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बिजली वितरण का 'पुराना सिस्टम' कैसे बिगाड़ रहा है भारत का 'क्लाइमेट गेम'?

भारत रिन्यूएबल एनर्जी, स्टोरेज प्रोजेक्ट्स, ग्रीन हाइड्रोजन इनिशिएटिव्स में अरबों डॉलर इन्वेस्ट कर रहा है. फिर भी, जलवायु लक्ष्यों की राह में बाधा है.

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सांकेतिक तस्वीर. (Getty Images)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 27, 2026 at 4:28 PM IST

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जीएसआर भवानी प्रसाद

भारत ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है- साल 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को घटाकर 'नेट-जीरो' करना. देश ने अक्षय ऊर्जा (renewable energy) में भारी निवेश किया है. रिकॉर्ड रफ्तार से सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाई है और बिजली घरों में साफ-सुथरी तकनीकों के इस्तेमाल को अनिवार्य किया है. इसके बावजूद, बिजली क्षेत्र में एक ऐसी नीतिगत खामी छिपी है, जो चुपचाप इन जलवायु लक्ष्यों की राह में बाधा बन रही है.

यह समस्या तकनीक की नहीं, बल्कि प्रक्रिया की है. वर्तमान 'मेरिट ऑर्डर डिस्पैच' (MOD) सिस्टम, जिसे बिजली बनाने की तात्कालिक लागत कम करने के लिए बनाया गया था- अनजाने में आधुनिक और साफ सुपरक्रिटिकल बिजली इकाइयों के मुकाबले पुराने और कम कुशल कोयला संयंत्रों को बढ़ावा दे रहा है. यह विरोधाभास आज एक गंभीर मुद्दा है जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.

भारत ने ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में शानदार प्रगति की है. देश ने समय से पहले ही 100 GW सौर ऊर्जा क्षमता का मील का पत्थर पार कर लिया है. केंद्र सरकार ने अब नए कोयला आधारित संयंत्रों के लिए 'सुपरक्रिटिकल' या 'अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल' तकनीक का उपयोग अनिवार्य कर दिया है, जिससे पुरानी (सब-क्रिटिकल) इकाइयों की नई मंजूरियों पर प्रभावी रूप से रोक लग गई है.

इसका कारण स्पष्ट है. सुपरक्रिटिकल प्लांट 41-45% की दक्षता पर काम करते हैं, जबकि पुराने सब-क्रिटिकल प्लांट में यह केवल 36-38% होती है. अधिक दक्षता का सीधा मतलब है- प्रति यूनिट बिजली पैदा करने में कोयले की कम खपत और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में भारी कमी. औसत रूप से देखें तो, पुराने (सब-क्रिटिकल) प्लांट: प्रति यूनिट (kWh) बिजली बनाने में लगभग 766–789 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड और आधुनिक (सुपरक्रिटिकल) प्लांट: प्रति यूनिट लगभग 722 ग्राम उत्सर्जन करता है.

कागज पर यह अंतर मामूली लग सकता है, लेकिन जब इसे रोजाना पैदा होने वाली हजारों मेगावाट बिजली के हिसाब से देखें, तो कार्बन उत्सर्जन में होने वाली यह बचत बहुत बड़ी हो जाती है. 'परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड' (PAT) जैसी योजनाओं के जरिए, थर्मल पावर स्टेशनों ने कई चरणों में अपनी ऊर्जा दक्षता में पहले ही 3-7% तक का सुधार किया है. भारत ने अपनी नीयत और काबिलियत दोनों स्पष्ट रूप से साबित कर दी है, तो फिर विरोधाभास कहां है?

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सांकेतिक तस्वीर. (Getty Images)

ग्रिड लचीलेपन की चुनौती

सौर ऊर्जा की तेज रफ़्तार ने कामकाज में जटिलताएं पैदा कर दी हैं. सौर ऊर्जा केवल दिन के समय उपलब्ध होती है, जबकि सुबह और शाम के समय, जब बिजली की मांग सबसे ज़्यादा होती है, इसकी उपलब्धता तेज़ी से गिर जाती है.

इस उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए, ग्रिड ऑपरेटरों को अक्सर थर्मल पावर प्लांट (कोयला संयंत्रों) की उत्पादन क्षमता घटाकर 40% तक लानी पड़ती है और कभी-कभी उन्हें पूरी तरह बंद भी करना पड़ता है. ये फैसले 'मेरिट ऑर्डर डिस्पैच' (MOD) सिस्टम के जरिए लिए जाते हैं.

इस सिस्टम के तहत, बिजली संयंत्रों को उनकी 'वेरिएबल कॉस्ट' (बिजली उत्पादन की अस्थायी लागत), जिसमें मुख्य रूप से ईंधन और परिवहन का खर्च शामिल है के आधार पर चुना जाता है. जिस यूनिट की लागत सबसे कम होती है, उससे बिजली पहले ली जाती है. हिसाब-किताब के नजरिए से यह तर्कसंगत लगता है, लेकिन इस गणना में पर्यावरणीय परिणामों (प्रदूषण और उत्सर्जन) को शामिल नहीं किया जाता है.

