हरियाणा का "मिनी क्यूबा" भिवानी... यहां रिंग में उतरते ही बदल जाती है पहचान, परिवार और कोच तैयार कर रहे चैंपियनों की नई पौध
भिवानी की मिट्टी से लगातार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चैंपियन निकल रहे हैं. यहां बच्चों के परिवार और कोच इन चैंपियनों को तैयार कर रहे हैं.

Published : August 29, 2026 at 12:21 PM IST
भिवानी: भिवानी ने हरियाणा ही नहीं, बल्कि देश के खेल नक्शे पर मुक्केबाजी के लिए अपनी अलग पहचान बनाई है. यहां बॉक्सिंग महज एक खेल नहीं, बल्कि परिवारों की उम्मीद, युवाओं का जुनून और कई पीढ़ियों के सपनों का हिस्सा बन गया है. इसी मजबूत खेल संस्कृति ने भिवानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर "मिनी क्यूबा" की पहचान दिलाई है. प्रतिभा की तलाश से लेकर प्रशिक्षण, पोषण और खेल विज्ञान तक यहां मुक्केबाजों को तैयार करने का मजबूत माहौल दिखाई देता है.
"युवाओं में बॉक्सिंग का अलग ही जुनून": भिवानी बॉक्सिंग क्लब के प्रधान कमल सिंह ने ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान कहा कि, "यहां के युवाओं में बॉक्सिंग को लेकर अलग ही जुनून है. भिवानी के युवाओं में मुक्केबाजी के प्रति गजब का जुनून और जुझारूपन है. यहां का वातावरण और परिस्थितियां खिलाड़ियों को प्राकृतिक रूप से मजबूत बनाती हैं. अपनी सहनशक्ति और फिटनेस बढ़ाने के लिए कई मुक्केबाज सप्ताह में दो बार रेत के बड़े टीलों पर अभ्यास करते हैं. कठिन परिस्थितियों में किया गया यह अभ्यास रिंग में उनके आत्मविश्वास और स्टैमिना को मजबूत करता है."
कैप्टन हवा सिंह से शुरू हुई मजबूत परंपरा: बॉक्सिंग क्लब के प्रधान कमल सिंह ने आगे कहा कि, "भिवानी की बॉक्सिंग यात्रा किसी एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है. इसकी नींव कैप्टन हवा सिंह, मेताब सिंह, द्रोणाचार्य अवॉर्डी जगदीश सिंह, कोच नवीन शर्मा, राजेंद्र यादव और देवराज जैसे प्रशिक्षकों की वर्षों की मेहनत से पड़ी. इन लोगों ने ग्रामीण प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें मुक्केबाजी की बारीकियां सिखाईं और जिले में एक मजबूत खेल संस्कृति तैयार की."

1986 में SAI सेंटर ने बदली तस्वीर: कमल सिंह ने बताया कि, "साल 1986 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) केंद्र की स्थापना ने भिवानी की मुक्केबाजी को संस्थागत आधार दिया. इससे खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलने लगीं. संदीप गोलन जैसे खिलाड़ियों ने शुरुआती दौर में पहचान बनाई और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता तैयार किया. इसके बाद भिवानी के खिलाड़ियों की सफलता लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचती गई. साल 2008 के बीजिंग ओलंपिक में विजेंदर सिंह की ऐतिहासिक पदक जीत भिवानी के लिए बड़ा मोड़ साबित हुई. उनके प्रदर्शन ने जिले के युवाओं को यह भरोसा दिया कि छोटे शहर और गांव से निकलकर भी ओलंपिक पोडियम तक पहुंचा जा सकता है. विजेंदर की सफलता के बाद बड़ी संख्या में युवाओं ने बॉक्सिंग को करियर के रूप में अपनाया."

एक के बाद एक निकले बॉक्सिंग के सितारे: बॉक्सिंग क्लब के प्रधान कमल सिंह ने आगे कहा कि, " विजेंदर के बाद अखिल कुमार, विकास कृष्ण यादव, पूजा रानी बोहरा, जितेंद्र कुमार, दिनेश कुमार, मनीष कौशिक, सचिन मीताथल सहित कई मुक्केबाजों ने भिवानी की पहचान को आगे बढ़ाया. राष्ट्रमंडल खेलों में नीतू घणघस, जैस्मिन लंबोरिया, कविता चहल, प्रीति पंवार, साक्षी चौधरी और प्रिया जैसी महिला मुक्केबाजों ने भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. भिवानी से अब तक सात मुक्केबाजों को अर्जुन अवॉर्ड मिल चुका है और जिले ने करीब 450 पुरुष तथा 200 महिला अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज देश को दिए हैं."

