अच्छी वर्षा होती है. इसी विश्वास और आस्था के साथ यह परंपरा आज भी बिना किसी बदलाव के निभाई जा रही है.

पढ़ें: सांगानेर का ये समुदाय पुराने कपड़ों से बनाता है 'इको फ्रेंडली' कागज, 600 सालों से संभाल रहा विरासत
सामाजिक समरसता का संदेश: महाप्रसादी केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सामाजिक समरसता का भी उदाहरण बनी. मेनारिया समाज की विशेष परंपरा के अनुसार सामूहिक कार्यक्रमों में सर्वप्रथम माता-बहनों को भोजन कराया जाता है. इसके बाद अन्य समाजजन प्रसाद ग्रहण करते हैं. समाज का मानना है कि महिलाओं के सम्मान और सामूहिक सहभागिता से ही किसी भी धार्मिक आयोजन की पूर्णता होती है. ग्राम सभा के सभी पदाधिकारी, वरिष्ठजन, युवा और बड़ी संख्या में समाजबंधु मौजूद रहे.

गांव में नहीं जलता किसी के घर पर चूल्हा: कैलाश मेनारिया ने बताया कि इस आयोजन में शामिल होने के लिए आज किसी के घर पर भी चूल्हा नहीं जलता. सभी लोग एकजुट होकर प्रसाद लेते हैं. यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है. उस समय मेवाड़ की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर आधारित थी. जब वर्षा नहीं होती थी, तब समाज के लोग भगवान चारभुजानाथ की महाप्रसादी का आयोजन कर इंद्रदेव को प्रसन्न करने और अच्छी बारिश की कामना करते थे. उन्होंने बताया कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की एकजुटता, भाईचारे और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक है.




