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शहरों के लिए दिवालियापन कानून: भारत का अधूरा सुधार

भारत को नगरपालिका दिवालियापन कानून बनाने में अनूठी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय निकाय राज्य सरकारों के अंतर्गत आते हैं.

Insolvency Law for Cities Unfinished Reform of India Municipal Solvency Act urban financial regulatory
प्रतीकात्मक तस्वीर (ETV Bharat)
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By Soumyadip Chattopadhyay

Published : November 11, 2025 at 9:07 AM IST

10 Min Read
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संसद में हाल ही में पेश किए गए दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2025 ने एक समर्पित नगरीय शोधन क्षमता अधिनियम पर नीतिगत चर्चाओं को गति दी है- यह संकेत देते हुए कि भारत आखिरकार अपने सबसे स्पष्ट शहरी वित्तीय नियामक अंतराल को दूर कर सकता है. भारत के शहर विविध स्रोतों—हुडको (HUDCO), एलआईसी, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों, विशिष्ट अवसंरचना वित्त कंपनियों और राज्य वित्तीय मध्यस्थ निधियों—से उधार लेते हैं. कुछ शहरों ने नगरपालिका बॉन्ड के माध्यम से पूंजी बाजार में प्रवेश किया है. आरबीआई की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय संस्थानों से उधारी कुल नगरपालिका प्राप्तियों का लगभग 5 प्रतिशत है, जिसमें हुडको के ऋण- राज्य सरकार की गारंटी द्वारा समर्थित -वाणिज्यिक ऋण के 80 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं.

हालांकि नगरपालिका बॉन्ड कुल ऋण में केवल एक छोटा सा अंश योगदान करते हैं, उनका हालिया पुनरुत्थान उल्लेखनीय है. 2017 और 2023 के बीच, अब तक के सभी बॉन्ड आय का 40 प्रतिशत हिस्सा जुटाया गया था, जो सेबी के नए नियमों द्वारा संचालित था, जो स्पष्ट पात्रता मानदंड निर्धारित करते हैं: सकारात्मक शुद्ध मूल्य, शुद्ध ऋण चुकता रिकॉर्ड और निवेश-ग्रेड क्रेडिट रेटिंग (बीबीबी- या उससे ऊपर). अप्रैल 2019 से, विदेशी निवेशक इस बाजार में भाग ले सकते हैं, हालांकि राज्य विकास ऋण पर मामूली 2 प्रतिशत की सीमा के साथ. शहरी बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण में नगरपालिका राजस्व की निरंतर कमी को देखते हुए, नवीन वित्तपोषण साधनों की यह खोज महत्वपूर्ण महत्व रखती है. जैसे-जैसे भारतीय शहर बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण के लिए पूंजी बाजारों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं, एक चिंताजनक प्रश्न उठता है: क्या होगा जब वे ऋण चुकाने में असमर्थ होंगे?

कानूनी अस्पष्टता और वास्तविक परिणाम
राज्य नगरपालिका अधिनियम, प्राधिकरण, उद्देश्य, सीमा, अवधि और पुनर्भुगतान तंत्र सहित उधार लेने की शक्तियों का निर्धारण करते हैं. भारत में नगरपालिका बॉन्ड सामान्य दायित्व बॉन्ड के समान होते हैं, जिनमें ऋण सेवा संपत्ति कर जैसे विशिष्ट कर स्रोतों या उपयोगकर्ता शुल्क और फीस जैसे परियोजना राजस्व से जुड़े एस्क्रो खातों (escrow accounts) के माध्यम से सुरक्षित होती है. कुछ राज्यों में अन्य राजस्व को रोकने (जैसे, मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956, बिहार नगरपालिका अधिनियम की धारा 122 सभी शहरी स्थानीय निकायों पर लागू) या यहां तक कि तरलता (Liquidity) सुनिश्चित करने के लिए नगरपालिका संपत्ति को गिरवी रखने (जैसे, नागपुर नगर निगम) के प्रावधान हैं. हालांकि, ये पूर्व उधार नियम मुख्यतः एडहॉक और विवेकाधीन बने हुए हैं.

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि नगर निगमों के दिवालियापन से निपटने के लिए किसी भी पूर्व-निर्धारित व्यवस्था का अभाव है. जब शहर ऋण भुगतान में चूक करते हैं, तो लेनदारों को अपने अधिकारों और दावा प्रक्रिया के बारे में पूरी तरह से अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. सेबी ने अभी तक दिवालिया होने वाले नगर निगमों के लिए ऋण वसूली पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं. यह स्पष्ट नहीं है कि क्या दिवाला और दिवालियापन संहिता या कॉर्पोरेट ऋण पर लागू ऋण वसूली न्यायाधिकरण अधिनियम, नगर निगमों के चूक के मामलों में लागू किया जा सकता है. यह नियामकीय कमी (regulatory vacuum) लेनदारों के विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर करती है और भारत के नगर निगम बॉन्ड बाजार की गहराई को सीमित करती है.

