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Explained: क्या है सुभाष चंद्रा और ₹22,006 करोड़ का NCLT विवाद ? जानिए पूरी कहानी

₹22,000 करोड़ का कर्ज सिर्फ ₹6.5 करोड़ में निपटने के पीछे आखिर सुभाष चंद्रा की पर्सनल गारंटियों और वोटिंग का क्या खेल छिपा है?

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सुभाष चंद्रा, ज़ी मीडिया के मानद चेयरमैन (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)
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By R Srinivasan

Published : September 3, 2026 at 1:57 PM IST

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एसेल ग्रुप और जी (Zee) के कर्ता-धर्ता सुभाष चंद्रा इस समय एक बहुत बड़े कानूनी और बैंकिंग विवाद में फंसे हुए हैं. मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में चल रहा है, जहां उनके भारी-भरकम कर्ज को माफ करने के एक प्रस्ताव पर देश के बड़े-बड़े बैंकों ने हंगामा खड़ा कर दिया है. आइए समझते हैं कि यह पूरी कहानी आखिर है क्या.

खेल ₹170 करोड़ के एक कर्ज से शुरू हुआ था
इस पूरी कहानी की शुरुआत आज से करीब दस साल पहले, दिसंबर 2016 में हुई थी. 'इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस' नाम की एक बड़ी कंपनी ने 'विवेक इन्फ्राकॉन' नाम की एक कंपनी को ₹170 करोड़ का लोन दिया था. यह कंपनी सुभाष चंद्रा और उनके ग्रुप से ही जुड़ी हुई थी.

यह तो बस शुरुआत थी. इसके बाद इस कंपनी और इससे जुड़ी दूसरी कंपनियों ने कई और लोन लिए. देखते ही देखते यह पूरा कर्ज बढ़कर ₹726 करोड़ तक पहुंच गया.

अब मोड़ आता है 5 दिसंबर 2018 को. सुभाष चंद्रा ने इस पूरे लोन के लिए अपनी 'पर्सनल गारंटी' दे दी. कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस गारंटी का सीधा मतलब यह था कि अगर लोन लेने वाली कंपनियां पैसा नहीं चुका पाती हैं, तो सुभाष चंद्रा अपनी जेब से ₹726 करोड़ तक की बकाया रकम चुकाएंगे.

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सुभाष चंद्रा, ज़ी मीडिया के मानद चेयरमैन (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)

जब कंपनियों ने पैसा नहीं चुकाया, तो जनवरी 2022 में इंडियाबुल्स ने सुभाष चंद्रा से उनकी गारंटी के तहत करीब ₹178.79 करोड़ मांगे. जब वहां से भी पैसा नहीं मिला, तो इंडियाबुल्स ने सीधे कोर्ट (NCLT) का दरवाजा खटखटाया और सुभाष चंद्रा को निजी तौर पर दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करवा दी. कोर्ट ने मई 2022 में इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए एक सरकारी अधिकारी (समाधान अधिकारी) भी तय कर दिया.

लेकिन ₹170 करोड़ की बात ₹22,006 करोड़ कैसे बन गई?
आपके मन में भी यह सवाल आ रहा होगा कि जो मामला ₹170 करोड़ या ज्यादा से ज्यादा ₹726 करोड़ का था, वह ₹22,006 करोड़ कैसे हो गया?

हुआ यह कि सुभाष चंद्रा ने सिर्फ इंडियाबुल्स के लोन की गारंटी नहीं ली थी. उन्होंने अपने और एसेल ग्रुप से जुड़ी अलग-अलग कंपनियों द्वारा लिए गए कई अन्य भारी-भरकम लोनों के लिए भी बैंकों को ऐसी ही पर्सनल गारंटियां दे रखी थीं.

