Explained: SCO का ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर क्यों जरूरी, भारत को क्या फायदा होगा
SCO का ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर यूरेशिया में वैज्ञानिक सहयोग को स्वच्छ-ऊर्जा, जलवायु लचीलेपन और सतत विकास के लिए एक रणनीतिक साधन में बदल सकता है.

Published : September 2, 2026 at 7:33 PM IST
नई दिल्ली: शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के बिश्केक शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू न सिर्फ इसके भू-राजनीतिक विचार-विमर्श में हो सकता है, बल्कि एक कम ध्यान आकर्षित करने वाले फैसले में भी हो सकता है: 2026-2030 के लिए एक SCO 'ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर' (Green Technology Corridor) बनाने के प्रोग्राम को अपनाना.
यह प्रोग्राम, जिसका औपचारिक शीर्षक 'SCO सदस्य देशों का 2026–2030 के लिए एससीओ ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर (वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग) के गठन पर सहयोग कार्यक्रम' है, संभावित रूप से एक सामान्य पर्यावरण सहयोग समझौते से कहीं अधिक है.
अगर इसे पर्याप्त वित्तपोषण, तकनीकी-साझाकरण तंत्र और मापने योग्य परियोजनाओं के साथ लागू किया जाता है, तो यह SCO को एक ऐसा मंच प्रदान कर सकता है जो यूरेशिया के एक बड़े हिस्से में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्वच्छ प्रौद्योगिकी, ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु लचीलेपन (climate resilience) को आपस में जोड़ सके.
ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर प्रोग्राम को अपनाने का फैसला असल में इस साल 22 मई को बिश्केक में SCO सदस्य देशों के साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्रालयों के प्रमुखों की 10वीं बैठक में लिया गया था.

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता किर्गिज गणराज्य की विज्ञान, उच्च शिक्षा और नवाचार मंत्री गुलजात इस्मातोवा (Gulzat Isamatova) ने की थी, और इसमें SCO के दूसरे सदस्य देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया था. प्रतिभागियों ने संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं के लिए पहली प्रतियोगिता के नतीजों पर चर्चा की और इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण को गति देने के लिए विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों के बीच सीधे संबंधों को मजबूत करने की जरूरत पर बल दिया.
बैठक के बाद, एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए जिसमें आने वाले समय के लिए एससीओ की वैज्ञानिक और तकनीकी नीति की रूपरेखा तय की गई. मंत्री गुलजात इस्मातोवा ने कहा कि संयुक्त वैज्ञानिक पहल एक प्रमुख रणनीतिक संसाधन बन रही है, और हरित प्रौद्योगिकियों की ओर बदलाव सभी सदस्य देशों के लिए सतत विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करेगा.
ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन ऊर्जा बाजारों, औद्योगिक रणनीतियों और विकास प्राथमिकताओं को नया आकार दे रहा है, यह पहल संभावित रूप से एससीओ को उन तकनीकों में सहयोग के एक मंच के रूप में बदल सकती है जो आने वाले समय में आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और रणनीतिक स्वायत्तता को तेजी से निर्धारित करेंगी.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा आकलन से इसकी जरूरत का पता चलता है. WMO की 'स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025' रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015–2025 अब तक के रिकॉर्ड में सबसे गर्म 11 साल रहे, जबकि पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन 65 वर्षों के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. रिपोर्ट में लगातार ग्लेशियर के नुकसान और तेजी से नुकसानदायक होती चरम मौसम की घटनाओं का भी जिक्र किया गया है.
जलवायु घोषणाओं से लेकर तकनीकी सहयोग तक
ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर का मुख्य महत्व वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग पर इसके जोर में निहित है. जलवायु कूटनीति पारंपरिक रूप से उत्सर्जन लक्ष्यों, वित्तीय प्रतिबद्धताओं और बोझ साझा करने पर वार्ताओं पर केंद्रित रही है. ये अपरिहार्य बने हुए हैं, लेकिन गहराता जलवायु संकट तेजी से कुछ अधिक ठोस मांग करता है: ऐसी तकनीकें जो वास्तव में उत्सर्जन को कम कर सकें, ऊर्जा दक्षता में सुधार कर सकें, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा कर सकें और अर्थव्यवस्थाओं को जलवायु प्रभावों के अनुकूल ढलने में सक्षम बना सकें.

