बजट 2026-27: क्या सिर्फ आंकड़ों के फेर में उलझकर रह गया भारत का शहरीकरण?
अब समय आ गया है कि भारत में शहरीकरण की बदलती चुनौतियों से निपटने के लिए नगर निकायों की क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी जाए.


Published : February 22, 2026 at 5:55 AM IST
संयुक्त राष्ट्र की 'वर्ल्ड अर्बनाइजेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2025' रिपोर्ट के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया भर के शहरों की आबादी में 986 मिलियन (लगभग 98.6 करोड़) की बढ़ोतरी होने का अनुमान है.
खास बात यह है कि इस बढ़ी हुई आबादी का आधा हिस्सा दुनिया के सिर्फ सात देशों में होगा, जिनमें भारत इस शहरी बदलाव के केंद्र में रहने वाला है. आमतौर पर हम आबादी को सिर्फ 'ग्रामीण' या 'शहरी' दो हिस्सों में बांटकर देखते हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच के तेजी से बदलते क्षेत्रों (पेरी-अर्बन सेटलमेंट्स) को भी स्वीकार करती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत की करीब 40.3 प्रतिशत आबादी शहरों में रह रही है, जबकि लगभग 44 प्रतिशत लोग कस्बों और शहरों से सटे विकसित हो रहे इलाकों में रहते हैं. यह आंकड़ा भारत के आधिकारिक शहरीकरण दर (31.2%) से कहीं ज्यादा है, जो यह बताता है कि हमें शहरी विकास से जुड़ी चुनौतियों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है. खासकर छोटे शहरों और अस्थायी बस्तियों की समस्याओं को सुलझाना अब अनिवार्य हो गया है.

आज मुख्य चुनौती यह है कि बड़े महानगरों से आगे निकलकर शहरी विस्तार को इस तरह बढ़ावा दिया जाए कि शहर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बन सकें. साथ ही, वे असमानता, जलवायु परिवर्तन के खतरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं से निपटने में सक्षम हों.
गत कुछ वर्षों में सरकार ने शहरी विकास को प्राथमिकता देने का मन बनाया है, जिसके तहत ध्यान बुनियादी सेवाओं में सुधार से हटाकर दीर्घकालिक योजना, बुनियादी ढांचे और स्थिरता पर केंद्रित किया गया है.
इस साल के बजट में, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) को 85,522 करोड़ रुपये का आवंटन प्राप्त हुआ है, जो कि 2025-26 के संशोधित बजट अनुमान 52,204 करोड़ की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि है. हालांकि, कुल केंद्रीय बजट में इस मंत्रालय की हिस्सेदारी 2025-26 के बजट अनुमान 1.9 प्रतिशत से घटकर 2026-27 में 1.6 प्रतिशत रह गई है.
इस साल के बजट की दो सबसे महत्वपूर्ण घोषणाएं हैं. पहला, टियर-II और टियर-III शहरों पर सीधा ध्यान केंद्रित करना ताकि उन्हें विकास के इंजन के रूप में विकसित किया जा सके. और दूसरा, 'सिटी इकोनॉमिक रीजन्स' (CERs) का विकास करना ताकि शहरी समूहों की छिपी हुई क्षमता का लाभ उठाया जा सके. बजट में अगले पांच वर्षों के लिए प्रति CER 5000 करोड़ आवंटित करने का प्रस्ताव है.
सिद्धांत रूप में, ये CERs लोगों और कंपनियों को अधिक उत्पादक बना सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां एक साझा लेबर मार्केट होगा जहां कंपनियों और कर्मचारियों का तालमेल आसान हो जाएगा. साथ ही निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं के बीच बेहतर जुड़ाव होगा और ज्ञान के आदान-प्रदान से नवाचार को बढ़ावा मिलेगा. इसके साथ ही, CERs परिवहन, आवास, आर्थिक प्रणालियों और जलवायु रणनीतियों को एक साथ जोड़कर भविष्य की शहरी योजना के नए रास्ते खोलते हैं.
इसके अतिरिक्त, सरकार का टियर-II और टियर-III शहरों पर फिर से बढ़ा हुआ ध्यान 2023–24 के पिछले बजट घोषणाओं के साथ मेल खाता है. तब 10,000 करोड़ रुपये के शुरुआती निवेश के साथ अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (UIDF) बनाया गया था, जिसके बाद 2025-26 में 1 लाख करोड़ रुपये के अर्बन चैलेंज फंड (UCF) का प्रस्ताव रखा गया.
इन फंडों का उद्देश्य शहरों के रचनात्मक पुनर्विकास और पानी एवं स्वच्छता सुविधाओं में सुधार से जुड़ी ठोस परियोजनाओं को, प्रतिस्पर्धा के आधार पर आंशिक रूप से वित्तपोषित करना है.
पिछले सप्ताह ही कैबिनेट द्वारा अगले पांच वर्षों के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता वाले UCF को मंजूरी दी गई है. अब 10 लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहर, राज्यों की राजधानियां और कम से कम एक लाख की आबादी वाले प्रमुख औद्योगिक शहर इन फंडों का लाभ उठाकर नए 'ग्रोथ हब' के रूप में उभर सकते हैं.

| आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अंतर्गत योजनावार आवंटन (करोड़ रुपये में) | |||
| 2025-26 (BE) | 2025-26 (RE) | 2026-27 (BE) | |
| एमआरटीएस और मेट्रो परियोजना | 31889 | 27550 | 28796 |
| एमआरटीएस और मेट्रो परियोजना - एनसीआरटीसी | 2918 | 2000 | 2200 |
| पीएम स्वनिधि | 373 | 572 | 900 |
| पीएमएवाई-यू और पीएमएवाई-यू 2.0 | 23294 | 7800 | 21625 |
| अमृत | 10000 | 7500 | 8000 |
| एनयूडीएम | 1250 | 300 | |
| एसबीएम | 5000 | 2000 | 2500 |
| पीएम ई-बस | 1310 | 300 | 500 |
| यूसीएफ | 10000 | 1000 | 10000 |
| Source: www.indiabudget.gov.in | |||
शहरी योजनाओं में, मेट्रो रेल और मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (MRTS) के लिए 30,996 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है, जो आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) के कुल बजट का लगभग 36 प्रतिशत है. यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि सरकार की नीति 24 शहरों में चल रहे करीब 1036 किलोमीटर के मेट्रो नेटवर्क को मजबूत करने और टियर-II शहरों में स्वीकृत 17 नई मेट्रो परियोजनाओं के विस्तार पर टिकी है.

मेट्रो केंद्रित यह निवेश 'नेशनल ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट पॉलिसी (2017)' को भी समर्थन देता है, जिसका मकसद मेट्रो स्टेशनों के आसपास परिवहन के विभिन्न साधनों को जोड़ना और व्यावसायिक लाभ उठाना है. हालांकि, भारत के कई शहरों में 'लास्ट माइल कनेक्टिविटी' की कमी मेट्रो की सवारी संख्या को काफी सीमित कर देती है. शहरी आवाजाही को बेहतर बनाने के लिए बिना मोटर वाले वाहनों (जैसे साइकिल) और अंतिम छोर तक जुड़ाव की सुविधाएं बहुत जरूरी हैं.
इस लिहाज से, पीएम ई-बस सेवा के बजट में पिछले साल के मुकाबले 2026-27 में लगभग 77 प्रतिशत की कटौती होना चिंता का विषय है. 'आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26' के अनुसार, देश की 61 प्रतिशत बसें केवल नौ बड़े महानगरों में केंद्रित हैं, जो बस सेवाओं की भारी कमी को दर्शाता है. टियर-II और टियर-III शहरों में बस सेवाओं की इस लगातार कमी के कारण लोग निजी वाहनों पर निर्भर होने को मजबूर हैं, जिससे ट्रैफिक जाम बढ़ रहा है और उत्पादकता घट रही है.
किफायती आवास तक पहुंच शहरी असमानता को दूर करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन लाखों शहरी निवासियों के लिए अपना घर होने का सपना अब भी पहुंच से दूर है. कम आय वाले, झुग्गियों या अस्थाई बस्तियों में रहने को मजबूर हैं.
नाइट फ्रैंक-नरेडको (Knight Frank-NAREDCO) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आठ प्रमुख शहरों में किफायती घरों (50 लाख रुपये से कम कीमत वाले) की आपूर्ति में भारी गिरावट आई है. यह 2018 के 52.4 प्रतिशत से घटकर 2025 तक मात्र 17 प्रतिशत रह गई है. इस स्थिति के बीच, प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी (PMAY-U) और इसके नए 2.0 संस्करण के बजट आवंटन में कमी की गई है. 2024-25 के 30,171 करोड़ के मुकाबले 2026-27 के लिए इसे घटाकर 21,625 करोड़ कर दिया गया है, जिससे शहरों में सस्ते घरों की उपलब्धता और कम हो जाएगी.
इसके अलावा, शहरी गरीबों के लिए सबसे प्रभावी मानी जाने वाली भागीदारी में किफायती आवास (AHP) और इन-सीटू स्लम पुनर्विकास (ISSR) योजनाओं की हिस्सेदारी कुल स्वीकृत घरों में केवल 14 प्रतिशत है, जो 2025-26 में गिरकर मात्र 7 प्रतिशत तक रह गई थी. साथ ही, इन घरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और रोजगार के अवसरों की दूरी के कारण लोग इनमें रहने से कतरा रहे हैं.
बजट में आर्थिक रूप से कमजोर, कम आय वर्ग (LIG) और मध्यम आय वर्ग (MIG) के लिए ब्याज सब्सिडी योजना का आवंटन भी 3,500 करोड़ (2025-26) से घटाकर 3,000 करोड़ (2026-27) कर दिया गया है. वहीं, औद्योगिक आवास योजना के लिए मात्र 400 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जबकि पिछले साल यह 2,500 करोड़ था. ये सभी कटौती आवास संकट को और गहरा सकती हैं, जिससे कम आय वाले परिवारों के लिए घर पाना और भी मुश्किल हो जाएगा.