जैसे ही इंडियाबुल्स ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ कोर्ट में केस किया, तो जिन-जिन बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का पैसा एसेल ग्रुप की कंपनियों पर बकाया था, वे सब भी दौड़कर इसी केस में शामिल हो गए. उन सभी का कहना था कि चूंकि कंपनियों ने डिफॉल्ट किया है (पैसा नहीं चुकाया है), इसलिए पर्सनल गारंटी के नियम के मुताबिक अब सुभाष चंद्रा को इन सबका पैसा चुकाना होगा. इन सभी बैंकों के दावों को जब जोड़ा गया, तो कुल रकम ₹22,006 करोड़ से भी ऊपर निकल गई. इस तरह यह एक छोटा सा केस सभी बैंकों का एक सामूहिक केस बन गया.

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सुभाष चंद्रा, ज़ी मीडिया के मानद चेयरमैन (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)

इस पर सुभाष चंद्रा का क्या कहना है?
सुभाष चंद्रा इस ₹22,006 करोड़ के आंकड़े को गलत बताते हैं. उनकी दलीलें कुछ इस तरह हैं:

  1. कोर्ट के अधिकारी ने कुछ बैंकों के दावों को खारिज कर दिया था, इसलिए असली मंजूर रकम ₹21,696 करोड़ ही है.
  2. इसमें से ₹1,494 करोड़ तो वो मुख्य कंपनियां ही चुकाने को तैयार हैं जिन्होंने लोन लिया था, क्योंकि असली जिम्मेदारी तो उन्हीं की है.
  3. चंद्रा का यह भी कहना है कि असली विवाद सिर्फ ₹3,992 करोड़ का है, क्योंकि यह उन बैंकों का पैसा है जिन्होंने उनके सेटलमेंट प्लान के खिलाफ वोट किया था. और इसमें से भी ₹620 करोड़ का मामला बाद में सुलझ चुका है.

तो फिर सुभाष चंद्रा ने पैसा चुकाने का क्या प्लान दिया?
इस पहाड़ जैसे कर्ज को निपटाने के लिए सुभाष चंद्रा ने कोर्ट के सामने एक ऐसा प्लान रखा जिसने सबको चौंका दिया. उन्होंने कहा कि:

  • वे अपनी निजी संपत्ति से लेनदारों को केवल ₹6.25 करोड़ चुकाएंगे.
  • इसके अलावा कोर्ट और दिवालिया प्रक्रिया के खर्च के लिए ₹25 लाख देंगे (यानी कुल ₹6.5 करोड़).
  • बाकी बची रकम में से लगभग ₹1,494 करोड़ वो कर्जदार कंपनियां अलग से चुकाएंगी.

बैंकों की वोटिंग में क्या हुआ?
इस प्लान को पास या फेल करने के लिए सभी लेनदारों (बैंकों) के बीच वोटिंग कराई गई.

  • कुल वोटों में से 77.48% वोट इस प्लान के पक्ष में पड़े.
  • 18.42% वोट इसके विरोध में पड़े.
  • करीब 4.10% वोटर्स (जैसे म्यूचुअल फंड के ट्रस्ट) ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया.

जब वोट न देने वालों को हटाकर गिनती की गई, तो पक्ष में पड़े वोट 80.81% हो गए और विरोध वाले 19.18% रह गए. कानून के हिसाब से यह प्लान पास होने के लिए काफी था.

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सुभाष चंद्रा, ज़ी मीडिया के मानद चेयरमैन (Photo by Vipin Kumar/Hindustan Times via Getty Images)

फिर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हो गया?
जैसे ही यह बात सामने आई, बैंकिंग सेक्टर और मीडिया में हंगामा मच गया. इस विवाद के पीछे तीन मुख्य वजहें थीं

