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Special : सफाई कर्मचारी की बेटी दिव्या एशियन कैडेट जूडो कप में दिखाएगी दमखम, जानिए ताने और तारीफ की कहानी...

झाड़ू से जूडो तक का सफर. उदयपुर की दिव्या का भारतीय जूडो टीम में चयन. संघर्ष से लिखी सफलता की कहानी. कपिल पारीक की रिपोर्ट..

Divya Panwar
उदयपुर की बेटी बेटी दिव्या (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : May 22, 2026 at 8:04 PM IST

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उदयपुर: झीलों की नगरी उदयपुर के अंबामाता क्षेत्र की रहने वाली 57 किलोग्राम भार वर्ग की जूडो खिलाड़ी दिव्या पंवार का चयन 7 से 12 जून तक कजाकिस्तान के अल्माटी में आयोजित होने वाले एशियन कैडेट जूडो कप के लिए हुआ है. यह सिर्फ एक खिलाड़ी के चयन की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और सपनों को सच करने की मिसाल है. छोटी उम्र से कठिन हालातों में पली-बढ़ी दिव्या आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रही हैं.

पिता दीपक पंवार ने ईटीवी भारत से खास बातचीत करते हुए बताया कि दिव्या पंवार का जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उनके हौसले कभी कमजोर नहीं पड़े. दिव्या के माता-पिता निजी सफाई कर्मचारी हैं और पिछले तीन वर्षों से उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूआईटी) में साफ-सफाई का काम कर रहे हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि चारों भाई-बहन आसानी से खेल जारी रख सकें. कई बार टूर्नामेंट फीस, यात्रा खर्च और टिकट तक जुटाना मुश्किल हो जाता था, लेकिन परिवार ने हार नहीं मानी.

दिव्या के माता-पिता से खास बातचीत, सुनिए क्या कहा... (ETV Bharat Udaipur)

बचपन में शुरू हुआ जूडो, आज बनी पहचान : दिव्या ने पांचवीं कक्षा में जूडो खेलना शुरू किया था. शुरुआत में जब उन्होंने अपने पिता दीपक पंवार को बताया कि वह जूडो खेलना चाहती हैं तो पिता ने सामान्य रूप से कहा था कि इससे क्या होगा?, लेकिन जैसे-जैसे दिव्या मेडल जीतती गईं, पिता का विश्वास और हौसला दोनों बढ़ते गए. आज वही माता-पिता अपनी बेटी की उपलब्धियों पर गर्व महसूस कर रहे हैं.

दिव्या के कोच सुशील सेन बताते हैं कि दिव्या बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली रही हैं. करीब 10 वर्ष की आयु में उन्होंने जूडो ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण शुरू किया था. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार एक के बाद एक पदक जीतती चली गईं. वर्तमान में दिव्या भोपाल स्थित साई सेंटर में उच्च स्तरीय प्रशिक्षण ले रही हैं. कोच सुशील सेन के अनुसार दिव्या को कई बार चोटों का सामना करना पड़ा, लेकिन हर बार वह पहले से ज्यादा मजबूत होकर लौटीं. यही जज्बा उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाता है.

Udaipur Judo Player Divya Panwar
बचपन में शुरू हुआ जूडो, आज बनी पहचान... (ETV Bharat GFX)

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नेशनल स्तर पर शानदार रिकॉर्ड : दिव्या अब तक 12 से 15 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं और इनमें से करीब 10 प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुकी हैं. उनके हर मेडल के पीछे घंटों की मेहनत, कठिन अभ्यास और संघर्ष छिपा हुआ है. आज भारत के जूडो सर्कल में दिव्या का नाम तेजी से उभर रहा है. उनकी बड़ी बहन अंजलि पंवार भी जूडो से जुड़ी हुई हैं और कॉलेज में पढ़ाई के साथ खेल जारी रखे हुए हैं. दूसरी बहन खुशी पंवार सेकंड ईयर की छात्रा हैं और जूडो खेलती हैं. परिवार का सबसे छोटा सदस्य कृष्णा पंवार सातवीं कक्षा में पढ़ता है और वह भी जूडो से जुड़ा हुआ है. पहले दिव्या और खुशी ने जूडो जॉइन किया, फिर धीरे-धीरे चारों भाई-बहन इस खेल से जुड़ गए.