बिजली वितरण का विरोधाभास

उत्पादन की अस्थायी लागत का मतलब यह नहीं है कि वह पर्यावरण के लिए भी बेहतर है. उदाहरण के लिए, कोयला खदानों से दूर स्थित एक आधुनिक सुपरक्रिटिकल प्लांट को रेलवे माल ढुलाई के कारण अधिक खर्च उठाना पड़ सकता है. दूसरी ओर, कोयला खदानों के करीब स्थित एक पुराना सब-क्रिटिकल प्लांट कम परिवहन लागत के कारण सस्ता पड़ सकता है.

मेरिट ऑर्डर डिस्पैच (MOD) के सिद्धांतों के तहत, केवल कम लागत वाले प्लांट को प्राथमिकता दी जाती है, चाहे वह कितना भी पुराना हो या उससे कितना भी ज्यादा प्रदूषण क्यों न हो रहा हो.

इसके परिणामस्वरूप:

  • अधिक कुशल और कम प्रदूषण करने वाली सुपरक्रिटिकल इकाइयों का उत्पादन घटा दिया जाता है.
  • कम कुशल और अधिक उत्सर्जन करने वाली सब-क्रिटिकल इकाइयां चलती रहती हैं.

हर बार जब ऐसा होता है, तो देश असल में ईंधन परिवहन की मामूली लागत बचाने के चक्कर में अधिक कार्बन उत्सर्जन को चुन लेता है. जब एक सुपरक्रिटिकल यूनिट की जगह सब-क्रिटिकल यूनिट से बिजली ली जाती है, तो उत्सर्जन में प्रति मेगावाट-घंटा लगभग 44 से 67 किलोग्राम की वृद्धि हो जाती है.

भारत सालाना 1,000 टेरावॉट-घंटा (TWh) से अधिक थर्मल बिजली पैदा करता है. अगर बिजली वितरण की प्राथमिकता में केवल 10% का भी बदलाव हो जाए, तो यह सालाना लाखों टन अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन में बदल सकता है. यह स्थिति सुपरक्रिटिकल तकनीक को बढ़ावा देने के मूल उद्देश्य के ही विपरीत है.

आर्थिक तर्क बनाम जलवायु तर्क

बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMs) और बिजली व्यापारी गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं कर रहे हैं. वे केवल उन नियमों का पालन कर रहे हैं जो उन्हें नियंत्रित करते हैं. उनका मुख्य काम सबसे कम 'वेरिएबल कॉस्ट' (अस्थायी लागत) पर बिजली खरीदना है. समस्या सिस्टम चलाने वालों की नीयत में नहीं, बल्कि बिजली वितरण के ढांचे के डिजाइन में है.

वर्तमान में, रोजाना होने वाले बिजली वितरण के फैसलों में 'पर्यावरणीय दक्षता' का कोई आर्थिक मूल्य नहीं है. यदि कोई पावर प्लांट PAT योजना के तहत अपनी कार्यक्षमता सुधारने के लिए निवेश करता है, तो उसे सराहना तो मिलती है. लेकिन, यदि उसकी परिवहन लागत अधिक है, तो उसे अब भी उत्पादन कम करने के लिए कहा जा सकता है.

यह स्थिति कई गलत और विपरीत प्रोत्साहन पैदा करती है:

  • साफ-सुथरे (Cleaner) प्लांट को उनके अच्छे प्रदर्शन के लिए लगातार कोई इनाम या वरीयता नहीं मिलती.
  • पुराने प्लांट केवल अपनी भौगोलिक स्थिति (खदानों के करीब होने) के कारण चलते रहते हैं.

इसका नतीजा यह होता है कि अल्पकालिक आर्थिक बचत, दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों पर हावी हो जाती है. वैश्विक प्रथाओं से सीख अन्य देशों ने इस टकराव को पहचाना है और अपने बिजली वितरण (dispatch) सिद्धांतों में बदलाव किया है. चीन, जो पहले "फेयर डिस्पैच" मॉडल का पालन करता था (जहां दक्षता की परवाह किए बिना सभी प्लांटों को समान घंटे मिलते थे), धीरे-धीरे "ऊर्जा-बचत डिस्पैच" की ओर बढ़ गया है. इस दृष्टिकोण के तहत, ग्रिड की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए, स्वच्छ और अधिक कुशल इकाइयों को प्राथमिकता दी जाती है.

यूरोप, इससे भी आगे निकल गया है. यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली के माध्यम से, वहां कार्बन उत्सर्जन की एक कीमत तय है. जब कोई अधिक उत्सर्जन करने वाला प्लांट बिजली बाजार में बोली लगाता है, तो उसे कार्बन भत्ते की लागत को भी जोड़ना पड़ता है. लागत का यह अंतर स्वचालित रूप से स्वच्छ प्लांटों को बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना देता है. इससे पर्यावरणीय दक्षता आर्थिक रूप से स्पष्ट दिखाई देने लगती है.

भारत ने अभी तक इस तरह से बिजली वितरण के क्रम में कार्बन लागत को एकीकृत नहीं किया है. आगे की व्यावहारिक राह इस समस्या का समाधान मेरिट ऑर्डर सिस्टम को खत्म करने में नहीं, बल्कि उसे और बेहतर बनाने में है.