दूसरे देशों से सीख
सिर्फ कुछ ही देशों ने स्थानीय निकायों के लिए दिवालियापन ढांचे स्थापित किए हैं. अमेरिका अपने दिवालियापन संहिता के अध्याय 9 के जरिये इसका सबसे शिक्षाप्रद उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह यात्रा आसान नहीं रही-मूल 1934 के नगरपालिका दिवालियापन कानून को राज्य की संप्रभुता का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया गया था. अमेरिका बनाम बेकिंस (Bekins) मामले में संवैधानिक रूप से स्वीकृत 1937 के संशोधित अधिनियम ने 1978 के दिवालियापन सुधार अधिनियम के जरिये आज के अध्याय 9 का रूप ले लिया.

नगरपालिका संप्रभुता का सम्मान करते हुए, अध्याय 9 शहरों को ऋण समायोजन पर व्यापक विवेकाधिकार प्रदान करता है, जहां न्यायालय केवल दिवालियापन का निर्धारण और पुनर्गठन योजनाओं का मूल्यांकन कर सकते हैं. लेनदारों द्वारा परिसंपत्ति परिसमापन के किसी भी दावे पर स्वतः रोक लगाने का प्रावधान है ताकि नगरपालिकाएं ऋण समायोजन योजना पर बातचीत करते हुए बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करना जारी रख सकें. डेट्रॉइट (Detroit) का 2013 का दिवालियापन—जो घटते टैक्स आधार और बढ़ती पेंशन लागतों के कारण हुआ—इस ढांचे की प्रभावशीलता को दर्शाता है. न्यायालय की निगरानी में, शहर ने लेनदारों के साथ बातचीत की और एक वर्ष के भीतर एक व्यवहार्य वित्तीय पुनर्गठन योजना के साथ दिवालियापन से उबर गया. भारत के सामने चुनौती इन सीखों को अपनी अनूठी संवैधानिक संरचना के अनुकूल बनाने की है.

संप्रभुता बनाम ऋण शोधन क्षमता: भारत की दुविधा
भारत को नगरपालिका दिवालियापन कानून बनाने में अनूठी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय निकाय राज्य सरकारों के अंतर्गत आते हैं. नगरपालिकाओं को शहरी सेवाएं प्रदान करने का संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है. किसी भी दिवालियापन ढांचे में विरोधाभासी प्रतीत होने वाली अनिवार्यताओं के बीच संतुलन बनाना होगा: आवश्यक शहरी सेवाओं की निर्बाध आपूर्ति और लेनदारों के दावों का निपटान.

ये संघर्ष बहुआयामी हैं और हमारी संवैधानिक संरचना में गहराई से निहित हैं. पहला, चूंकि दिवालियापन समवर्ती सूची में आता है, इसलिए केंद्रीय दिवालियापन कानून नगरपालिका प्रशासन पर राज्य की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है. दूसरा, ऋण नवीनीकरण के लिए आमतौर पर एस्क्रो राजस्व या नगरपालिका संपत्तियों पर दावों को सुरक्षित करना जरूरी होता है. डेट्रॉइट के मामले में, संपत्ति करों पर बॉन्डहोल्डर्स के दावों को असुरक्षित माना गया, जिसके परिणामस्वरूप कैसीनो टैक्स राजस्व पर अधिकार के माध्यम से पुनर्गठन किया गया. लेकिन भारत की स्थिति कहीं अधिक जटिल है. राज्य सरकारें नगरपालिका वित्त पर कड़ा विवेकाधीन नियंत्रण रखती हैं. वित्त विभाग अपारदर्शी प्रक्रियाओं के माध्यम से राजस्व उपयोग और संपत्ति संपार्श्विकीकरण (collateralization) को मंजूरी देते हैं. स्थानीय राजस्व और संपत्तियों को संपार्श्विक के रूप में उपयोग करने की वास्तविक संभावना अत्यधिक अनिश्चित बनी हुई है. उदाहरण के लिए, पुणे नगर निगम के बॉन्ड के लिए अंतर्निहित संरचित भुगतान तंत्र 'नो-लीन एस्क्रो अकाउंट्स' (no-lien escrow accounts) से संबंधित है. यह संभावित चूक की स्थिति में नगरपालिका संपत्ति या राजस्व पर बॉन्डहोल्डर के दावों को अनिवार्य रूप से असुरक्षित छोड़ देता है - कानूनी अनिश्चितता की एक उल्लेखनीय स्वीकृति. ऋण नवीनीकरण के मामलों में टैक्स वृद्धि या उपलब्ध नगरपालिका करों से राजस्व प्राप्तियों का उपयोग करने की जरूरत होती है. यह स्पष्ट नहीं है कि राज्य के विशेषाधिकारों और ऋणदाताओं के अधिकारों के बीच टकराव पैदा किए बिना, इसे हमारी मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत वैध कैसे बनाया जा सकता है, इसे लागू करना तो दूर की बात है.