शहरी जलापूर्ति, सीवरेज और ठोस कचरे के वैज्ञानिक एवं टिकाऊ प्रबंधन के लिए सरकार की दो प्रमुख योजनाओं- अमृत (AMRUT) और स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U)- के बजट में भारी कटौती की गई है. इस साल इनके लिए क्रमशः 8000 करोड़ और 2500 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष के बजट की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत और 60 प्रतिशत की कमी है.
शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना अपर्याप्त और खराब गुणवत्ता वाली बुनियादी सुविधाओं का सामना करता है. वित्तीय आवंटन में इस कटौती से शहरों की स्वच्छ पानी, पर्याप्त स्वच्छता और अन्य सुविधाएं प्रदान करने की क्षमता निश्चित रूप से प्रभावित होगी. इसके परिणामस्वरूप, शहर टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDGs) और जलवायु लक्ष्यों से जुड़ी वैश्विक प्रतिबद्धताओं से और दूर हो जाएंगे.
इसी तरह, स्मार्ट सिटी मिशन के तहत शहरों की डिजिटल निगरानी, भीड़भाड़ कम करने और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुधारने के लिए 'इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर' (ICCCs) बनाए गए थे. लेकिन अब स्मार्ट सिटी मिशन के लिए कोई नया बजट आवंटित न होने के कारण, इन केंद्रों के भविष्य में सुचारू रूप से काम करने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं.
जहां एक तरफ ज्यादातर प्रमुख शहरी योजनाओं के बजट में गिरावट देखी गई है, वहीं प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (PM SVANIDHI) के बजट में लगभग तीन गुना की बढ़ोत्तरी हुई है. हालांकि मंत्रालय के कुल बजट में इसका हिस्सा छोटा है, लेकिन 2026-27 के लिए इसे बढ़ाकर 900 करोड़ कर दिया गया है. बिना किसी गारंटी के वर्किंग कैपिटल लोन प्रदान करने वाले इस कार्यक्रम ने लाखों शहरी रेहड़ी-पटरी वालों की आजीविका के अवसरों को बेहतर बनाया है.
इसके साथ ही, दीनदयाल जन आजीविका योजना-शहरी (DJAY-S) को वर्तमान बजट में 536 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के संशोधित अनुमानों की तुलना में लगभग 2.6 गुना अधिक है. ये योजनाएं शहरी अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के एक बड़े वर्ग को आवश्यक ऋण सहायता और पहचान प्रदान करेंगी, जिससे वे समावेशी शहरों के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदार बन सकेंगे.

