बिहार के अनुपम ने गरीबी और दिव्यांगता को दी मात, 16 साल की उम्र में किया टोक्यो डेफ ओलंपिक में डेब्यू
नालंदा के मूक-बधिर धावक अनुपम ने टोक्यो डेफ ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. जानें रद्दी चुनकर पिता ने कैसे बनाया चैंपियन.

Published : December 20, 2025 at 7:58 AM IST
नालंदा: बिहार के नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड के महमूदपुर बलवा गांव के अनुपम कुमार जन्म से मूक-बधिर हैं. जुबान से एक शब्द नहीं बोलते, लेकिन उनके पैरों की रफ्तार ने जापान के टोक्यो में भारत का झंडा बुलंद कर दिया. यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाले पिता और समर्पित कोच की भी है.
बचपन से दिखी दौड़ने की जबरदस्त क्षमता: अनुपम के पिता पप्पू यादव दिल्ली में रद्दी और गत्ता बीनने का काम करते हैं. उन्होंने बताया कि बचपन में अनुपम को इशारों में कोई काम बताते तो वह तेजी से दौड़कर पूरा कर लेते. पिता को लगा कि बेटे में कुछ खास है. उन्होंने मोबाइल पर मिल्खा सिंह और उसैन बोल्ट के वीडियो दिखाए. अनुपम ने इशारों में कहा-"पापा, मैं भी ऐसा कर सकता हूं."
पिता ने गरीबी को नहीं आने दिया सपनों के आड़े: बस यहीं से शुरू हुआ सफर. पिता ने 13 साल की उम्र से अनुपम को दिल्ली की सड़कों और फ्लाईओवर के नीचे दौड़ाना शुरू किया. फिर हरनौत के फुटबॉल स्टेडियम में प्रैक्टिस कराई, जहां वह बिहार पुलिस और आर्मी के युवाओं से भी तेज दौड़ने लगे. वहां दिव्यांग कोच कुंदन पांडे से मुलाकात हुई, जिन्होंने अनुपम को अपने साथ ले लिया.
"बचपन से ही मैं अनुपम को कोई काम इशारों में बताता तो वह दौड़कर काम करने चला जाता था. मैंने देखा कि मेरा बेटा किसी भी काम के लिए बहुत तेजी से भागता है. मुझे लगा इसमें कुछ बात है. मैंने उसे मोबाइल पर 'फ्लाइंग सिख' मिल्खा सिंह और उसैन बोल्ट के वीडियो दिखाने शुरू किए. वीडियो देख अनुपम ने इशारों में कहा- पापा, मैं भी ऐसा कर सकता हूं."-पप्पू यादव, पिता
कोच कुंदन की अपनी जेब से मदद: हरनौत के नियामतपुर निवासी कुंदन कुमार पांडे बिहार राज्य पथ परिवहन निगम में कार्यरत हैं और खुद पैरा एथलीट हैं. वे 2022 से हरनौत स्टेडियम में मुफ्त ट्रेनिंग देते हैं. बच्चों से फीस नहीं लेते, उल्का जूते और उपकरण खुद देते हैं. उनके पास 100 से ज्यादा बच्चे हैं, जिनमें 5 मूक-बधिर हैं. अनुपम को उन्होंने 'हीरा' बताया.
राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड और रिकॉर्ड: कुंदन के मार्गदर्शन में अनुपम ने स्कूल, राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया. 400 मीटर और 800 मीटर में नेशनल गोल्ड जीता, साथ ही 800 मीटर और 4x400 मीटर रिले में नेशनल रिकॉर्ड बनाया. बिहार के इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने यह मुकाम हासिल किया.
टोक्यो डेफ ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व: 2025 में टोक्यो में हुए डेफ ओलंपिक में अनुपम ने भारत का प्रतिनिधित्व किया. गुजरात में क्वालीफाई कर उन्होंने यह मौका हासिल किया. हालांकि चौथा स्थान रहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना बड़ी उपलब्धि है. अब लक्ष्य 2029 डेफ ओलंपिक में गोल्ड है.

आर्थिक तंगी के बीच चल रहा संघर्ष: पप्पू यादव कहते हैं कि डाइट और ड्राई फ्रूट्स के लिए पैसा जुटाना मुश्किल है. दिल्ली में रद्दी बीनकर जैसे-तैसे घर और बेटे का खेल चलाते हैं. हरियाणा में भी ट्रेनिंग कराई. कोच कुंदन अपनी जेब से मदद करते हैं.
सरकार से अपील, दिव्यांगों को समान सम्मान: नालंदा पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव कुंदन पांडे सरकार से अपील करते हैं कि 'मेडल लाओ नौकरी पाओ' योजना में मूक-बधिर और पैरा एथलीटों को सामान्य खिलाड़ियों जैसा सम्मान और राशि मिले. अनुपम जैसे खिलाड़ियों को SAI स्कॉलरशिप मिलनी चाहिए, ताकि आर्थिक तंगी से खेल न छोड़ें. खेल समाज की बुराइयों को खत्म कर दिव्यांगों को मुख्य धारा से जोड़ता है.
"3 अंतरराष्ट्रीय और 40 राष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार किए. अनुपम बिहार का इकलौता डेफ ओलंपिक एथलीट है, जो 800 मीटर का नेशनल रिकॉर्ड होल्डर भी है. मैं सरकार से अपील करूंगा की उसे SAI स्कॉलरशिप और सम्मान इनामी राशि मिले."-कुंदन पांडे, कोच
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