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हिमाचल के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में सिर्फ 18 फीसदी महिलाओं का घरों पर स्वामित्व, 67% महिलाएं नहीं पढ़ पातीं भूमि दस्तावेज

कानूनी प्रावधानों के बावजूद जिले में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व, विरासत और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है.

18 Percent Women own homes in Kangra district
कांगड़ा जिले में महिलाओं का अधिकार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : June 19, 2026 at 2:46 PM IST

5 Min Read
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शिमला: हिमाचल के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में महिलाओं को लेकर एक अहम अध्ययन हुआ है. यह अध्ययन पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट की तरफ से किया गया है. कांगड़ा जिले में महिलाओं के भूमि अधिकारों की स्थिति पर किए गए एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार कानूनी प्रावधानों के बावजूद भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व, विरासत और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है. इस अध्ययन में कांगड़ा जिला की 10 पंचायतों में 302 उत्तरदाताओं का सर्वेक्षण किया गया. इनमें 73 प्रतिशत महिलाएं थीं. सर्वेक्षण में 66 प्रतिशत उत्तरदाता अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित थे.

अध्ययन में पाया गया कि 76 प्रतिशत घरों का स्वामित्व पुरुषों के नाम पर है. सिर्फ 18 प्रतिशत घर महिलाओं के नाम दर्ज हैं. मात्र 6 प्रतिशत संपत्तियां संयुक्त स्वामित्व या अन्य श्रेणी में आती हैं. नई संपत्तियों की खरीद में भी पुरुषों की भागीदारी अधिक पाई गई है. नई सम्पत्ति खरीदने में 77 प्रतिशत खरीद पुरुषों केई रही. केवल 17 प्रतिशत खरीद महिलाओं द्वारा की गई.

32 फीसदी लोगों ने माना पैतृक संपति पर पुत्र का हक

विरासत संबंधी धारणाओं में भी लैंगिक असमानता देखने को मिली. 32 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि पैतृक संपत्ति का मुख्य उत्तराधिकारी पुत्र होना चाहिए. केवल 13 प्रतिशत ने बेटियों को प्राथमिक उत्तराधिकारी माना. अध्ययन में यह भी सामने आया कि परिवार की 63 प्रतिशत संपत्ति पुरुष मुखियाओं के नाम पर है, जबकि विधवा महिलाओं के नाम पर 16 प्रतिशत संपत्ति दर्ज है. निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी पुरुषों का प्रभाव अधिक पाया गया. 37 प्रतिशत मामलों में पति को परिवार का प्रमुख निर्णयकर्ता माना गया, जबकि केवल 20 प्रतिशत मामलों में पत्नी की स्वतंत्र भूमिका सामने आई. शिक्षा एवं वित्तीय मामलों में संयुक्त निर्णय लेने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक रही.

सबसे बड़े जिले में लैंगिक असमानता!

  • परिवार की 63 फीसदी संपत्ति पुरुषों के नाम पर.
  • विधवा महिलाओं के नाम पर 16 प्रतिशत संपत्ति.
  • 37 फीसदी मामलों में पति ही परिवार का प्रमुख निर्णयकर्ता.
  • 20 प्रतिशत मामलों में पत्नी की स्वतंत्र भूमिका.

महिलाओं को सरकारी योजनाओं का सहारा

सरकारी योजनाओं की पहुंच के संबंध में अध्ययन में पाया गया कि राशन कार्ड, मनरेगा, जीवन बीमा और विधवा पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक मिला है. हालांकि प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के लाभार्थियों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में काफी अधिक रही, जो संपत्ति स्वामित्व में मौजूद लैंगिक अंतर को दर्शाता है.

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी रहा कि महिलाओं में भूमि अधिकारों संबंधी कानूनी जागरूकता का स्तर काफी कम है. 67 प्रतिशत महिलाएं भूमि संबंधी दस्तावेजों को पढ़ने और समझने में सक्षम नहीं पाई गईं, जबकि केवल 4 प्रतिशत महिलाओं ने कभी भूमि अधिकारों से संबंधित किसी जागरूकता शिविर में भाग लिया था.

अध्ययन के अनुसार, महिलाओं द्वारा बताई गई प्रमुख बाधाओं में दिव्यांगता और प्राकृतिक आपदाएं सबसे अधिक रहीं. 26-26 उत्तरदाताओं ने इन्हें भूमि अधिकारों में बाधा बताया, जबकि 12 लोगों ने आर्थिक कठिनाइयों, 6 ने सामुदायिक दबाव, 5 ने जातिगत कारणों और एक उत्तरदाता ने लैंगिक भेदभाव को प्रमुख अवरोध बताया.

अध्ययन में अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय की महिलाओं की स्थिति को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बताया गया है. सर्वेक्षण में शामिल 12 प्रतिशत एसटी महिलाओं में केवल 17 प्रतिशत के पास ही घर का स्वामित्व पाया गया. रिपोर्ट के अनुसार एसटी महिलाएं दोहरी चुनौतियों का सामना करती हैं, क्योंकि वे न केवल मुख्यधारा के कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से बाहर रह जाती हैं, बल्कि पारंपरिक व्यवस्थाओं में भी उन्हें समान अधिकार नहीं मिल पाते.

जलवायु परिवर्तन पर भी अध्ययन

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण करते हुए अध्ययन में पाया गया कि 44 लोगों ने भूस्खलन के प्रभाव का अनुभव किया. इसके अलावा, 43 लोगों को प्रतिकूल मौसम और फसल क्षति के कारण खेती छोड़नी पड़ी, 30 लोगों ने पशुपालन छोड़ दिया और 26 परिवारों ने प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपनी भूमि अथवा आवास खो दिया. रिपोर्ट में कहा गया है कि, कमजोर भूमि अधिकार रखने वाली महिलाओं पर जलवायु आपदाओं का प्रभाव अधिक गंभीर पड़ता है और पुनर्वास योजनाओं में उनकी भागीदारी भी सीमित रह जाती है.

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि, महिलाओं की कानूनी जागरूकता बढ़ाने, भूमि संबंधी दस्तावेजों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने, पंचायत स्तर पर सहायता तंत्र विकसित करने और जलवायु आपदाओं के बाद पुनर्वास नीतियों में महिलाओं के भूमि अधिकारों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है. पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट की संस्थापक रजनी व्यास, ट्रस्ट की अध्यक्ष विमल विश्व प्रेमी, एकल नारी संगठन की संस्थापक निर्मल चंदेल और वरिष्ठ पत्रकार अर्चना फुल्ल सहित महिला आयोग की अध्यक्ष विद्या नेगी ने इस अध्ययन रिपोर्ट पर शिमला में चर्चा की. महिला आयोग की चेयर पर्सन विद्या नेगी ने कहा कि भूमि एवं संपत्ति अधिकारों पर आयोग जागरूकता शिविर आयोजित करेगा.

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