एससीओ के पास पहले से ही इसके लिए एक संस्थागत आधार है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालयों और विभागों के प्रमुखों की बैठक साल 2012 से चल रही है और यह वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग पर एक स्थायी कार्य समूह का संचालन करती है. इसके निर्धारित क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग, ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता, पृथ्वी विज्ञान, भूकंप विज्ञान और भूविज्ञान, सूचना और दूरसंचार प्रौद्योगिकी तथा अन्य वैज्ञानिक क्षेत्र शामिल हैं.
इसलिए, ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर संभावित रूप से मौजूदा वैज्ञानिक सहयोग को अधिक केंद्रित हरित-प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में बदल सकता है.
SCO के लिए यूरेशिया की भौगोलिक स्थिति क्यों महत्वपूर्ण
SCO का भौगोलिक दायरा इस समझौते को विशेष महत्व देता है. SCO में चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस शामिल हैं. भौगोलिक क्षेत्र और जनसंख्या के मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है, जो दुनिया के कुल क्षेत्रफल का कम से कम 24 प्रतिशत (यूरेशिया का 65 प्रतिशत) और दुनिया की आबादी का 42 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है. वर्ष 2024 तक, इसकी कंबाइंड नॉमिनल GDP दुनिया के कुल का लगभग 23 प्रतिशत है, जबकि क्रय शक्ति समानता (PPP) पर आधारित इसकी GDP दुनिया के कुल हिस्से का लगभग 36 प्रतिशत है.
यह संगठन उन देशों को एक साथ लाता है जिनकी ऊर्जा प्रणाली, संसाधन संपदा, औद्योगिक संरचना और आर्थिक विकास के चरण एक-दूसरे से बहुत अलग हैं. भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं और नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादकों में शामिल हैं; रूस और मध्य एशियाई देशों के पास विशाल हाइड्रोकार्बन और खनिज संसाधन हैं; जबकि कई मध्य एशियाई सदस्य देश एक ही समय में पानी की कमी, रेगिस्तान का बढ़ना, ग्लेशियरों के पिघलने और चरम मौसम जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
कुछ सदस्यों के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रिड का आधुनिकीकरण तुरंत प्राथमिकता हो सकती है. दूसरों के लिए, यह ऊर्जा दक्षता, स्वच्छ औद्योगिक उत्पादन, मीथेन में कमी, जल संरक्षण, जलवायु-अनुकूल कृषि या नाजुक पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी के लिए तकनीक हो सकती है.
इन क्षमताओं को आपस में जोड़ने वाला एक कॉरीडोर SCO को जलवायु परिवर्तन को सिर्फ एक कूटनीतिक मुद्दे के बजाय एक तकनीकी और विकास संबंधी चुनौती के रूप में देखने में सक्षम बना सकता है.
ऊर्जा-सुरक्षा संबंध
यह समझौता वैश्विक ऊर्जा निवेश में हो रहे व्यापक बदलाव में भी फिट बैठता है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की 'वर्ल्ड एनर्जी इन्वेस्टमेंट 2026' रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक ऊर्जा निवेश रिकॉर्ड 3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें से करीब 2.2 ट्रिलियन डॉलर स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में जाएगा. इन तकनीकों में नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, बिजली ग्रिड, स्टोरेज, कम उत्सर्जन वाले ईंधन, ऊर्जा दक्षता और विद्युतीकरण शामिल हैं. इस तरह, स्वच्छ ऊर्जा में होने वाला निवेश जीवाश्म ईंधन में किए जाने वाले निवेश की तुलना में लगभग दोगुना होने की उम्मीद है.
इससे 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' का रणनीतिक महत्व बदल जाता है.