जलवायु लक्ष्यों के साथ बिजली वितरण तालमेल बिठाने के लिए तीन व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं:

दक्षता-समायोजित मेरिट ऑर्डर (Efficiency-Adjusted Merit Order)

एक "कार्बन-समायोजित वेरिएबल कॉस्ट" फॉर्मूला पेश किया जाए, जिसमें ईंधन की लागत के साथ-साथ प्लांट की कार्यक्षमता या उत्सर्जन की तीव्रता को भी गिना जाए. कार्बन का एक मामूली मूल्य जोड़ने से भी, बाजार को अस्थिर किए बिना प्राथमिकताओं का क्रम काफी हद तक सुधारा जा सकता है.

लक्षित माल ढुलाई सुसंगतीकरण (Targeted Freight Rationalisation)

खदानों से दूर स्थित कुशल सुपरक्रिटिकल प्लांटों को माल ढुलाई में जो नुकसान उठाना पड़ता है, उसे नीतिगत हस्तक्षेप के जरिए सुधारा जा सकता है. इससे आर्थिक अनुशासन से समझौता किए बिना सभी प्लांटों को समान अवसर मिलेंगे.

कार्बन-सचेत बिजली व्यापार (Carbon-Informed Power Trading)

अगले दिन के बाजार तंत्र में हीट रेट या उत्सर्जन के मानकों को शामिल किया जा सकता है. इस तरह के सुधारों से बिना किसी अचानक व्यवधान के, पुरानी और कम कुशल (सब-क्रिटिकल) इकाइयों के दबदबे को धीरे-धीरे खत्म किया जा सकेगा.

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सांकेतिक तस्वीर. (Getty Images)

यह अभी क्यों महत्वपूर्ण है

भारत अक्षय ऊर्जा, स्टोरेज प्रोजेक्ट्स, ग्रीन हाइड्रोजन पहल और उन्नत थर्मल तकनीकों में अरबों का निवेश कर रहा है. इसके बावजूद, केवल 'वेरिएबल कॉस्ट' (अस्थायी लागत) की गणना पर आधारित बिजली वितरण की प्रक्रियाएं इन फायदों को कम करने का जोखिम पैदा करती हैं. नीतियों में निरंतरता और एकरूपता होना अनिवार्य है. केवल कुशल प्लांट बनाना ही काफी नहीं है, उनका बेहतर ढंग से संचालन होना भी जरूरी है. सिर्फ साफ-सुथरी तकनीक को अनिवार्य करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सिस्टम को उसके उपयोग को पुरस्कृत भी करना चाहिए.

सैकड़ों बिजली उत्पादन इकाइयों में हर दिन लिए जाने वाले परिचालन संबंधी फैसले ही उत्सर्जन के वास्तविक रास्ते को तय करते हैं- सिर्फ नीतिगत घोषणाएं अकेले इसे नहीं बदल सकतीं.

तस्वीर का बड़ा पहलू

भारत के बिजली क्षेत्र में हो रहे बदलावों की पूरी दुनिया में प्रशंसा होती है. देश ने यह साबित कर दिया है कि विकास और स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार एक साथ हो सकता है. लेकिन जैसे-जैसे यह बदलाव हो रहा है, शासन के ढांचे को भी विकसित होना चाहिए. 'मेरिट ऑर्डर डिस्पैच' को उस दौर में बनाया गया था जब लागत कम करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. आज, जलवायु के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

आर्थिक लाभ को पर्यावरणीय उद्देश्यों के साथ जोड़ना कोई क्रांतिकारी सुधार नहीं है, बल्कि यह एक तार्किक प्रगति है. यदि भारत यह सुनिश्चित करता है कि उसके सबसे कुशल प्लांटों को प्राथमिकता मिले, तो बिना एक भी अतिरिक्त मेगावाट क्षमता बढ़ाए उत्सर्जन में कटौती की गति तेज की जा सकती है. कभी-कभी, सबसे प्रभावी जलवायु कदम नई बुनियादी संरचना बनाने के बारे में नहीं, बल्कि जो पहले से मौजूद है उसका समझदारी से उपयोग करने के बारे में होता है.

निष्कर्ष

यह विरोधाभास बिल्कुल स्पष्ट है. भारत उत्सर्जन कम करने के लिए 'सुपरक्रिटिकल' तकनीक को बढ़ावा दे रहा है, फिर भी हमारी बिजली वितरण प्रणाली कभी-कभी इसे किनारे कर देती है. इस असंतुलन को सुधारने से न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और उत्सर्जन कम होगा, बल्कि वैश्विक जलवायु नेता के रूप में भारत की साख भी बढ़ेगी. सवाल यह नहीं है कि क्या हम इस नीति में सुधार का खर्च उठा सकते हैं; सवाल यह है कि क्या हम इसमें सुधार न करने का जोखिम उठा सकते हैं?

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. यहां व्यक्त किए गए तथ्य और राय ईटीवी भारत के विचारों को नहीं दर्शाते हैं)

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