कृषि प्रधान समाज ने दी शरीर को ताकत: वहीं, बॉक्सिंग कोच विष्णु ने कहा कि, "भिवानी की पहचान के पीछे यहां का ग्रामीण और कृषि प्रधान परिवेश भी बड़ी वजह है. भिवानी मुख्य रूप से कृषि बहुल क्षेत्र है. ग्रामीण और किसानी परिवेश से जुड़े बच्चों और युवाओं में शारीरिक मजबूती और स्टैमिना प्राकृतिक रूप से बेहतर होता है, जो बॉक्सिंग जैसे चुनौतीपूर्ण खेल के लिए बेहद जरूरी है. खेतों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी दिनचर्या युवाओं में मेहनत और सहनशक्ति की आदत विकसित करती है. विजेंदर सिंह की सफलता ने युवाओं के बीच बॉक्सिंग के प्रति विश्वास को और मजबूत किया. जब विजेंदर सिंह ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक हासिल किए तो उनकी सफलता पूरे क्षेत्र के युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा बनी. उनके बाद भारी संख्या में युवाओं ने रिंग में कदम रखा. भिवानी में बड़े उद्योग-धंधों और फैक्ट्रियों की कमी के कारण खेलों में रोजगार भी युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना."

सरकारी नौकरी की उम्मीद ने बढ़ाया जुनून: विष्णु ने कहा कि, "खेलों के जरिए रोजगार की संभावनाओं ने युवाओं को बॉक्सिंग के प्रति और अधिक प्रोत्साहित किया. कृषि पृष्ठभूमि से मिली शारीरिक ताकत, विजेंदर की प्रेरणा और रोजगार के अवसरों ने मिलकर भिवानी को मिनी क्यूबा बनाया."
नई पीढ़ी की उम्मीदें रिंग में: वहीं, खिलाड़ी तिलक का कहना है कि, "भिवानी में बॉक्सिंग का माहौल युवाओं को लगातार प्रेरित करता है. यहां बड़े खिलाड़ियों की उपलब्धियां नए खिलाड़ियों के लिए उदाहरण बनती हैं. एक खिलाड़ी की सफलता दूसरे युवाओं को रिंग में आने और अपने सपनों को लक्ष्य में बदलने का हौसला देती है."

25 से ज्यादा संस्थानों में तैयार हो रहे खिलाड़ी: आज भिवानी में बॉक्सिंग का दायरा किसी एक अकादमी या प्रशिक्षण केंद्र तक सीमित नहीं है. जिले के 25 से अधिक सरकारी और निजी संस्थानों में करीब 2 हजार युवा अभ्यास कर रहे हैं. इनमें छह साल की उम्र से लेकर सीनियर स्तर तक के खिलाड़ी शामिल हैं. रिंग में उतरने वाले इन बच्चों के पीछे कोचों के साथ उनके परिवारों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है.

परिवार भी बना रहे चैंपियनों की राह: भिवानी में अभिभावक बच्चों के प्रशिक्षण को लेकर गंभीर नजर आते हैं. वे रिंग के बाहर बैठकर अभ्यास देखते हैं और खिलाड़ियों की डाइट व पोषण का भी ध्यान रखते हैं. यही वजह है कि यहां बॉक्सिंग केवल खिलाड़ी और कोच के बीच का रिश्ता नहीं रह गया है, बल्कि परिवार भी इस पूरी तैयारी का हिस्सा बन चुका है. भिवानी की बॉक्सिंग की असली ताकत उसकी मिट्टी, मेहनतकश ग्रामीण पृष्ठभूमि, समर्पित कोच, खेल के प्रति जुनून और परिवारों के सहयोग का मेल है. यही वजह है कि यहां हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी की सफलता से प्रेरणा लेकर रिंग में उतर रही है. भिवानी ने मुक्केबाजी को अपनी पहचान बना लिया है और यही पहचान आने वाले वर्षों में चैंपियनों की नई पौध तैयार करने की नींव बन रही है.
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