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अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद अब आगे क्या? जानिए- कैसे इजराइल बिगाड़ सकता है सुपरपावर का खेल!

अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते से कच्चे तेल के दाम गिरे. पढिये, इस डील पर क्यों भड़का हुआ है इजराइल.

US Iran peace deal
रविवार, 14 जून, 2026 को ईरान के तेहरान में इस्लामिक क्रांति चौक पर ईरान और U.S. की बातचीत के खिलाफ नारे लगाते हुए एक महिला ईरानी झंडा लहरा रही है. (AP)
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By Achal Malhotra

Published : June 16, 2026 at 4:48 PM IST

7 Min Read
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अमेरिका और ईरान, दोनों ने घोषणा की है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर एक सहमति बन गई है. इसे औपचारिक रूप देने के लिए शुक्रवार, 19 जून 2026 को जेनेवा में एक आधिकारिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए जाएंगे.

इस 14-सूत्रीय समझौते की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है. हालांकि, मौजूदा मीडिया रिपोर्ट्स से संकेत मिलते हैं कि इस प्रस्तावित समझौते (MoU) में दुश्मनी को हमेशा के लिए खत्म करना, होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) की अमेरिकी नाकाबंदी को हटाना और इसे व्यापारिक जहाजों की मुक्त आवाजाही के लिए खोलना शामिल हो सकता है.

इसके साथ ही, ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना व उसकी फ्रीज (रोकी गई) संपत्तियों को जारी करना, युद्ध से प्रभावित ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक का अनुदान देना, क्षेत्र में अमेरिकी सेना की मौजूदगी का दायरा तय करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा भी इसमें शामिल होने की संभावना है.

यह सब कुछ चरणबद्ध तरीके से होने की उम्मीद है. हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि इस समझौते में ईरान के प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह, हमास और हूती) या 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' की भूमिका को जगह मिलेगी या नहीं.

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सोमवार, 15 जून, 2026 को लेबनान के दक्षिणी बंदरगाह शहर सिडोन में, अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती सीज़फ़ायर समझौते की घोषणा के बाद अपने गांव लौटने का इंतज़ार करती एक बेघर महिला अपना मोबाइल फ़ोन चेक कर रही है. (AP)

यह समझौता पहली नजर में देखने पर इतना अच्छा लगता है कि इस पर आसानी से विश्वास नहीं होता. ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका ने ईरान की लगभग सभी मांगों को मान लिया है. जबकि, अभी यह देखना बाकी है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर साल 2015 के परमाणु समझौते (जिसमें ईरान और P-5 + जर्मनी शामिल थे, और जिससे राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान दूरी बना ली थी) में पहले से मानी गई शर्तों के अलावा और क्या स्वीकार करेगा.

शायद ईरान लगभग 440 किलोग्राम अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (highly enriched uranium) को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सौंपने पर सहमत हो जाए, जो कि हथियार बनाने के स्तर के संवर्धन के बहुत करीब है और दोनों देशों के बीच विवाद की मुख्य वजह रहा है.

इस समझौते को लेकर अमेरिका में काफी उत्साह है. वहीं ईरान इस पर संभलकर प्रतिक्रिया दे रहा है और सतर्कता भरा रुख अपनाए हुए है. प्रधानमंत्री मोदी सहित दुनिया भर के नेताओं ने इस सकारात्मक बदलाव का स्वागत किया है. उम्मीद जताई है कि यह समझौता क्षेत्र में शांति व स्थिरता लाएगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा साबित होगा.

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सोमवार, 15 जून, 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती सीज़फ़ायर समझौते की घोषणा के बाद लोग अपने गांवों में लौटने लगे हैं, जिसके बाद लेबनानी सैनिक दक्षिण लेबनान के बीर अल-सलासेल गांव में तैनात हैं. (AP)

हालांकि, इस मामले में इजराइल की प्रतिक्रिया चिंता का विषय है. इसने इस शांति समझौते के टिके रहने और क्षेत्र में स्थायी शांति की संभावनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इजराइल ने साफ कर दिया है कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं है. इजराइली रक्षा मंत्री काट्ज़ ने एक बयान में कहा- "प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और मैं एक स्पष्ट नीति पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत इज़राइली सेना (IDF) लेबनान, सीरिया और गाज़ा के सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित काल के लिए बनी रहेगी, ताकि वहां से हमारे बॉर्डर्स और इज़राइली समुदायों की जिहादी तत्वों के खिलाफ रक्षा की जा सके."

अनुमान लगाया जा रहा है कि पिछले ढाई सालों में इजराइल ने गाज़ा, लेबनान और सीरिया में लगभग 1,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर अपना नियंत्रण कर लिया है और वह अपने 'ग्रेटर इज़राइल' (अखंड इज़राइल) के सपने को पूरा करने में लगा हुआ है.

