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भारत का पश्चिम एशिया संकट पर बयान वर्तमान भू-राजनीति पर कूटनीतिक संकेत है

जैसे-जैसे वेस्ट एशिया में संकट बढ़ रहा है नई दिल्ली का सोचा-समझा जवाब उसकी दूसरे देशों से जुड़े लोगों के हितों बैलेंसिंग को दिखाता है.

US IRAN ISRAEL TENSIONS
ईरान के तेहरान में अमेरिकी-इजरायली हमले में तबाह एक पुलिस स्टेशन पर एक ईरानी झंडा रखा गया है. (AP)
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By Aroonim Bhuyan

Published : March 4, 2026 at 12:36 PM IST

7 Min Read
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नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष पर मंगलवार को भारत का बयान संयम बरतने की एक रूटीन डिप्लोमैटिक अपील से कहीं ज्यादा है. यह एक सोच-समझकर तैयार किया गया जियोपॉलिटिकल मैसेज है.

28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजराइली हमलों के बाद तनाव बढ़ने पर जिसमें तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी, नई दिल्ली ने एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश की है. अपनी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप की रक्षा करना, अपने विशाल प्रवासी समुदाय की सुरक्षा करना और गुट की राजनीति में पड़े बिना अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को बचाना.

सात पैराग्राफ के बयान में विदेश मंत्रालय ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए इस क्षेत्र में रहने वाले भारतीय समुदाय की सुरक्षा और एनर्जी फ्लो रूट को सुरक्षित करने की भी मांग की. विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, 'हमने 28 फरवरी, 2026 को ईरान और खाड़ी क्षेत्र में लड़ाई शुरू होने पर अपनी गहरी चिंता जताई थी. उस समय भी भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव बढ़ने से बचने और आम लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की थी. दुर्भाग्य से रमजान के पवित्र महीने में इस क्षेत्र में हालात काफी और लगातार बिगड़ते गए हैं.

हाल के दिनों में हमने न केवल लड़ाई को और तेज होते देखा है, बल्कि इसे दूसरे देशों में भी फैलते देखा है. तबाही और मौतें बढ़ गई हैं, जबकि आम जिंदगी और आर्थिक गतिविधियां रुक गई हैं. इस क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता में अहम हिस्सेदारी रखने वाले एक करीबी पड़ोसी के तौर पर ये घटनाक्रम बहुत चिंता पैदा करते हैं.'

भारत का बयान डिप्लोमैटिक रूप से सोचा-समझा, स्ट्रेटेजिक रूप से लेयर्ड और जियोपॉलिटिकली अहम है. यह न सिर्फ तुरंत क्राइसिस मैनेजमेंट को दिखाता है, बल्कि तेजी से पोलराइज्ड हो रहे ग्लोबल ऑर्डर में नई दिल्ली की बड़ी पोजिशनिंग को भी दिखाता है.

बयान में आगे लिखा, 'लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक गल्फ रीजन में रहते और काम करते हैं. उनकी सुरक्षा और भलाई सबसे जरूरी है. हम ऐसे किसी भी डेवलपमेंट से बेपरवाह नहीं हो सकते जो उन पर बुरा असर डाले.' यह वेस्ट एशिया में भारत के डेमोग्राफिक फुटप्रिंट की याद दिलाता है. गल्फ में दुनिया की सबसे बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी रहती है और यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन जैसे देशों से आने वाला रेमिटेंस भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का एक अहम हिस्सा है.

प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर जोर देकर भारत ने जरूरत पड़ने पर इवैक्युएशन ऑपरेशन के लिए तैयार रहने का संकेत दिया है, मेजबान सरकारों को सुरक्षा के बारे में अपनी उम्मीदों के बारे में संदेश दिया है और दुनिया भर में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले देश के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है.

मंत्रालय ने कहा, 'हमारी ट्रेड और एनर्जी सप्लाई चेन भी इसी इलाके से गुजरती हैं.' 'किसी भी बड़ी रुकावट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ता है. एक ऐसे देश के तौर पर जिसके नागरिक ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में अहम हैं, भारत मर्चेंट शिपिंग पर हमलों का भी कड़ा विरोध करता है.

पिछले कुछ दिनों में ऐसे हमलों की वजह से पहले ही कुछ भारतीय नागरिकों की जान चली गई है या वे लापता हैं.' यह खाड़ी से तेल इंपोर्ट, एलएनजी सप्लाई और होर्मुज स्ट्रेट के जरिए समुद्री रास्तों का सीधा जिक्र है. ईरान पहले ही होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने का आदेश दे चुका है.

