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चीन और रूस की गैर मौजूदगी में जी7 में भारत ग्लोबल साउथ के प्रमुख पैरोकार के रूप में उभरा

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा ने यूरोपीय देशों को ट्रंप के साथ रिश्ते सुधारने का मौका दिया.

In G7 meeting PM Modi and Trump
एवियन में पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (AFP)
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By Vivek Mishra

Published : June 21, 2026 at 12:45 PM IST

6 Min Read
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नई दिल्ली : पिछले कुछ सालों से, जी7 'बाकी देशों के उभार' को अनकहे तौर पर स्वीकार करते हुए काम कर रहा है.इसमें उन अहम देशों के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया गया है, जोपश्चिमी आर्थिक व्यवस्था से जुड़े हैं और वैश्विक विकास औरशासन के लिए महत्वपूर्ण हैं.

चीन और रूस की गैर-मौजूदगी में, जी7 के मुख्य देशों के अलावाबुलाए गए 10 सदस्यों में भारत सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर उभरा है. बैठक में ट्रंप की मौजूदगी,बिना अमेरिका के ट्रांस-अटलांटिक सहयोगियों के प्रति खुली दुश्मनी के,काफी हद तक ईरान के साथ युद्धविराम पर वाशिंगटन के ध्यान केंद्रित करने का नतीजा थी.

ईरानऔर वाशिंगटन के बीच युद्धविराम की पृष्ठभूमि में, यूक्रेन के बारे में बातचीत परकहीं अधिक ध्यान दिया गया. जी7 नेताओं ने यूक्रेन को मजबूत समर्थन देने का वादा किया,भले ही रूस और यूक्रेन के बीच हमलों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ गई हो.

यूक्रेन को जी7 का समर्थन,खासकर यूरोप से, एयर डिफेंस क्षमताएं, अतिरिक्त सिस्टम और इंटरसेप्टर,और लंबी दूरी की क्षमताएं उपलब्ध कराने के लिए पक्का किया गया, और सदस्य अब यूक्रेन कोसैन्य उत्पादन बढ़ाने की अनुमति देने वाले लाइसेंस का लाभ देने पर विचार करने के लिए तैयार थे.

यूरोप का मजबूत रुख आंशिक रूप से दूसरे ट्रंप प्रशासन के उस दृष्टिकोण में धीरे-धीरे लेकिन निर्णायक बदलाव के कारण था,जिसमें यूरोपीय सहयोगियों द्वारा बड़े पैमाने पर बोझ साझा करने कोट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के नए बुनियादी नियम के तौर पर लागू किया जा रहा था.

ट्रंप की बोझ-बांटने की रणनीति ने यूरोप पर दबाव बनाने और बदले में यूक्रेन को हथियार सप्लाई करने के बीच सावधानी से संतुलन बनाए रखा, बजाय इसके कि वॉशिंगटन सीधे यूक्रेन को आर्थिक मदद देता. इसके अलावा, अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर आए संकट के बीच, ट्रंप ने यूक्रेन को वॉशिंगटन की मदद को यूरोपीय देशों के सहयोग से जोड़ा.

यह सहयोग एक ऐसे वैश्विक गठबंधन के जरिए होना था, जो अमेरिका को जलडमरूमध्य को खुलवाने में मदद करता — दूसरे शब्दों में, ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होना. दुनिया भर में बढ़ते तनावपूर्ण हालात के बीच, जी7 पश्चिमी देशों के बाहर के देशों के साथ अपने कई स्तरों वाले और व्यवस्थित संबंधों पर निर्भर दिखता था.

इस संदर्भ में, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का रुख खास तौर पर उल्लेखनीय रहा. कार्नी ने भारत की भूमिका, कूटनीतिक अहमियत और बढ़ती आर्थिक ताकत को उजागर करने में मुख्य भूमिका निभाई. उन्होंने भारत को एक आम "मध्यम शक्ति" से कहीं आगे, 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की एक जरूरी आवाज के तौर पर पेश किया. उनका यह रुख इस साल जनवरी में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में दिए गए उनके उस चर्चित भाषण जैसा ही था, जिसमें उन्होंने 'मध्यम शक्तियों' का पक्ष लिया था, जबकि बड़ी ताकतें आक्रामक और मांग करने वाली थीं और अपने से कम ताकत वाले देशों को कमतर समझती थीं.

