Special : हवा महल में Coins Exhibition, 154 प्राचीन सिक्कों में दिखा ऐतिहासिक वैभव
अति प्राचीन सिक्कों के जरिए कैसे इतिहास नजर आता है, इसकी बानगी जयपुर में नजर आई.

Published : March 17, 2026 at 8:50 PM IST
अश्विनी विजय प्रकाश पारीक
जयपुर: गुलाबी नगरी जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थल हवा महल स्मारक में इन दिनों इतिहास जानने की ख्वाहिश रखने वाले लोगों के लिए खास मौका आया है. अतीत को दर्शाते हुए अति प्राचीन सिक्के यहां नुमाइश के लिए रखे गए हैं. हवा महल की अधीक्षक सरोजिनी चंचलानी ने बताया कि 17 से 19 मार्च तक चलने वाली इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में राजस्थान और भारत के विभिन्न कालखंडों के दुर्लभ सिक्कों को प्रदर्शित किया जा रहा है.
'कॉइंस एंड करेंसीज ऑफ राजस्थान' थीम पर आधारित इस प्रदर्शनी का आयोजन पुरातत्व विभाग की ओर से किया गया है. अगले तीन दिन इस प्रदर्शनी में लोग इतिहास के इस अनोखे खजाने को करीब से देख सकेंगे और प्राचीन भारत की समृद्ध विरासत से रूबरू हो पाएंगे.
15 शोकेस में 154 प्राचीन सिक्कों का संग्रह : हवा महल की गैलरी में आयोजित इस प्रदर्शनी में कुल 15 शोकेस लगाए गए हैं, जिनमें सोना, चांदी और तांबे सहित विभिन्न धातुओं से बने 154 प्राचीन सिक्के प्रदर्शित किए गए हैं. इन सिक्कों के साथ उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कालखंड और विशेषताओं की जानकारी भी दी जा रही है, ताकि पर्यटक प्राचीन मुद्रा प्रणाली को बेहतर तरीके से समझ सकें.

मुद्रा विशेषज्ञ प्रिंस कुमार के मुताबिक भारत में मुद्रा का चलन 36 शताब्दी ईसा पूर्व में पंंचमार्क सिक्कों रूप में हुई थी. लिहाजा, यहां प्रदर्शित सिक्कों में पंचमार्क और कौड़ियों से लेकर आधुनिक ब्रिटिश काल के समय तक के सिक्के शामिल हैं. इन सब में खास 16 जनपदों तक चल चांदी के पंचमार्क सिक्के हैं, जिन पर पांच निशान बने होते थे. हालांकि, कुछ पंचमार्क सिक्के तांबे की धातु से भी तैयार होते थे, लेकिन सोने के सिक्कों का अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला है.
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प्रिंस कुमार ने बताया कि कुषाण काल में 99 फीसदी से ज्यादा शुद्धता वाले सोने के सिक्कों का चलन होता था, जो इस प्रदर्शनी में रखे गए हैं. हवा महल में जारी प्रदर्शनी में साल 1799 में हवा महल बनवाने वाले जयपुर के शासक प्रताप सिंह के शासन काल का सिक्का भी इस प्रदर्शनी में नुमाइश के लिए रखा गया है. यह सिक्के चांदी से बने हुए हैं. इसके अलावा बूंदी रियासत में राजा राम सिंह के शासनकाल का सिक्का भी यहां दिखाया गया है, जिसके एक तरफ नागरी भाषा में विक्टोरिया लिखा गया है.

शाहजहां काल का दुर्लभ सिक्का आकर्षण का केंद्र : प्रदर्शनी का सबसे बड़ा आकर्षण मुगल काल का एक विशेष सिक्का है, जिसे बादशाह शाहजहां ने अपने शासनकाल (1627 से 1658 ई.) के दौरान जारी किया था. मुद्रा विशेषज्ञ प्रिंस कुमार ने बताया कि इन सिक्कों को विशेष मौके पर जारी किया जाता था और यह आम जनता की उपयोग के लिए नहीं होते थे. यह सिक्का गोल्ड प्लेटेड है, जो की सीसा से बना हुआ है. यह सिक्का करीब 500 ग्राम वजनी है और इस पर सोने की परत चढ़ी हुई है. इसका आकार लगभग 13.4 सेमी व्यास का वृत्ताकार है. सिक्के के अग्रभाग पर 'बादशाह गाजी मुहम्मद शाहजहां शहाबुद्दीन किरान सानी' का अंकन किया गया है, जबकि पृष्ठभाग पर भी शिलालेख मौजूद हैं.

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विभिन्न कालखंडों के सिक्के एक साथ : पुरातत्व विभाग के अनुसार प्रदर्शनी में पंच मार्क सिक्कों से लेकर इंडो-ग्रीक, स्थानीय जनजातीय, कुषाण काल, गुप्त काल, इंडो-ससानियन और अरब गवर्नरों के समय के सिक्के भी शामिल हैं. इसके अलावा आदि वराह सिक्के, घुड़सवार वृषभ प्रकार के सिक्के, कलचुरी कालीन सिक्के, दिल्ली सल्तनत और मुगलकालीन सिक्के भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं.

पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए खास अवसर : यह प्रदर्शनी न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि इतिहास और पुरातत्व में रूचि रखने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है. यहां प्रदर्शित सिक्कों के माध्यम से प्राचीन भारत की आर्थिक व्यवस्था, व्यापार और शासन प्रणाली की झलक देखने को मिलती है. हवा महल देखने आए मध्य प्रदेश के गुना निवासी नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि हमने अपने पूर्वजों से समझा था कि पहले मुद्रा के चलन में पाई, ढेला और कौड़ी का चालान हुआ करता था.

ऐसे में सिक्कों की यह प्रदर्शनी हमें इतिहास से वाकिफ करवा रही है. खास बात है कि ये सिक्के राजस्थान और जयपुर पर आधारित नहीं, बल्कि पूरे देश की सभ्यताओं से जुड़े सिक्के प्रदर्शित किए गए हैं. एक महिला पर्यटक माध्वी शर्मा ने बताया कि इस तरह के प्रयास सार्थक कहे जाने चाहिए. इनके जरिए हमारे इतिहास और संस्कृति के बारे में न सिर्फ हमें पता लग रहा है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इसे रूबरू हो सकेंगी.
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