Success Story: 'सामाजिक ताना को बोल्ड कर अंडर-19 तक सफर' क्रिकेटर नैंसी की प्रेरक कहानी
नैंसी सीमित संसाधन और सामाजिक ताना के बीच बिहार अंडर-19 में जगह बनायी. आज लेग ब्रेक स्पिनर और गुगली बॉलर के रूप में पहचान बनायी.

Published : January 11, 2026 at 4:17 PM IST
गयाजी: गांव से निकल कर बिहार अंडर-19 तक पहुंचने वाली नैंसी कुमारी महिला क्रिकेटरों की पहचान बन रही हैं. सीमित संसाधन, सामाजिक तानों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद नैंसी के हाथ कभी नहीं रुके. एक शानदार स्पिनर और गुगली गेंदबाज के रूप में पहचान बनायी.
5 साल की उम्र से क्रिकेट का शौक रखने वाली नैंसी अंडर-19 तक कैसे पहुंची, उसे खुद अंदाजा नहीं है. नैंसी कहती हैं कि 'बचपन में भाई के साथ खेलते थे. क्रिकेट खेलने से अंदर से खुशी महसूस होती तो इस खेल को आगे बढ़ाने का मन किया. खेलते-खेलते यहां तक कब पहुंच गए मुझे पता ही नहीं चला.'
खरखुरा गांव की रहने वाली है नैंसी: बिहार के गया जिले के खरखुरा गांव की नैंसी के पिता संजय कुमार मध्य विद्यालय मलाही अतरी में सरकारी शिक्षक हैं और मां सावली गृहणि हैं. जिस वक्त नैंसी ने खेलना शुरू किया था तो लोग बहुत ताने देते थे कि 'लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती है.'
एक वक्त स्टेडियम हो गया था बंद: समाज के तानों को इग्नोर कर दिया था, लेकिन जिले में खेल की सुविधा नहीं थी. नैंसी को अंडर-19 तक पहुंचने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ा. नैंसी बताती हैं कि कोरोना काल तक जिले के हिंडले फील्ड में प्रैक्टिस करती थी, लेकिन लॉकडाउन लगने के कारण इस मैदान को बंद कर दिया गया था. इसके बाद गांधी मैदान हरिहर सुब्रमण्यम स्टेडियम में पहुंची.

दौड़कर पहुंचती थी मैदान: नैंसी के घर से यह मैदान 4 किमी दूर है. रोज सुबह उठकर क्रिकेट किट लेकर नैंसी दौड़ते हुए मैदान पहुंचती थी कि कहीं लेट ना हो जाए नहीं तो प्रैक्टिस छूट जाएगी. यहां नैंसी को यंग ब्वॉयज एंड गर्ल्स एकेडमी के कोच राजेश कुमार ने ट्रेनिंग दी. आज नैंसी की सफलता से राजेश काफी खुश हैं.
"गांव की लड़की ने अपने जिला का नाम रोशन किया है. उम्मीद है कि एक दिन भारतीय महिला क्रिकेट टीम में जगह बनाने में सफल होगी. अभी अगले दो तीन साल विमेंस प्रीमियर लीग लिए तैयार करने का लक्ष्य है." -राजेश कुमार, कोच
2023 पहली सफलता: नैंसी की मेहनत का फल साल 2023 में मिला. 2023 में नैंसी का चयन राज्यस्तरीय अंडर-15 टीम में हुआ. बिहार अंडर 15 टीम में नैंसी ने दो मैच खेली. पहले मैंच में झारखंड के खिलाफ दो ओवर गेंदबाजी की थी. पहले मेडेन और दूसरे ओवर में 4 रन दी थी. दूसरा मैच बिहार बनाम सौराष्ट्र के खिलाफ खेलीं. इसमें 7 ओवर गेंदबाजी की थी. 20 रन देकर 4 विकेट अपने नाम की थी.
लेग ब्रेक बॉलर से पहचान: नैंसी एक लाजवाब लेग ब्रेक और गूगली बॉलर है. लेग ब्रेक बॉलर गेंद को फेंकने के लिए अपनी कलाई और उंगलियों को घुमाता है. दाएं हाथ के बल्लेवाज के लिए गेंद ऑफ स्टांप से दूर घूमती है. इससे बल्लेबाज भ्रमित हो जाता है और आउट होने के चांस ज्यादा होते हैं.

