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बिहार का एक ऐसा गांव, जहां हर घर में है 'रोनाल्डो-मेस्सी'

बिहार में एक गांव है, जहां हर घर में आपको फुटबॉलर मिलेगा. बच्चे कमरे में 'रोनाल्डो-मेस्सी' की तस्वीर लगाकर रखते हैं. अभय सिन्हा की रिपोर्ट..

Jheel Tola of Purnea
पूर्णिया में 'फुटबॉलर का गांव' (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : April 27, 2026 at 6:35 PM IST

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पूर्णिया: बिहार के पूर्णिया स्थित झील टोला की पहचान 'फुटबॉलर का गांव' की है. लोग फुटबॉल के इतने दीवाने हैं कि इस गांव के हर घर में एक फुटबॉल प्लेयर जरूर है. यहां से कई खिलाड़ी स्टेट और नेशनल में खेल रहे हैं. 'फुटबॉल के भगवान' कहे जाने वाले मेस्सी और रोनाल्डो की फोटो अधिकतर घरों में लगी हैं, जिनसे ये बच्चे रोजाना खेलने की प्रेरणा लेते हैं. हालांकि यहां के लोग सरकारी मदद नहीं मिलने से थोड़े निराश भी हैं.

बिहार का 'फुटबॉलर का गांव': पूर्णिया शहर से बाहर 5 किलोमीटर की दूरी पर झील टोला गांव है. इस गांव में 12 से 13 हजार की आबादी है, जिसमें 7 से 8 हजार आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं. इस गांव की खासियत यह है कि इस गांव में सभी फुटबॉल प्रेमी हैं और हर एक घर में फुटबॉल खिलाड़ी है. यहां के लोग कहते हैं कि हमारे तो खून और डीएनए में ही फुटबॉल रचा-बसा है.

देखें रिपोर्ट.. (ETV Bharat)

"आदिवासियों के खून में फुटबॉल है. जैसे बंगाल में पैदा होने के बाद लोग फुटबॉल खेलते हैं, वैसे ही हमलोग भी फुटबॉल खेलते हैं. डीएनए चेक करियेगा तो हमलोग में फुटबॉल भरा मिलेगा. जैसे क्रिकेट में होती है रणजी ट्रॉफी, वैसे ही फुटबॉल में संतोष ट्रॉफी लेकिन सरकार ध्यान नहीं देती."- सोनेलाल टुडू, पूर्व फुटबॉलर सह इंडियन रेलवे में कार्यरत

सिर्फ फुटबॉल खेलते हैं बच्चे: झील टोला में फुटबॉल को लेकर किस कदर दीवानगी है कि बच्चे सिर्फ फुटबॉल खेलते हैं. आज जब भारत में हर कोई क्रिकेट खेलना चाहता है, वैसे में यहां के बच्चों को फुटबॉल के अलावे किसी अन्य खेलों में जरा भी रुचि नहीं है.

"बच्चे बहुत मन से फुटबॉल खेलते हैं. फुटबॉल को लेकर काफी रुचि दिखती है. क्रिकेट या दूसरे खेल बिल्कुल भी यहां के बच्चे नहीं खेलते हैं."- राहुल तिर्की, स्थानीय फुटबॉल कोच

हर घर में 'रोनाल्डो-मेस्सी': शुभम आनंद पिछले 10 वर्षों से इस फुटबॉल ग्राउंड में खेलने आ रहे हैं. वे बताते हैं कि इस फुटबॉल मैदान ने रोजाना दर्जनों बच्चे खेलने आते हैं. झील टोला के बच्चों के लिए फुटबॉल से बढ़कर कुछ भी नहीं है. यही वजह है कि अगर बच्चों के कमरे में जाएं तो क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेस्सी की तस्वीर देखने को मिलेगी.

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रोनाल्डो- मेस्सी हैं रोल मॉडल (ETV Bharat)

"पूरे पूर्णिया में झील टोला का मैदान प्रचलित है. यहां पर हर घर में एक-एक बच्चा, एक बच्चा हो या दो भाई से हो. हर बच्चे फुटबॉल के दीवाने हैं. सुबह उठते हैं तो फुटबॉल, शाम होती है तो फुटबॉल. उन बच्चों के रूम में जाएंगे तो आपको पता चलेगा कि उन बच्चे के रूम में सुनील छेत्री, रोनाल्डो और मेसी जैसे अन्य महान खिलाड़ियों की फोटो लगी रहती है."- शुभम आनंद, फुटबॉलर

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फुटबॉल मैच का दृश्य (ETV Bharat)

सैयद अब्दुस समद भी हैं हीरो: झील टोला के बच्चे सैयद अब्दुस समद को भी अपना आदर्श मानते हैं. उनकी तरह ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं. फुटबॉल खिलाड़ी के लिए वह 'फुटबॉल के भगवान' की तरह हैं.

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सैयद अब्दुस समद (फाइल) (ETV Bharat)

कौन थे सैयद अब्दुस समद?: स्थानीय लोग बताते हैं कि सैयद अब्दुस समद असल में 'फुटबॉल के जादूगर' थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी. झील टोला स्थित फुटबॉल मैदान से निकलकर दुनिया के कई देशों में जाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था. उनका जन्म 6 दिसंबर 1895 को हुआ था, जबकि 2 फरवरी 1965 को निधन हुआ. पूर्णिया जूनियर एफसी से करियर की शुरुआत की थी. बाद में मोहन बागान समेत कई क्लबों के लिए खेला था.