बजट के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर दो मुख्य बातें सामने आती हैं. पहली यह कि प्रमुख शहरी योजनाओं के बजट में कटौती और सुधारों पर आधारित प्रोत्साहन पर बढ़ता जोर, शहरी बुनियादी ढांचे के लिए निजीकरण और नवाचारी वित्तपोषण की ओर एक चिंताजनक बदलाव को दर्शाता है.
अर्बन चैलेंज फंड (UCF) इस बदलाव का एक सटीक उदाहरण है, क्योंकि इसमें केंद्र सरकार की वित्तीय हिस्सेदारी को परियोजना लागत के अधिकतम 25 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है. इसके लिए शर्त यह है कि परियोजना की कम से कम 50 प्रतिशत लागत बांड, बैंक ऋण और पीपीपी (PPP) मॉडल के माध्यम से जुटानी होगी. हालांकि, भारतीय शहर अभी भी अपने राजस्व के स्वयं के स्रोतों और वित्तपोषण के अन्य आधुनिक तरीकों का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा पाए हैं.
ज्यादातर बड़े भारतीय शहरों में, उनका अपना राजस्व कुल नगरपालिका खर्च का केवल 30-40 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है, जबकि छोटे शहरों के लिए यह आंकड़ा 20 प्रतिशत से भी कम है. नगर पालिकाओं की कमजोर वित्तीय स्थिति और ऋण लेने की कम क्षमता के कारण वे म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी नहीं कर पा रहे हैं. 'अमृत' योजना के तहत आने वाले 500 शहरों में से केवल 36 शहरों को ही 'A-' या उससे ऊपर की निवेश श्रेणी प्राप्त हुई है.
इस साल के बजट में म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट को मजबूत करने का प्रयास किया गया है. इसके तहत 1000 करोड़ से अधिक का एकल बॉन्ड जारी करने पर 100 करोड़ का प्रोत्साहन और अमृत शहरों के लिए वार्षिक एकमुश्त सहायता अनुदान का प्रावधान है. इसके बावजूद, यह संभावना है कि केवल बेहतर वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता वाले बड़े शहर ही इन नवाचारी स्रोतों का लाभ उठा पाएंगे. छोटे शहरों के लिए अपनी विकास योजनाओं को तैयार करना और उनके लिए धन जुटाना लगातार कठिन बना रहेगा.
दूसरी मुख्य बात यह है कि शहरी योजनाओं के क्रियान्वयन (इम्प्लीमेंटेशन) में गहरी कमियां हैं, जिसकी वजह से अक्सर फंड का उपयोग कम हो पाता है और प्रोजेक्ट पूरे करने की समय-सीमा बार-बार बढ़ानी पड़ती है.

वर्ल्ड बैंक की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, स्मार्ट सिटी मिशन (SCM) और अमृत (AMRUT) जैसी योजनाओं के तहत स्वीकृत प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का केवल पांचवां हिस्सा (20%) ही शहर खर्च कर पाए हैं.
नगर निकायों की कम कार्यक्षमता अब एक गंभीर मुद्दा बन गई है. क्षमता की यह कमी, बिखरी हुई स्थानीय शासन व्यवस्था और प्लानिंग विशेषज्ञों के अभाव के कारण प्रगति रुकी हुई है और उन संसाधनों की बर्बादी हो रही है जिनका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था.
दिलचस्प बात यह है कि साल 2023 में 'नेशनल अर्बन रीजनल प्लानिंग अथॉरिटी' (NURPA) स्थापित करने की सिफारिश की गई थी. इसका उद्देश्य शहरी नियोजकों की भर्ती करना और अगले पांच वर्षों में शहरी नियोजन की क्षमता बढ़ाना था, लेकिन इसे अब तक लागू नहीं किया गया है. यह स्पष्ट रूप से शहरी प्रबंधन में विशेषज्ञता बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता की कमी को दर्शाता है.
डिस्क्लेमर : (इस आर्टिकल के लेखक सौम्यदीप चट्टोपाध्याय हैं. सौम्यदीप, पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित विश्व-भारती (एक केंद्रीय विश्वविद्यालय) के अर्थशास्त्र और राजनीति विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. वे शहरी अर्थशास्त्र और विकास नीतियों के विशेषज्ञ हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दिए गए तथ्य और राय ईटीवी भारत के संपादकीय दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं.)
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