गुगली बॉलिंग में महारत: गुगली जिसे रॉन्ग-अन भी कहा जाता है. एक रिवर्स लेग ब्रेक है. इसमें बॉलर अपनी हथेली को बल्लेबाज की ओर घुमाकर गेंद को फेंकता है. इससे बल्लेबाज के लिए बॉल लेग स्टंप की ओर से आता है. इससे बल्लेबाज के भ्रमित होने के चांस अधिक होते हैं. कम रन या मेडेन ओवर निकालने के लिए यह एक अच्छी स्किल है.
अंडर 19 में चयनित: नैंसी अपनी इसी स्किल के कारण BCCI के राज्य स्तरीय टीम अंडर 19 में चयनित हो पायी. इसको लेकर 8 दिसंबर को पटना में BCCI का ट्रायल हुआ था. इसमें नैंसी भी हिस्सा ली थी. नैंसी की गेंदबाजी से कोच प्रभावित हुए थे. 9 दिसंबर को BCCI ने राज्य स्तरीय टीम की सूची जारी की, जिसमें नैंसी भी शामिल थी.
WPL खेलना सपना: BCCI अंडर-19 बिहार की टीम 13 दिसंबर को हैदराबाद में छत्तीसगढ़ के खिलाफ मैच खेला. इसमें नैंसी का बेहतर प्रदर्शन रहा. हालांकि बिहार की टीम छत्तीसगढ़ से हार गयी. अब नैंसी हैदराबाद से वापस आकर फिर से गया में प्रैक्टिस कर रही है. नैंसी कहती हैं कि उनका सपना पहले WPL (Women's Premier League) में जाना है, जिसको लेकर मैदान में पसीना बहा रही है.

"इंडिया टीम में खेलना सपना है. हमारी कोशिश है कि 4 साल के अंदर WPL खेलें. WPL के लिए तैयारी कर रही हूं. आरसीबी में शामिल होकर आईपीएल खेलना भी लक्ष्य है." -नैंसी कुमारी, क्रिकेटर
एमएस धोनी आइडियल: नैंसी के लिए एमएस धोनी हमेसा से आइडियल रहे हैं. हालांकि धोनी एक बल्लेवाज हैं और नैंसी गेंदबाज, इसपर वे कहती हैं कि 'उनकी स्ट्रगल लाइफ से बहुत कुछ सीखने को मिला है.' महिला खिलाड़ी हरमनप्रीत कौर पसंदीदा खिलाड़ी हैं. उनका खेल के प्रति एग्रेशन, माइंडसेट पसंद है.
खेल सुविधाओं में कमी: हालांकि नैंसी की सरकार के प्रति थोड़ी नाराजगी भी है. नैंसी कहती हैं कि जिले में खेल की सुविधा नहीं है. गयाजी के जिस गांधी मैदान में वह प्रैक्टिस करती है, वहां शौचालय की सुविधा नहीं है. हरिहर सुब्रमण्यम स्टेडियम तो जर्जर अवस्था में है. इससे खिलाड़ियों को काफी परेशानी होती है. सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए.
जिलों में लड़कियों की टीम नहीं: नैंसी कुमारी कहती हैं कि बिहार की लड़कियां इसलिए क्रिकेट में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, क्योंकि यहां संसाधनों की कमी है. यहां बिहार में जिला स्तरीय टीम नहीं है, अगर हर जिले में टीम होती तो जिला स्तरीय टूर्नामेंट होता जिस से खिलाड़ियों को अच्छे प्रदर्शन करने में मदद मिलती. यहां इस खेल के लिए सरकार को ध्यान देने की जरूरत है ताकि बिहार की लड़कियां भी आगे बढ़ सकें.
"बिहार के जिलों में पुरुष खेलाड़ियों की टीम है, लेकिन महिला खेलाड़ियों की टीम नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लड़कियां खेलना पसंद नहीं करती है. हालांकि महिला खिलाड़ियों में बढ़ोतरी हो रही है. जब मैं शुरुआत की थी तो एक-दो लड़कियां खेलने के लिए आती थी, लेकिन अब काफी सारी लड़कियां खेलने के लिए आती है." -नैंसी कुमारी, क्रिकेटर अंडर-19