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कोलकाता में SUCI(C) के कार्यकर्ता ईरान पर अमेरिकी हमले के खिलाफ युद्ध-विरोधी रैली में हिस्सा लेते हुए. यह तस्वीर रविवार, 22 जून, 2025 की है. (IANS)

पूरी संभावना है कि हम एक ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहां अमेरिका शायद ईरान के साथ सीधे टकराव से पीछे हट जाए, लेकिन वह इजराइल को अपना नैतिक और भौतिक (हथियार और आर्थिक) समर्थन देना जारी रख सकता है. अमेरिका यह समर्थन इजराइल के उन अंतिम उद्देश्यों को पूरा करने के लिए देगा, जिसके तहत वह अपने पड़ोस में ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना चाहता है और ईरान को पूरी तरह तबाह न भी कर पाए, तो उसे जितना संभव हो उतना कमजोर कर दे.

यदि इस साल नवंबर में अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव (mid-term elections) के नतीजे राष्ट्रपति ट्रंप के पक्ष में जाते हैं, तो इस संघर्ष में अमेरिका के दोबारा खिंचे चले आने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है.

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अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती सीज़फ़ायर समझौते की घोषणा के बाद अपने गांव लौटे लोग, सोमवार, 15 जून, 2026 को दक्षिण लेबनान के बीर अल-सलासेल में एक टूटी-फूटी सड़क पर पत्रकारों के साथ इकट्ठा हुए. (AP)

बहरहाल, इस क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता तब तक संभव नहीं है जब तक कि संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा सुझाए गए 'दो-राज्य समाधान' (Two-State resolution) को स्वीकार नहीं कर लिया जाता और फिलिस्तीनियों को एक संप्रभु मातृभूमि (sovereign homeland) नहीं मिल जाती. जिससे, इजराइल के खिलाफ ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठनों के हस्तक्षेप की जरूरत ही खत्म हो जाए. दुर्भाग्य से, यह मुद्दा फिलहाल कहीं भी एजेंडे में दिखाई नहीं दे रहा है.

इस सकारात्मक उम्मीद के साथ कि यह समझौता सफल रहेगा और अमेरिका व ईरान इसे पूरी तरह लागू करेंगे, यह बात कुछ हद तक भरोसे के साथ कही जा सकती है कि भले ही स्थायी शांति एक दूर का सपना बनी रहे, लेकिन यह समझौता हालात को सामान्य बनाने में मदद करेगा. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी फायदा होगा.

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अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती सीज़फ़ायर एग्रीमेंट के अनाउंसमेंट के बाद अपने गांव लौटे एक शिया शेख, सोमवार, 15 जून, 2026 को दक्षिण लेबनान के डेर क़ानून में अपनी तबाह हुई लाइब्रेरी से धार्मिक किताबें इकट्ठा कर रहे हैं. (AP)

ईरान के तेल पर से प्रतिबंध हटने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के रास्ते ऊर्जा (तेल और गैस) की आपूर्ति फिर से शुरू होने से तेल की कीमतें स्थिर होंगी और महंगाई पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी. वास्तव में, कच्चे तेल (crude oil) की कीमतें अभी से नीचे आ गई हैं और शेयर बाजार ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं.

भारत के नजरिए से देखें तो इससे ईरान से दोबारा ऊर्जा आपूर्ति शुरू होने और ईरान में चाबहार बंदरगाह परियोजना के फिर से जीवित होने का रास्ता साफ होगा, जो बदले में ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और यूरोप के साथ भारत की कनेक्टिविटी (संपर्क) को बढ़ावा देगा. समुद्री व्यापार और नागरिक उड्डयन (सिविल एविएशन) उद्योग को भी इससे निश्चित रूप से फायदा होगा.

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पटना में CPI-ML कार्यकर्ताओं ने ईरान पर US-इज़राइल मिलिट्री एक्शन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. यह तस्वीर 7 मार्च, 2026 की है. (IANS)

उर्वरकों का बिना किसी रुकावट के आयात होना भारतीय कृषि के लिए एक बड़ी राहत होगी. कच्चे तेल की कीमतों में संभावित स्थिरता से विदेशी मुद्रा के बाहर जाने (outflow) को कम करने में मदद मिलेगी और पेट्रोल, डीजल व गैस की खुदरा कीमतों में कमी आने से महंगाई रुकेगी. इसके साथ ही मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में रहने वाले 10 मिलियन (1 करोड़) भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जो भारत में विदेशी मुद्रा भेजने का एक बहुत बड़ा जरिया हैं.

संक्षेप में कहें तो, भले ही इस संघर्ष का पूरा और अंतिम समाधान अभी दिखाई नहीं दे रहा है, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी खत्म होने, सप्लाई चेन में रुकावटें दूर होने और इसके परिणामस्वरूप होने वाला सुचारू व्यापार पूरे विश्व के लिए एक अच्छा संकेत है.

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