'हाफ पैंट पहनकर खेलती है..' रोज मारते थे ताना, मजदूर पिता की बेटियों ने Gold से दिया जवाब
नालंदा की मजदूर पिता की बेटियों कोमल और प्रियांशु ने सामाजिक तानों को पीछे छोड़ रग्बी में राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते. रिपोर्ट-महमूद आलम

Published : August 29, 2026 at 3:27 PM IST
नालंदा : "लोग ताना मरते थे कहते थे कि लड़की हाफ पैंट पहनकर खेलती है. रात में आती है, ये अच्छी बात नहीं है..हर दिन आसपास-पड़ोस और रिश्तेदार हमें और हमारी बहन को ताना मारते थे.'' ये कहना है नेशनल रग्बी खिलाड़ी कोमल कुमारी का. बिहार के नालंदा थाना क्षेत्र के रघु बिगहा गांव की रहने वाली सगी बहनें कोमल कुमारी और प्रियांशु कुमारी आज राष्ट्रीय स्तर की सफल रग्बी खिलाड़ी हैं. एक समय ऐसा था जब गांव के लोग उनके खेल को लेकर सवाल उठाते थे. हाफ पैंट पहनकर खेलने, घर से बाहर जाने और देर शाम तक लौटने को लेकर परिवार को तरह-तरह की बातें सुननी पड़ती थीं. लेकिन पिता धर्मेंद्र साव ने लोगों की बातों की परवाह न करके बेटियों की प्रतिभा को आगे बढ़ाने का फैसला किया.
मजदूरी करके पिता ने किया बेटियों के सपनों को पूरा : कोमल और प्रियांशु के पिता धर्मेंद्र साव दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जबकि मां पिंकी देवी सिलाई के साथ भुजा भूनने का काम करती हैं. परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है. खास बात यह है कि तीनों बेटियां रग्बी खेलती हैं. सीमित आमदनी के बावजूद धर्मेंद्र साव ने बेटियों को खेलने से कभी नहीं रोका. उनका कहना है कि वे मजदूरी करके परिवार का पेट पालते हैं, लेकिन बेटियों के सपनों को रोकना उन्हें मंजूर नहीं था.
"लोग बोलते थे कि बेटियां खेलती हैं ये अच्छा नहीं है. खेल कर क्या कर लेंगी. हमने कहा कि कुछ नहीं तो कम से कम नाम तो आएगा. हमने मजदूरी करके जो कमाया वो अपनी बेटियों को दिया. आज मेरी बेटियां जूनियर खिलाड़ियों के साथ नेशनल में रग्बी खेलती हैं. मुझे और मेरे परिवार को उनका खेलना अच्छा लगता है. मैने अपनी बेटियों को अभी तक मैदान में खेलते नहीं देखा है. मेरी दोनों बेटी बिहार के लिए गोल्ड लाती हैं. मेरा सपना सिर्फ उनके सपनों को पूरा करना है."- धर्मेन्द्र साव, कोमल और प्रियांशु के पिता
डर से शुरू हुआ रग्बी का सफर : 17 वर्षीय कोमल कुमारी फिलहाल 12वीं कक्षा में बायोलॉजी की छात्रा हैं. नवंबर 2023 में उन्होंने रग्बी खेलना शुरू किया. इससे पहले वह एथलेटिक्स और खो-खो खेलती थीं. स्कूल के शारीरिक शिक्षक भवेश सर ने उन्हें रग्बी खेलने के लिए प्रेरित किया. शुरुआत में कोमल को टैकल और चोट का डर सताता था, लेकिन कोच रितेश के मार्गदर्शन में लगातार अभ्यास ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया.

नेशनल में गोल्ड से बनाई पहचान : कोमल ने 2024 में पटना में हुए 68वें नेशनल स्कूल गेम्स के अंडर-17 वर्ग में गोल्ड मेडल जीता. इसके बाद 2025 में ग्वालियर ओपन गेम और असम में जूनियर नेशनल रग्बी 7s में भी स्वर्ण पदक हासिल किया. 2026 में ओडिशा में अंडर-15 वर्ग में गोल्ड, अस्मिता रग्बी लीग और 69वें नेशनल स्कूल गेम्स में सिल्वर तथा हैदराबाद जूनियर नेशनल रग्बी चैंपियनशिप के अंडर-18 वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा साबित की.
"मैने जूनियर लेबल के रग्बी में नेशनल गेम्स में कई बार गोल्ड लिया. मुझे शुरू में खेलने में डर लगता था लेकिन हम लोगों ने खेलना शुरू किया तो अच्छा लगा फिर हम लोग रुके नहीं और अब नेशनल स्तर पर खेल रहे हैं. शुरू में मेरे पिता को आसपास के लोग भड़काते थे कि लड़की है हाफ पैंट में खेलती है. अच्छी बात नहीं है. लेकिन हमारे मप्मी पापा, दादा जी पूरा परिवार हमें सपोर्ट करता था."- कोमल कुमारी, जूनियर नेशनल खिलाड़ी, रग्बी

