युद्ध की आग में 'झुलसती' खेती: जानें ईरान संकट का भारतीय किसानों और खाद्य सुरक्षा पर असर
मिडिल ईस्ट के तनाव का सबसे बुरा असर एक बार फिर हमारे किसानों पर पड़ सकता है. कैसे, पढ़ें यह रिपोर्ट.


Published : March 7, 2026 at 2:08 PM IST
|Updated : March 7, 2026 at 8:52 PM IST
जैसे-जैसे अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद दुनिया में उथल-पुथल बढ़ रही है, भारत भी धीरे-धीरे इसकी चपेट में आ रहा है. जहां एक तरफ भारत कूटनीतिक (geopolitical) मुश्किलों में फंसा है, वहीं दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट के इस तनाव का सबसे बुरा असर एक बार फिर हमारे किसानों पर पड़ सकता है.
इन दोनों के बीच संबंध क्या है? भारत से होने वाले खाद्य निर्यात (जैसे बासमती चावल और चाय) में भारी गिरावट, खाद का आयात और कच्चे तेल की कीमतें.
क्षेत्र की स्थिति पर नजर डालें तो, ईरान पर पहले हमला किया गया जिससे वहां हजारों बम गिरे. इसके जवाब में, ईरान ने इजरायल और अरब प्रायद्वीप में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर जोरदार हमला किया है, जिसमें बहरीन और यूएई जैसे तटीय देश भी शामिल हैं. ऐसी खबरें भी हैं कि सऊदी अरब की रिफाइनरियों पर ड्रोन हमले हुए हैं, और क्षेत्र का पूरा तेल शोधन बुनियादी ढांचा या तो बंद हो गया है या उसे भारी नुकसान पहुंचा है. मिसाइल और ड्रोन हमले अभी भी जारी हैं, जिसकी वजह से इस पूरे क्षेत्र में कच्चे तेल का उत्पादन पूरी तरह ठप पड़ गया है.

दूसरा पहलू हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी है. यह फारस की खाड़ी में समुद्र का एक संकरा रास्ता है, जहां से दुनिया का 20% तेल और अन्य सामान गुजरता है. कल्पना कीजिए कि इराक और ईरान जैसे देशों से आने वाला सारा तेल और स्वेज नहर से आने वाले जहाज इसी रास्ते पर निर्भर हैं.
इसके अलावा, फारस की खाड़ी उन टैंकरों और मालवाहक जहाजों से भरी हुई है जो हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने से इनकार कर रहे हैं. यह इलाका अब पूरी तरह सैन्य छावनी बन चुका है, जहां अमेरिका, ईरान और चीन की नौसेनाएं भी पहुंच रही हैं. साथ ही, यमन के विद्रोही समूहों ने भी इस नाकाबंदी में ईरान का साथ देने का वादा किया है.

अब बात सिर्फ नाकाबंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र के बड़े खाद कारखानों ने भी उत्पादन बंद कर दिया है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब उत्तरी देशों के किसान फसल बोने की तैयारी कर रहे हैं.
उदाहरण के लिए, कतर एनर्जी द्वारा संचालित दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया प्लांट बंद हो गया है क्योंकि वहां प्राकृतिक गैस की कमी हो गई है. इस क्षेत्र के कई गैस और एलएनजी (LNG) प्लांट भी हमलों की चपेट में आए हैं, जिससे तेल और गैस आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है. नाइट्रोजन खाद बनाने की लागत में 60% से 80% हिस्सा प्राकृतिक गैस का ही होता है, जो कि इसका मुख्य कच्चा माल है.
इसके अलावा, यूरोपीय संघ द्वारा अगले छह महीनों में रूसी गैस की कटौती के फैसले ने गैस अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. इसके जवाब में, पुतिन ने घोषणा की है कि वह यूरोपीय संघ को दी जाने वाली रूसी गैस तुरंत रोक देंगे और "बेहतर बाज़ारों" की तलाश करेंगे. इस बयान के कारण कुछ ही दिनों में प्राकृतिक गैस की कीमतें दोगुनी हो गई हैं.