खेल के चक्कर में नहीं जाती थी स्कूल: आज नैंसी की कामयाबी से पूरा परिवार खुश है. नैंसी के पिता कहते हैं कि उनकी बेटी का अब तक ये सफर सिर्फ और सिर्फ नैंसी की मेहनत का नतीजा है. वो खेलने में इतनी मग्न थी कि स्कूल भी नहीं जा पाती थी. उस वक्त तो स्कूल वाले नामांकन रद्द तक करने का निर्णय ले लिया था, इसके बावजूद नैंसी के कदम कभी पीछे नहीं हटे और वह मैच खेलती रही.
"आज जहां भी है, उसमें उसकी मेहनत है. एक समय ऐसा भी आया जब स्कूल प्रबंधन ने नैंसी को स्कूल से नामांकन रद्द करने का निर्णय ले लिया था. बड़ी मिन्नत आरजू करने पर स्कूल राजी हुआ था." -संजय कुमार, पिता
पिता को मिलता था ताना: समाज से तानों को लेकर नैंसी कहती हैं कि कभी पिता लोगों की बात मेरे कानों तक नहीं पहुंचने दिए. आज परिवार के सपोर्ट से ही इस मुकाम तक पहुंची हूं. नैंसी खेलते-खेलते 12 साल की हो गयी थी. इस दौरान लोग कई तरह की बाते बनाते थे. कहते थे कि 'बेटी को क्यों खेला रहे हो, स्कूल भेजो, दिन जमाना खराब है, कुछ ऊंच-नीच हो जाएगा तो क्या करोगे.'
एक समय के लिए मां ने किया था विरोध: एक समय नैंसी की मां सावली को भी लगता था कि समाज के लोग सही कह रहे हैं. उन्होंने बेटी को क्रिकेट खेलने से मना कर दिया था, लेकिन पिता के सपोर्ट के कारण मां राजी हो गयी. आज सावली अपनी बेटी की कामयाबी से काफी खुश हैं.

नैंसी की बात ने दिल छू लिया: पुराने दिनों को याद कर सावली भावुक हो जाती हैं. कहती है कि यहां तक पहुंचना इतना आसान नहीं था. सावली रोज 7-8 घंटे तक मैदान में प्रैक्टिस करती है. 5 साल की उम्र में ही उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन नैंसी की एक बात ने दिल को छू लिया.
"मैंने खेलने से रोकने की कोशिश की तो नैंसी ने कहा कि मां एक दिन मैं भी क्रिकेट खेलूंगी और टीवी पर नजर आऊंगी. यह बात मेरे दिल को छू लिया. इसके बाद फिर कभी नैंसी को क्रिकेट खेलने से मना नहीं किया." -सावली, नैंसी की मां
दादा खुद मैदान लेकर जाते थे: नैंसी के 75 वर्षीय दादा रामचंद्र यादव पोती की कामयाबी से काफी खुश हैं. दादा कहते हैं कि मेरी पोती दिन-रात मेहनत की है. नैंसी के दादा पुरानी सोच के जरूर हैं, लेकिन पोती के शौक पर कभी ग्रहण नहीं लगने दिया. कहते हैं कि जब नैंसी 7 साल की थी तब से उसके दादा उसे ग्राउंड में लेकर जाते थे.

"कई सालों तक उसे खेल ग्राउंड लेकर जाते थे. खेल ग्राउंड में मां लंच लेकर जाती थी. आज खुश हैं कि परिवार की पहचान नैंसी से हो रही है. नैंसी को जब माता पिता से पैसे नहीं मिलते थे तो मैं देता था." -रामचंद्र यादव, दादा
लड़कियों के लिए प्रेरणा: गया जिले के लोग कहते हैं कि नैंसी सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, उन हजारों लड़कियों की उम्मीद है जो सपना देखती है. उसकी कहानी बताती है कि संघर्ष अगर सच्चा हो तो मंजिल जरूर मिलती है.
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