नेशनल लेवल पर खेल चुके हैं कई खिलाड़ी: झील टोला मैदान पर प्रैक्टिस कर कई खिलाड़ियों ने राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके हैं. इन धुरंधर खिलाड़ियों में बीएन गांगुली, अब्दुल लतस, मो. शोएब, नेपु दा, और पद्म सिन्हा शामिल हैं. इसके अलावे कई खिलाड़ी अंडर-14, अंडर-17, अंडर-19 और सीनियर लेवल पर भी खेल चुके हैं.

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फुटबॉल खेलते प्लेयर (ETV Bharat)

इस गांव के फुटबॉलर नेशनल तक खेल चुके हैं और खेल की बदौलत सरकारी नौकरी और प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर पदस्थापित हैं. झील टोला का खेल मैदान पिछले 45-46 वर्षों से कई बड़े-बड़े खिलाड़ी को देश के लिए तैयार कर चुका है और नेशनल खेल खेल चुका है.

पूर्णिया के झील टोला निवासी प्रकाश कुमार उरांव जो अभी सब इंस्पेक्टर हैं, अपने जमाने के शानदार फुटबॉलर हुआ करते थे. इसी ग्राउंड पर इन्हें नौकरी भी मिली. वे कहते हैं, 'फुटबॉल की वजह से ही हम यहां पर हैं. झील टोला ग्राउंड से खेलकर कई लोगों ने अपना मुकाम बनाया है.'

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फुटबॉल खेलते युवा (ETV Bharat)

बहुत ऐसे खिलाड़ी हैं, जो खेल के माध्यम से सरकारी नौकरी या प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर स्थापित है. स्थानीय लोगों के मुताबकि हजारों खिलाड़ी यहां से इस झील टोला के फुटबॉल ग्राउंड से निकलकर अपने सपने को साकार कर रहे हैं, वह भी अपने मेहनत की बल पर.

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फुटबॉल मैच का आनंद लेते लोग (ETV Bharat)

फुटबॉल के प्रति इतनी दीवानगी क्यों?: इस बारे में बैंक कर्मी और फुटबॉल आयोजन समिति के संयोजक मायाराम उरांव कहते हैं, 'फुटबॉल के पीछे इसीलिए लोग पागल हैं या पीछे दौड़ते हैं, क्योंकि उसमें मेहनत करना पड़ता है. यहां के आदिवासी जो बच्चे हैं, वह मेहनती हैं. और सब खेल में उतना मेहनत नहीं लगता है. लागत भी इस खेल में कम लगती है. इसलिए भी यहां के बच्चे फुटबॉल बहुत खेलते हैं.'

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हर साल फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन (ETV Bharat)

कब हुआ था सरना फुटबॉल क्लब का गठन?: वैसे तो यहां आजादी के काफी पहले से ही फुटबॉल खेला जाता था लेकिन बीच के वर्षों में इसका चलन कुछ कम हो गया. 1981 में स्थानीय लोगों ने मिलकर सरना फुटबॉल क्लब का गठन किया. जिसके बाद फुटबॉल खेलने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई. पिछले 45-46 सालों में हजारों प्लेयर सामने आए. कई ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई तो कई खिलाड़ी आज नौकरी करते हुए देश की सेवा कर रहे हैं.

Jheel Tola of Purnea
झीलटोला फुटबॉल मैदान (ETV Bharat)

सरकारी उदासीनता से लोग निराश: फुटबॉल खिलाड़ी और स्थानीय लोग कहते हैं कि सरकारी मदद अभी तक इस ग्राउंड तक नहीं पहुंची है. अगर सरकार इस आदिवासी समुदाय के ऊपर ध्यान दे तो आने वाले समय में इस ग्राउंड से फुटबॉल खिलाड़ी उभर कर पूरे विश्व में इस पूर्णिया जिले के झील टोला का नाम रोशन करते दिखेंगे, क्योंकि अभी भी इस झील टोला के बहुत सारे युवा खिलाड़ी गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं.

"इस खेल ग्राउंड में 15 अगस्त के दिन बिहार सरकार के कई मंत्री, सांसद और विधायक आकर खेल का उद्घाटन करते हैं और कई बड़ी-बड़ी बात कह कर चले जाते हैं लेकिन इन लोगों का सपना पूरा नहीं करते हैं. आज या खेल मैदान आंसू रो रहा है. अगर इस मैदान को सरकारी मदद मिलती या फिर खिलाड़ियों को तो यह लोग विश्व में भी अपना नाम रोशन करते दिखते."- ध्रुव कुमार, स्थानीय

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फुटबॉल को लेकर लोगों में दीवानगी (ETV Bharat)

क्या कहते हैं जानकार?: पूर्णिया के वरिष्ठ पत्रकार भोला ठाकुर भी बताते हैं कि जिस प्रकार यहां के फुटबॉल खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक खेलकर अपने देश का नाम रोशन किया है लेकिन इन्हें सरकारी सहायता नहीं मिलती है. वे कहते हैं कि अगर सरकार गंभीरता से ध्यान दे तो ये छोटे और युवा फुटबॉलर बेहतरीन प्लेयर बन सकते हैं.

"सरकार को इन खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए. अगर मदद मिली तो यहां के युवा खिलाड़ी देश के साथ-साथ दुनिया भर में भी अपना नाम रोशन करते दिखेंगे."- भोला ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार

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