बड़ी बहन को देखकर छोटी बहन भी बनी रग्बी खिलाड़ी : कोमल की छोटी बहन प्रियांशु कुमारी धरहरा के किसान +2 उच्च विद्यालय में 9वीं कक्षा की छात्रा हैं. बड़ी बहन और अन्य दीदियों को मैदान में अभ्यास करते देखकर प्रियांशु ने भी रग्बी को अपना लक्ष्य बना लिया. शुरुआत में उन्हें भी टैकल और बॉल पासिंग से डर लगता था, लेकिन करीब छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ गया.
पहले ही नेशनल में गोल्ड फिर लगातार पदक : प्रियांशु ने अपने शुरुआती दौर में ही 2024 के 68वें नेशनल स्कूल गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. 2025 में ओडिशा में आयोजित 10वीं सब-जूनियर नेशनल रग्बी 7s चैंपियनशिप के अंडर-15 वर्ग में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. इसके बाद अस्मिता नेशनल रग्बी और 2026 में ओडिशा के जूनियर नेशनल रग्बी स्कूल गेम में सिल्वर मेडल हासिल किया.

"मैने अपने पहले ही गेम में गोल्ड लिया था. दो गोल्ड और एक कांस्य पदक मेरे पास है. मेरा सपना है कि मैं इंडिया के लिए खेलूं. इंडिया की जर्सी में खुद को देखना चाहती हूं."- प्रियांशु कुमारी, जूनियर नेशनल खिलाड़ी, रग्बी
मेडल के साथ बढ़ा बेटियों का हौसला : राष्ट्रीय स्तर पर मिली सफलता के बाद इन बेटियों को सरकार की ओर से सम्मान और आर्थिक पुरस्कार भी मिला. प्रियांशु के लिए यह सिर्फ मेडल नहीं, बल्कि परिवार की मेहनत की पहचान है. पिता की मजदूरी और मां की मेहनत के बीच बेटियों की यह उपलब्धि पूरे परिवार के लिए गर्व का कारण बन गई है.

अब लक्ष्य इंडिया की जर्सी : कोमल और प्रियांशु का सपना अब राष्ट्रीय स्तर से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना है. दोनों बहनें इंडिया की जर्सी पहनकर रग्बी खेलना चाहती हैं. साथ ही उनकी कोशिश खेल कोटे से सरकारी नौकरी हासिल करने की भी है, ताकि जिस पिता ने मजदूरी करके उनके सपनों को पंख दिए, उन्हें आगे चलकर आराम दे सकें.
तानों का जवाब मैदान में मिला : आज जिन बेटियों के हाफ पैंट पहनकर खेलने पर सवाल उठाए जाते थे, वही बेटियां पदकों के साथ जवाब दे रही हैं. राष्ट्रीय खेल दिवस पर कोमल और प्रियांशु की कहानी सिर्फ दो खिलाड़ियों की सफलता नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण बेटियों के लिए संदेश है, जिन्हें सामाजिक बंदिशों और आर्थिक अभावों के बीच अपने सपनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है. इन बहनों ने दिखा दिया है कि मौका मिले तो गांव की बेटियां भी देश के लिए मेडल जीत सकती हैं.

बिहार का बढ़ा रहीं मान : बिहार के नालंदा के एक छोटे से गांव की दो सगी बहनों ने साबित कर दिया कि प्रतिभा के सामने गरीबी और सामाजिक ताने ज्यादा देर टिक नहीं सकते. दिहाड़ी मजदूर पिता की बेटियों को जब लोग हाफ पैंट पहनकर खेलते देखते तो पिता को लोगों के ताने सुनने पड़ते थे. हालाकि तब पिता ने समाज के तानों की कोई परवाह नहीं किया. आज वही बेटियां रग्बी के राष्ट्रीय मंच पर मेडल जीतकर परिवार, गांव और बिहार का नाम रोशन कर रही हैं.
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