नवीकरणीय ऊर्जा अब सिर्फ एक जलवायु नीति का साधन नहीं रह गई है. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरियां, बिजली ग्रिड, परमाणु प्रौद्योगिकी, ऊर्जा दक्षता और कम कार्बन वाली औद्योगिक प्रक्रियाएं तेजी से ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी संप्रभुता से जुड़ती जा रही हैं.
हिमालयी पहलू
26 अगस्त को नेपाल में हिमालय में आई अचानक बाढ़ के बाद, इस समझौते का संदर्भ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है.
हालांकि बिश्केक समझौते को उस विशेष आपदा की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता है, फिर भी यह घटना उस प्रकार के जलवायु और पर्यावरणीय जोखिमों को दर्शाती है जिनसे निपटने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग को तेजी से आगे आना चाहिए.
हिमालय एक सीमा पार (transboundary) पारिस्थितिक तंत्र है. ऊंचे पहाड़ों में ग्लेशियर और बर्फ में होने वाले बदलाव से कई देशों में नदियों के बहाव, जलविद्युत, कृषि और समुदाय प्रभावित होते हैं. पर्वतीय प्रणाली के एक हिस्से में आने वाली आपदा परिवहन नेटवर्क, बिजली के बुनियादी ढांचे और निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को तेजी से प्रभावित कर सकती है.
इससे सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन, रिमोट सेंसिंग, हिमनद निगरानी, भूवैज्ञानिक निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की तकनीक, SCO के व्यापक ग्रीन टेक्नोलॉजी एजेंडा का अहम हिस्सा बन सकती हैं.
खास तौर पर, भारत के पास अंतरिक्ष-आधारित अर्थ ऑब्जर्वेशन और रिमोट सेंसिंग में बड़ी क्षमताएं हैं, जिन्हें ऐसे सहयोग में शामिल किया जा सकता है.
इस समझौते से भारत को क्या फायदा होगा?
भारत के लिए, यह समझौता उसकी जलवायु और प्रौद्योगिकी कूटनीति को आगे बढ़ाने का एक और संभावित अवसर प्रदान करता है.
भारत ने लगातार एक ऐसे जलवायु दृष्टिकोण का समर्थन किया है जो नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और अन्य स्वच्छ तकनीकों का विस्तार करते हुए, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के साथ-साथ विकास की प्राथमिकताओं को भी जोड़ता है.
SCO ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर में भागीदारी से भारत को सौर ऊर्जा प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष-आधारित पर्यावरण निगरानी, जलवायु प्रबंधन में लागू डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, बैटरी स्टोरेज, आपदा-चेतावनी प्रणालियों और जलवायु-अनुकूल कृषि जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन और निर्यात करने का मौका मिल सकता है.
इससे भारतीय कंपनियों और रिसर्च संस्थानों को मध्य एशियाई और यूरेशिया की बाजारों तक पहुंच भी मिल सकती है.
आखिरकार, प्रस्तावित ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर SCO को एक साथ दो चुनौतियों से निपटने का अवसर दे सकता है: अर्थव्यवस्थाओं को कार्बन-मुक्त करने की जरूरत और उन्हें पहले से हो रहे जलवायु प्रभावों के प्रति लचीला बनाने की आवश्यकता.
वैश्विक जलवायु दृष्टिकोण तात्कालिकता को स्पष्ट करता है. WMO को उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक तापमान ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर बना रहेगा, जबकि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुमान संकेत देते हैं कि दुनिया को 1.5 डिग्री सेल्सियस के रास्ते पर लाने के लिए वर्तमान राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं अभी भी अपर्याप्त हैं. इसके साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, IEA ने 2026 में स्वच्छ ऊर्जा निवेश में $2.2 ट्रिलियन डॉलर का अनुमान लगाया है.
SCO की चुनौती - और अवसर - यह सुनिश्चित करना है कि उसका ग्रीन टेक्नोलॉजी कॉरिडोर इस परिवर्तन का हिस्सा बने.
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