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा ने यूरोपीय देशों को ट्रंप के साथ रिश्ते सुधारने का मौका दिया. इससे पहले, युद्धविराम से पहले वे अमेरिकी कोशिशों में शामिल होने से हिचकिचा रहे थे—चाहे वह होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की बात हो या सामूहिक नाकेबंदी लागू करने की. यह बात जी7 के उस वादे से साफ होती है जिसमें कहा गया था कि 'फ्रांस और यूके के नेतृत्व में एक बहुराष्ट्रीय, स्वतंत्र और रक्षात्मक पहल, होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को फिर से शुरू करने में अहम भूमिका निभा सकती है.

यह पहल व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा करके, कमर्शियल शिपिंग ऑपरेटरों का भरोसा जीतकर और सभी बारूदी सुरंगों (माइन्स) को हटाने की पुष्टि में मदद करके ऐसा कर सकती है.' एवियन (Evian) में हुई जी7 बैठक एक और वादे के लिए भी अहम थी—और वह था इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर.

ऐसे समय में जब ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को कम करने पर आमादा दिख रहा है, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर किया गया सामूहिक वादा एशिया के लिए राहत की बात थी.

एशिया फरवरी से ही अमेरिका-ईरान तनाव के असर से जूझ रहा है. G7 बैठक में चीन की गैर-मौजूदगी की वजह से पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में यथास्थिति को बदलने की किसी भी एकतरफा कोशिश—खासकर ताकत या दबाव के इस्तेमाल से—का खुलकर विरोध किया जा सका. इस पूरी स्थिति का विरोधाभास भी साफ दिख रहा था, क्योंकि ट्रंप प्रशासन चीन के मामले में हिचकिचाहट दिखा रहा है. वे ऐसे किसी भी दबाव वाले मुद्दे का जिक्र करने से बच रहे हैं, जिनसे बीजिंग नाराज हो सकता है. ऐसा लगता है कि वॉशिंगटन चीन के साथ कोई बड़ा समझौता करने की बहुत ज्यादा कोशिश कर रहा है.

एवियन में जी7 बैठक से पहले, चीन ने 11 जून को राष्ट्रपति मैक्रों द्वारा बुलाई गई 'ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट' में हिस्सा लिया. हालांकि, इस समूह में चीन के पूरी तरह शामिल न होने की कमी को इस बार वाशिंगटन के अपने यूरोपीय सहयोगियों से खुद को दूर करने के फैसले ने संतुलित कर दिया. नतीजतन, वैश्विक विकास और शासन के मुद्दों पर मध्यम दर्जे की ताकतों के योगदान का दायरा बढ़ सकता है.

भारत के लिए, जी7 एक ऐसी निरंतरता को दर्शाता है, जो उसकी आर्थिक वृद्धि और वैश्विक मंच पर बढ़ती अहमियत को उजागर करती है. एवियन में चर्चा किए गए तीन विषय नई दिल्ली की वैश्विक और घरेलू प्राथमिकताओं के अनुरूप थे.

ऐसे समय में जब 'ग्लोबल नॉर्थ' (विकसित देश) 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देश) की प्राथमिकताओं से अलग-थलग एक प्रयोगशाला जैसा प्रतीत होता है, भारत को—जो 'ग्लोबल साउथ' का सबसे बड़ा देश है—मौका मिलने पर सही प्राथमिकताओं को सामने रखने की आवश्यकता है. विश्वास बहाली का आह्वान भारत की उस अनूठी स्थिति के अनुकूल है, जिसमें वह किसी भी संघर्षरत पक्ष के साथ टकराव में नहीं है और इसलिए शांति और स्थिरता लाने में सहायक हो सकता है—न केवल अपने पड़ोस में बल्कि पूरी दुनिया में. और अंत में, कनेक्टिविटी पर भारत का दांव उतना ही समयोचित है, जितना कि तत्काल आवश्यक. चल रहे युद्धों के परिणामस्वरूप वैश्विक कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुरक्षा और राजनीतिक उथल-पुथल ने भारत की उन कनेक्टिविटी परियोजनाओं को प्रभावित किया है जो मध्य पूर्व को एक अहम कड़ी मानती थीं. शायद, ईरान-अमेरिका संघर्ष के खत्म होने के साथ, I2U2 और IMEEC जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाएं गति पकड़ेंगी.

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