पलामू जिले के गठन के 134 वर्ष पूरे, 1857 की क्रांति से लेकर नक्सल हिंसा का रहा केंद्र
पलामू जिले के गठन के 134 वर्ष हो गए. इसका इतिहास काफी समृद्ध और उतार-चढ़ाव भरा रहा है.

Published : January 1, 2026 at 3:24 PM IST
पलामू: झारखंड के पलामू जिले का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है. लातेहार और गढ़वा जिले पलामू से ही अलग हुए हैं. पलामू का गठन 1 जनवरी, 1892 को हुआ था. आज पलामू 134 साल का हो गया है. अपने 134 साल के इतिहास में, इस जिले ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई से लेकर नक्सली आंदोलन तक, पलामू हमेशा एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. 1857 के विद्रोह में भी पलामू ने अहम भूमिका निभाई थी.
पलामू जिले की सीमा बिहार के गया और औरंगाबाद जिलों के साथ-साथ झारखंड के गढ़वा, लातेहार और चतरा जिलों से लगती है. गढ़वा का गठन 1991 में पलामू से अलग होकर हुआ था, जबकि लातेहार जिले को 2001 में पलामू से अलग किया गया था. यह जिला देश के आकांक्षी जिलों की सूची में शामिल है. जो पूरे देश में अकाल, सूखे और पलायन के लिए चर्चित रहा है. 2011 की जनगणना के अनुसार, पलामू की आबादी 19.36 लाख है. पलामू किसी एक जगह का नाम नहीं है, बल्कि पूरे जिले का नाम है. जिसका मुख्यालय मेदिनीनगर है. पलामू एक प्रमंडल भी है. जिसका गठन 2 मई, 1892 को हुआ था.
1857 की क्रांति को नीलांबर और पीतांबर ने किया था मजबूत
पलामू का इतिहास बहुत समृद्ध है, और इसने 1857 के विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. जब पूरे देश में 1857 का विद्रोह कमजोर पड़ गया, तब भी पलामू के इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध मजबूती से जारी रहा. अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ने वाले नीलांबर और पीतांबर ने इस इलाके में क्रांति का नेतृत्व किया. इन दोनों भाइयों की बदौलत इस इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई 1859 तक जारी रही. दोनों भाइयों ने मिलकर राजहरा रेलवे स्टेशन पर हमला किया और अंग्रेजों को कोयले की सप्लाई रोक दी.
अंग्रेजों ने दोनों भाइयों को पकड़ने के लिए कर्नल डाल्टन की कमान में मद्रास इन्फेंट्री के घुड़सवार सेना और विशेष बंदूकधारी सैनिकों को पलामू भेजा. 1859 में, कर्नल डाल्टन की सेना ने 24 दिनों तक कैंप किया और धोखे से दोनों भाइयों को पकड़ लिया. बाद में, मार्च 1859 में, अंग्रेजों ने उन दोनों को पलामू के लेस्लीगंज में फांसी दे दी.
नक्सली हिंसा का केंद्र, इस इलाके में हुआ था पहला नरसंहार
पलामू देश में नक्सली हिंसा का एक बड़ा केंद्र रहा है. जब नक्सलबाड़ी में नक्सली आंदोलन कमजोर पड़ा, तो पलामू के आस-पास के इलाकों में यह मजबूत होता गया. 1984 में नक्सली हिंसा में पहली हत्या पलामू के इलाके में हुई थी. 1990 के दशक में इस इलाके में पहला नरसंहार भी हुआ था. नक्सली आंदोलन के दो गुट पलामू क्षेत्र से ही निकले थे. उत्तर और दक्षिण भारत में नक्सली संगठनों का बंटवारा भी इसी क्षेत्र से हुआ था. फिलहाल, पलामू क्षेत्र में नक्सलवाद बहुत कमजोर है.
अप्रैल 2024 में, पलामू को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया. केंद्र सरकार ने पलामू को SRE (सुरक्षा संबंधी व्यय) जिले से अलग कर दिया है. यह देश के उन जिलों में से है जहां आधे दर्जन से ज्यादा नक्सली संगठन सक्रिय थे. 1990 के बाद, नक्सलियों ने सबसे पहले इस इलाके में IED और क्लेमोर माइंस का इस्तेमाल किया था. हालांकि, पलामू का इलाका अब नक्सली हिंसा के दौर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा है.
संविधान सभा के गठन में पलामू की भूमिका
संविधान के निर्माण में भी पलामू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. संविधान का मसौदा तैयार करने वाली संविधान सभा में पलामू के दो सदस्य थे. पलामू के यदुवंश सहाय और अमियो कुमार घोष 1946 में बनी संविधान सभा के सदस्य थे. झारखंड सरकार ने हाल ही में पेसा नियमावली को मंजूरी दी है. यदुवंश सहाय ने संविधान की पांचवीं अनुसूची की वकालत की थी, जिसके कारण 1946 में PESA एक्ट लागू हुआ.
"पलामू शौर्य और सौंदर्य की भूमि रही है. राजा मेदिनीराय का इतिहास समृद्ध रहा है, जबकि नीलांबर और पीतांबर ने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बिहार क्षेत्र में 8 से 9 जगहों का दौरा किया था, और पलामू उनमें से एक था. 1927 में, महात्मा गांधी ने पलामू से ही चरखे और खादी के लिए धन जुटाने के लिए अभियान शुरू किया था. आजादी की लड़ाई में पलामू ने अहम भूमिका निभाई. 1930 और 1940 के दशक में बड़ी संख्या में लोग जेल गए. 1942 में शायद यह पहला मौका था जब पलामू इलाके के छह सगे भाई आजादी की लड़ाई के दौरान जेल गए थे. काकोरी कांड से जुड़े अशफाकुल्लाह खान लंबे समय तक पलामू इलाके में एक नाम बदलकर रहे थे." - प्रभात सुमन मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार
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