यानी एक तरफ मिडिल ईस्ट में गैस का उत्पादन कम या ठप हो गया है, तो दूसरी तरफ यूरोपीय संघ और रूस के बीच तनाव की वजह से कीमतें आसमान छू रही हैं. यह सब खाद के कारोबार के लिए बहुत बुरा है, क्योंकि पिछले एक हफ्ते में दुनिया भर में उत्पादन क्षमता बहुत घट गई है.
अब प्राकृतिक गैस या नाइट्रोजन खाद के सस्ते उत्पादन वाले दौर में वापस लौटने में महीनों नहीं, बल्कि सालों लग सकते हैं. इसके अलावा, मिडिल ईस्ट के कई हिस्सों में सल्फर जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई भी रुक गई है. इससे दुनिया के लगभग 45% सल्फर व्यापार पर असर पड़ेगा. साथ ही, वैश्विक स्तर पर फॉस्फेट के उत्पादन में भी गिरावट आ सकती है.
उत्पादन के साथ-साथ दुनिया के समुद्री व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हुए हैं, जिससे कई जहाज अपना माल उतारने में असमर्थ हैं. जहाजों के बीमा प्रीमियम बढ़ गए हैं, इसलिए खाद लाने-ले जाने के लिए अब कम जहाज उपलब्ध हैं.

दिलचस्प बात यह है कि भारत अपनी 40% यूरिया सप्लाई के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है. लेकिन सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि मिस्र से लेकर ब्राजील तक दुनिया भर के किसान नाइट्रोजन खाद (जैसे यूरिया) के लिए इसी इलाके पर निर्भर हैं. वहां यूरिया की कीमतों में पहले ही 25% से ज्यादा का उछाल आ चुका है, जिससे इसकी जमाखोरी और कालाबाजारी बढ़ गई है. रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरू होने से खाद की वैश्विक सप्लाई पहले ही खराब थी और अब ईरान और आसपास के इलाकों पर हमलों ने कीमतों को बहुत तेजी से ऊपर धकेल दिया है.
यद्यपि भारत के पास पिछले साल की तुलना में यूरिया का स्टॉक अधिक है, फिर भी यह खाद्य सुरक्षा की गारंटी नहीं देता, भले ही वैश्विक बाजार में खाद के अन्य विकल्प मौजूद हों. भारत पिछले साल भी खाद की भारी किल्लत से जूझ चुका है, जिसके कारण पैदावार में भी कमी आई थी.
दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं- पहला कारण युद्ध की स्थिति है और दूसरा खाद की सप्लाई को लेकर फैला डर और अनिश्चितता. अगर खाद समय पर नहीं पहुंची, तो इससे बुवाई में भारी नुकसान हो सकता है और आधुनिक खेती का पूरा चक्र बिगड़ सकता है. आज दुनिया भर के अधिकांश खेत यूरिया और डीएपी (DAP) जैसे रसायनों पर निर्भर हैं, और वहां की मिट्टी और बीज इन्हीं के सहारे उपज देते हैं. इनके बिना फसलें बर्बाद हो सकती हैं या पैदावार बहुत कम हो सकती है.

अगर हम कच्चे तेल को देखें, तो यह वैश्विक और भारतीय कृषि उत्पादन का एक और अहम पहलू है. ट्रैक्टरों से लेकर ट्रकों तक हमारी अधिकांश कृषि मशीनरी डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन पर चलती है.
अब तेल उत्पादन पर असर पड़ने से इसकी सप्लाई और सीमित हो गई है, जबकि मांग लगातार बढ़ रही है. विभिन्न देश रक्षा उद्देश्यों के लिए तेल का भंडारण कर रहे हैं क्योंकि तेल की कीमतें 110-120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं. नतीजतन, खेती की लागत में भारी वृद्धि होगी. बीजों और खादों से लेकर कटी हुई फसलों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने तक, सब कुछ तेल पर निर्भर है. तेल की बढ़ती कीमतें सप्लाई चेन की हर कड़ी को प्रभावित करेंगी, जिससे हर जगह भोजन की कीमतें बढ़ जाएंगी.

आखिरी मार निश्चित रूप से उन "बिचौलियों" और सट्टेबाजों की पड़ेगी, जो युद्ध की स्थिति और फंसे हुए खाद्य शिपमेंट का फायदा उठाएंगे. वर्तमान में बासमती चावल से लेकर चाय, फल और सब्जियों तक के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा, जो अरब प्रायद्वीप या ईरान जाना था, बंदरगाहों पर अटका हुआ है.
'पॉलीमार्केटर्स' और 'फ्यूचर्स कमोडिटी हेज फंड्स' जैसे सट्टेबाज निस्संदेह वैश्विक स्तर पर मुनाफा कमाने के लिए इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएंगे. इसलिए, चाहे भारत हो या पूरी दुनिया, हमें खाद की भारी कमी, कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़त और खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूते हुए देखने को मिल सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. यहां व्यक्त किए गए तथ्य और राय ईटीवी भारत के विचारों को नहीं दर्शाते हैं)

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