भारत में नगरपालिका दिवालियापन समाधान में अनिवार्य रूप से राज्य सरकारों, नगरपालिकाओं और निवेशकों के बीच त्रिपक्षीय वार्ता शामिल होगी. चूंकि राज्य सरकारें राजस्व आधार को नियंत्रित करती हैं, इसलिए वे इन वार्ताओं पर हावी रहेंगी. ऐसी प्रक्रियाओं की एड-हॉक प्रकृति, जो परस्पर विरोधी राजनीतिक और व्यावसायिक हितों से प्रभावित होती है, लेनदारों (creditors) के लिए कुशल जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करने में दिवालियापन प्रावधानों की प्रभावशीलता को सीमित कर देगी.

इससे भी बदतर, दिवालियापन से प्रेरित राज्य की जमानत स्थानीय स्तर पर कठोर बजटीय बाधाओं को कमजोर कर सकती है. अल्पकालिक राहत प्रदान करते हुए, यह शहरों और राज्यों को मूल रूप से अस्थिर वित्तीय ढांचे के साथ दिवालियापन से बाहर निकलने का अवसर देता है - जो बार-बार आने वाले संकटों का एक नुस्खा है. स्पष्ट कानूनी ढांचे के बिना, प्रत्येक नगरपालिका चूक एक पूर्वानुमानित कानूनी प्रक्रिया के बजाय एक राजनीतिक बातचीत में तब्दील हो जाने का खतरा है.

भविष्य के लिए सुझाव
भारत को नगरपालिका चूक (municipal default) के लिए एक संस्थागत ढांचे की तत्काल आवश्यकता है.

सबसे पहले, पेशेवर निगरानी सुनिश्चित करना अनिवार्य है. जिस प्रकार आरबीआई दिवालिया वित्तीय संस्थानों के लिए प्रशासक नियुक्त करता है, उसी प्रकार राज्य सरकारों को भी बातचीत की निगरानी और रिकवरी योजनाएं तैयार करने के लिए दिवाला पेशेवरों के साथ-साथ नगर निगम प्रशासकों को भी नियुक्त करना चाहिए. 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुच्छेद 243R में नगर प्रशासन में विशिष्ट ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञों की नियुक्ति का प्रावधान है. इन प्रशासकों को बेलआउट योजनाएं तैयार करने के लिए निर्धारित समय-सीमा के साथ स्पष्ट अधिकार-पत्रों की जरूरत होती है.

दूसरा, पारदर्शी तरीके से कानून को लागू करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. राज्य नगरपालिका अधिनियमों में व्यापक संशोधनों की आवश्यकता है ताकि उन गैर-जरूरी संपत्तियों की पहचान की जा सके जिन्हें शहरी सेवा वितरण से समझौता किए बिना ऋण के बदले गिरवी रखा जा सके. मौजूदा अस्पष्टताओं—जैसे 'नो-लीन एस्क्रो अकाउंट्स' के प्रावधान, जो बॉन्डहोल्डर्स को असुरक्षित छोड़ देते हैं—को समाप्त किया जाना चाहिए. राज्य नगरपालिका अधिनियमों में उचित संशोधन किया जाना चाहिए ताकि यह निर्दिष्ट किया जा सके कि कौन सी नगरपालिका संपत्तियां, किन शर्तों के तहत और किन प्रक्रियाओं के माध्यम से कुर्क की जा सकती हैं.

तीसरा, स्पष्ट उत्प्रेरक तंत्र (trigger mechanisms) होना चाहिए. अमेरिका में, राज्य कानून नगरपालिकाओं को दिवालियापन दायर करने का अधिकार देते हैं. इस आशंका को देखते हुए कि भारत में राज्य सरकारें शहरों को दिवालिया घोषित करने से रोक सकते हैं, लेनदारों के पास नगरपालिकाओं द्वारा पूर्व-निर्धारित अवधि से अधिक ऋण चुकाने में विफल रहने पर दिवालियापन दायर करने का प्रावधान होना चाहिए.

चौथा, किसी भी दिवालियापन ढांचे को दिवालियापन के मूल कारणों को स्वीकार करना चाहिए और मौजूदा राजकोषीय अनुशासन उपायों को लागू करना चाहिए, न कि केवल खामियों को दूर करना चाहिए. ढांचे को नगरपालिकाओं को पूंजी बाजार में प्रवेश करने से पहले पर्याप्त राजस्व आधार बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और ऋण-से-राजस्व अनुपात का नियमित खुलासा अनिवार्य करना चाहिए. इन निवारक उपायों के बिना, दिवालियापन (insolvency) प्रावधान केवल उन संकटों से बाहर निकलने का रास्ता प्रदान करेंगे जिन्हें टाला जा सकता था.

जैसे-जैसे तेजी से भारत का शहरीकरण हो रहा है, हमारे शहर नियामकीय खालीपन में फंसे रहने का जोखिम नहीं उठा सकते. एक सुविचारित नगरपालिका दिवालियापन कानून लेनदारों को यह संकेत देगा कि ऋण पुनर्गठन पूर्वानुमानित और व्यवस्थित होगा. यह निश्चितता निवेशकों का विश्वास बढ़ाएगी, जिससे आखिरकार नगरपालिकाओं को शहरी बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण के लिए स्थायी आधार पर संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी.

(लेखक, विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन में अर्थशास्त्र एवं राजनीति विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)

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