  1. नाममात्र की वसूली: सबसे बड़ी बात यह थी कि बैंकों के ₹22,006 करोड़ के दावों के सामने सुभाष चंद्रा सिर्फ ₹6.25 करोड़ दे रहे थे. यह कुल रकम का सिर्फ 0.028% है. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि बैंकों को अपना 99.97% से ज्यादा का पैसा भूलना पड़ रहा था (बिजनेस की भाषा में इसे भारी हेयरकट कहते हैं).
  2. वोटिंग का खेल: विरोध करने वाले बैंकों का सीधा आरोप था कि इस प्लान के पक्ष में जिन कंपनियों ने बढ़-चढ़कर वोट डाला, वे असल में कोई बाहरी बैंक नहीं बल्कि खुद सुभाष चंद्रा की ही अपनी या उनसे जुड़ी हुई कंपनियां (जैसे वीना इन्वेस्टमेंट्स, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स आदि) थीं. नियम के मुताबिक इन्हें वोट देने का हक ही नहीं होना चाहिए था. पक्ष में पड़े कुल वोटों में करीब 61.78% हिस्सा इन्हीं कंपनियों का था.
  3. अचानक गायब हुई नेटवर्थ: बैंकों ने कोर्ट में साल 2017 और 2018 के सर्टिफिकेट दिखाए, जब ये लोन दिए जा रहे थे. उस समय सुभाष चंद्रा की कुल निजी संपत्ति (नेटवर्थ) करीब ₹45,888 करोड़ और ₹40,562 करोड़ दिखाई गई थी. बैंकों ने सवाल उठाया कि चंद सालों में इतनी बड़ी संपत्ति अचानक कहाँ गायब हो गई?

सुभाष चंद्रा की सफाई: चंद्रा ने कहा कि जिन कंपनियों पर सवाल उठ रहे हैं, वे उनकी नहीं हैं क्योंकि 2008 में ही एक पारिवारिक समझौते के तहत वे उनके भाई जवाहर गोयल के पास चली गई थीं. वहीं नेटवर्थ के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि वो बड़ी रकम उनके पूरे ग्रुप के बिजनेस की वैल्यू थी, उनकी निजी संपत्ति नहीं. उन्होंने बताया कि 2016 में जब वे सांसद बने थे, तब उन्होंने अपनी निजी संपत्ति सिर्फ ₹39.08 करोड़ घोषित की थी.

कोर्ट का फैसला और वर्तमान स्थिति
इस मामले पर फैसला सुनाने वाले NCLT के दो जजों में खुद आपस में ठन गई. एक महिला जज (रीना सिन्हा पुरी) ने इस प्लान को खारिज कर दिया, जबकि दूसरे जज (अशोक कुमार भारद्वाज) ने इसे पास कर दिया.

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सुभाष चंद्रा, ज़ी मीडिया के मानद चेयरमैन (Photo by Ramesh Pathania/Mint via Getty Images)

चूंकि दोनों जजों की राय अलग थी, इसलिए मामला तीसरे जज (नीलेश शर्मा) के पास भेजा गया. 25 अगस्त 2026 को जज नीलेश शर्मा ने कानून की धारा 114 के तहत सुभाष चंद्रा के इस प्लान को अपनी मंजूरी दे दी.

फैसले पर लगी रोक: ₹22,000 करोड़ के बदले सिर्फ सवा छह करोड़ की मंजूरी मिलते ही चारों तरफ आलोचनाएं शुरू हो गईं. इसके बाद NCLT के सबसे बड़े अध्यक्ष (जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल) ने खुद दखल दिया और मामले की दोबारा जांच के लिए 5 जजों की एक विशेष बेंच बना दी. इस बड़ी बेंच ने सबसे पहला काम यह किया कि नीलेश शर्मा के उस मंजूरी वाले आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक (Stay) लगा दी. इस मामले की अगली सुनवाई अब 23 सितंबर 2026 को होगी.

यह लड़ाई अब दो तरफा चल रही है. एक तरफ जहाँ NCLT की 5 जजों की बेंच इस फैसले की दोबारा जांच कर रही है, वहीं दूसरी तरफ परेशान बैंकों ने इस आदेश के खिलाफ ऊपरी अदालत (NCLAT) में भी केस ठोक दिया है. अब देखना यह है कि आगे इन अदालतों का क्या फैसला आता है.

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