Udaipur Judo Family
उदयपुर की 'जूडो फैमिली'... (Source : Divya Panwar)

इंटरनेशनल मंच पर बढ़ते कदम : गत वर्ष दिव्या ने इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय अनुभव था. सीमित संसाधनों और छोटे शहर से आने के बावजूद उन्होंने साबित किया कि मेहनत और लगन के दम पर कोई भी खिलाड़ी दुनिया में पहचान बना सकता है. अब उनका चयन एशियन कैडेट जूडो कप के लिए हुआ है, जिससे पूरे उदयपुर और राजस्थान में खुशी का माहौल है. कजाकिस्तान जाने का खर्च अब भारतीय खेल प्राधिकरण (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) उठा रहा है.

बारिश में पॉलिथीन ओढ़कर पहुंची थी अभ्यास करने : दिव्या के पिता दीपक पंवार ने ईटीवी भारत से बातचीत में कई भावुक पल साझा किए. उन्होंने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार घर चलाना भी मुश्किल हो जाता था. एक समय ऐसा भी आया जब घर में खाने तक के लिए पैसे नहीं थे. उन्होंने बताया कि एक दिन तेज बारिश हो रही थी, लेकिन दिव्या ने हार नहीं मानी.

Divya Panwar Parents
दिव्या के माता-पिता (ETV Bharat Udaipur)

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वह सिर पर पॉलिथीन रखकर भीगते हुए जूडो की प्रैक्टिस करने पहुंच गई. पिता ने कहा कि उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि बेटी के अंदर कुछ बड़ा करने का जुनून है. दीपक पंवार ने यह भी बताया कि एक बार घर में एक रुपया तक नहीं था और राशन खत्म हो चुका था. उसी दिन दिव्या एक प्रतियोगिता में गई और 500 रुपये का इनाम जीतकर घर लौटी. परिवार ने उन्हीं पैसों से राशन खरीदा और घर का गुजारा चला.

मां ने कहा- लोग ताने देते थे, अब तारीफ करते हैं : दिव्या की मां पदमा बाई पांचवीं तक पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन वह अपने बच्चों को बड़े सपने देना चाहती हैं. उन्होंने बताया कि जब बच्चों को जूडो में भेजा गया तो लोग तरह-तरह की बातें करते थे. कई लोगों ने सवाल उठाए कि बेटियों को इस खेल में क्यों भेज रहे हैं, लेकिन आज वही लोग बच्चों की तारीफ करते हैं. पदमा बाई और उनके पति यूआईटी में साफ-सफाई का काम करने के बाद दूसरी जगहों पर भी मजदूरी करते हैं, ताकि परिवार का पालन-पोषण हो सके और बच्चों का खेल जारी रहे.

Divya with Sports Friends
अपने भाई बहनों के साथ दिव्या पंवार (Source : Divya Panwar)

WhatsApp डीपी पर तिरंगा, ओलंपिक मेडल का सपना : दिव्या के अंदर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून साफ दिखाई देता है. उन्होंने अपने व्हाट्सएप प्रोफाइल फोटो पर भारत का तिरंगा लगाया हुआ है. दिव्या कहती हैं कि जब तक वह भारत के लिए ओलंपिक पदक नहीं जीत लेंगी, तब तक उनकी डीपी पर तिरंगा लगा रहेगा.

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दिव्या का आगे का सपना : दिव्या ने कहा कि उनका सपना भारत के लिए ओलंपिक खेलना और देश को मेडल दिलाना है. इसके लिए वह दिन-रात मेहनत कर रही हैं. फिलहाल, वह भोपाल में रहकर अपनी तैयारी को और मजबूत बना रही हैं.

सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने का दर्द : दिव्या के पिता ने कहा कि अब तक उनके परिवार को किसी सरकारी योजना का विशेष लाभ नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए कई योजनाओं का दावा करती है, लेकिन अभी तक उनके परिवार तक ऐसी कोई मदद नहीं पहुंची जिससे बच्चों के खेल को और मजबूती मिल सके. इसके बावजूद परिवार ने कभी हालातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

माता-पिता का सपना है कि उनके बच्चों को वह संघर्ष नहीं देखना पड़े जो उन्होंने अपने जीवन में झेला. वे चाहते हैं कि उनके बच्चे देश-दुनिया में नाम कमाएं और भारत का गौरव बढ़ाएं. आज उदयपुर की यह जूडो फैमिली हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है. झाड़ू पकड़ने वाले हाथों ने अपने बच्चों के हाथों में जूडो की ताकत दी और अब यही बच्चे देश के लिए मेडल जीतने का सपना देख रहे हैं.