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया भर के तेल और एलएनजी शिपमेंट का लगभग 20 प्रतिशत हैंडल करता है. थोड़ी देर की रुकावट या ज़्यादा रिस्क की सोच से भी कीमतें तेजी से बढ़ सकती है. भारत इस रास्ते से हर दिन लगभग 2.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल इंपोर्ट करता है, और इस रुकावट का मतलब तुरंत सप्लाई में कमी या ज्यादा लागत हो सकती है.

समुद्री ट्रैफिक पर असर डालने वाली कोई भी बढ़ोतरी भारत की इकॉनमी पर काफी असर डाल सकती है. मर्चेंट शिपिंग पर हमलों का विरोध करके, भारत न सिर्फ नेविगेशन की आजादी के अमूर्त सिद्धांतों की रक्षा कर रहा है, बल्कि ठोस राष्ट्रीय हितों की भी रक्षा कर रहा है. यह भारत को समुद्री सुरक्षा के बारे में बड़ी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं से भी जोड़ता है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ वह ग्लोबल साउथ में लीडरशिप की भूमिका चाहता है.

विदेश मंत्रालय ने कहा, 'इस बैकग्राउंड में भारत बातचीत और डिप्लोमेसी की अपनी बात जोर देकर दोहराता है. 'हम लड़ाई को जल्द खत्म करने के पक्ष में साफ तौर पर अपनी आवाज उठाते हैं. पहले ही, दुख की बात है कि कई जानें जा चुकी हैं और हम इस बारे में अपना दुख जाहिर करते हैं.'

यह भारत के लंबे समय से चले आ रहे स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी डॉक्ट्रिन के मुताबिक है. अमेरिका इंडो-पैसिफिक में भारत का मुख्य स्ट्रेटेजिक पार्टनर है. इजराइल एक बड़ा डिफेंस सप्लायर और इंटेलिजेंस पार्टनर है. ईरान चाबहार पोर्ट, एनर्जी सिक्योरिटी और सेंट्रल एशिया तक पहुंच सहित कनेक्टिविटी के लिए जरूरी बना हुआ है.

किसी भी पार्टी की बुराई करने के बजाय 'बातचीत और डिप्लोमेसी' पर जोर देकर भारत ने तीनों देशों के साथ कामकाजी रिश्ते बनाए रखे हैं, जिससे ऐसे डिप्लोमैटिक नतीजों को रोका जा सका है जो उसके लंबे समय के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि बयान में बार-बार आम लोगों की सुरक्षा, तबाही और मौतों, और मर्चेंट शिपिंग पर हमलों के विरोध का ज़िक्र किया गया है. असल में भारत ने खुद को मानवीय कानून और गैर-लड़ाकों की सुरक्षा के सिद्धांतों के साथ जोड़ लिया है. रमजान का जिक्र संघर्ष के धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति संवेदनशीलता का भी संकेत देता है.

मिनिस्ट्री के बयान में यह जानकारी दी गई है कि प्रभावित देशों में इंडियन एम्बेसी और कॉन्सुलेट, इंडियन नागरिकों और कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन के साथ लगातार संपर्क में हैं और जरूरत के हिसाब से रेगुलर एडवाइजरी जारी कर रहे हैं. बयान में कहा गया है, 'उन्होंने लड़ाई में फंसे लोगों की हर मुमकिन मदद भी की है. एम्बेसी और कॉन्सुलेट इस लड़ाई के अलग-अलग कॉन्सुलर पहलुओं को सुलझाने में एक्टिव रहेंगे.

हम इस इलाके की सरकारों के साथ-साथ दूसरे खास पार्टनर्स के भी संपर्क में हैं. प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) और विदेश मंत्री (एस जयशंकर) ने अपने समकक्षों से बातचीत की है. सरकार बदलते हालात पर करीब से नजर रखेगी और देश के हित में जरूरी फैसले लेगी.'

मौजूदा ग्लोबल ऑर्डर में अलग-अलग पावर ग्रुप्स के बीच मुकाबला है. एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व वाले अलायंस हैं, दूसरी तरफ चीन-ईरान-रूस एक्सिस है, और फिर बीच की पावर के बदलते गठबंधन हैं. कुल मिलाकर न तो अमेरिका इजराइली मिलिट्री एक्शन का सपोर्ट करके और न ही ईरान के जवाबी हमले का साथ देकर, भारत वेस्टर्न सिक्योरिटी नैरेटिव और एंटी-वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल काउंटर-ब्लॉक्स में फंसने से बचता है.

यह एक ब्रिजिंग पावर के तौर पर भारत की पोजीशन को मजबूत करता है – जो दुश्मन कैंप के बीच रिश्ते बनाए रखता है. लंबे समय में ऐसी पोजीशनिंग मल्टीलेटरल फोरम में भारत की डिप्लोमैटिक कैपिटल को बढ़ाती है.

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