क्या होती है डाक कांवड़? एक क्लिक में जानिए महत्व और यात्रा के नियम
डाक कांवड़ समय की रफ्तार के साथ भोले की भक्ति का प्रतीक है. यह कठिन तपस्या और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 9, 2026 at 12:56 PM IST
|Updated : August 9, 2026 at 4:52 PM IST
हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार में कांवड़ मेले के अंतिम चरण में है. हरिद्वार में डाक कांवड़ियों का जनसैलाब उमड़ रहा है. सामान्य कांवड़ यात्रा के मुकाबले डाक कांवड़ की यात्रा बेहद कठिन और तेज मानी जाती है. इसमें कांवड़िए गंगाजल लेकर बिना रुके अपने गंतव्य की ओर रवाना होते हैं. कई बार कांवड़ियों के समूह बारी बारी से दौड़कर या वाहन के माध्यम से यह यात्रा पूरी करते हैं. गंगाजल को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने और समय पर भगवान शिव का जलाभिषेक करने की मान्यता के चलते डाक कांवड़ में समय का विशेष महत्व होता है. शास्त्रों में डाक कांवड़ का कहीं वर्णन नहीं है. केवल भगवान परशुराम और श्रवण कुमार से जुड़ी कथाओं का ही वर्णन किया गया है.
क्या है डाक कांवड़: डाक कांवड़ में यात्रा का समय नियत होता है. कांवड़िए समय टारगेट सेट करके आते हैं. वाहनों से ग्रुपों में कांवड़िए हरिद्वार आते हैं. सबसे पहले हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान करते हैं. पूजा अर्चना कर पवित्र गंगाजल लेकर अपने गांव, शहर या निर्धारित शिवालय के लिए रवाना होते हैं. इस यात्रा की खास बात यह है कि गंगाजल को जमीन पर नहीं रखा जाता. कांवड़िए लगातार आगे बढ़ते रहते हैं. जिस पात्र में गंगाजल भरा जाता है उसे लेकर ग्रुप शामिल कांवड़िए पैदल दौड़ते रहते हैं. एक दूसरे को सौंपकर यात्रा जारी रखी जाती है, ताकि गंगाजल गंतव्य तक पहुंचने में देरी न हो.
कैसे होती है डाक कांवड़: डाक कांवड़ को भगवान शिव के प्रति कठिन तपस्या और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि सावन में गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करने से भक्त की मनोकामना पूरी होती है. डाक कांवड़ में समय सीमा के भीतर जल पहुंचाने का संकल्प इसे सामान्य कांवड़ यात्रा से अलग बनाता है.
यही वजह है कि अंतिम दिनों में हाईवे और कांवड़ मार्गों पर बड़ी संख्या में डाक कांवड़ दिखाई देती हैं. एक कांवड़िया आगे दौड़ता है तो दूसरा उसके पीछे चलता है. पीछे चलने के लिए दोपहिया वाहन साथ रहता है. कुछ दूरी के बाद कांवड़ दूसरे कांवड़िए को सौंप दी जाती है. इस तरह बिना कांवड़ को जमीन पर रखे यात्रा जारी रहती है.
शास्त्रों में नहीं डाक कांवड़ का वर्णन: वहीं शास्त्रों में डाक कांवड़ के बारे में कोई वर्णन नहीं है. पिछले दो दशकों में डाक कांवड़ का चलन तेजी से बढ़ा है. निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरी बताते हैं कि डाक कांवड़ को लेकर शास्त्रों में कहीं कुछ जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन यह कांवड़ का शुद्ध रूप माना जाता है. पवित्र गंगाजल को जमीन पर नहीं रखा जाता है.

भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए जाने वाले गंगा जल की शुद्धता बनाए रखने के लिए डाक कांवड़िए बिना रुके और थके दौड़ते हैं. सामान्य कांवड़ यात्रा में कांवड़िए धीरे धीरे विश्राम करते हुए, अपने गंतव्य की ओर आगे बढ़ते हैं.

पिछले कुछ सालों में बढ़ा डाक कांवड़ का चलन: गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में डाक कांवड़ का चलन तेजी से बढ़ा है. कांवड़िए वाहनों के जरिए हरिद्वार पहुंचते हैं. ग्रुप में शामिल कांवड़िए दोपहिया वाहन भी साथ लाते हैं. इसमें एक कांवड़िया पैदल तो बाकी बाइक और बड़े वाहनों में चलते हैं. एक के बाद एक ग्रुप में शामिल कांवड़िए बिना रुके एक निर्धारित समय सीमा में अपने गंतव्य पहुंचते हैं.
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