पूरे देश के लिए 'अलार्म' है इंदौर की त्रासदी, विशेषज्ञ से समझें क्यों खतरे में है भारत का 'जल भविष्य'
दशकों से भारत अपने भूजल को खत्म कर रहा है, जिसका मुख्य कारण जरूरत से ज्यादा पानी निकालना और बारिश में कमी आना है.


Published : January 11, 2026 at 6:01 AM IST
भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में पहचाना जाने वाला इंदौर, हाल ही में दूषित पानी के एक दुखद संकट के कारण चर्चा में रहा, जिसमें 15 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. दस्त (डायरिया) और उल्टी की इस बीमारी का मुख्य कारण बुनियादी ढांचे की विफलता थी, जिसकी वजह से सीवेज का गंदा पानी पीने के पानी की सप्लाई में मिल गया था.
इंदौर अपनी पानी की मुख्य जरूरतों के लिए 80 किलोमीटर दूर स्थित नर्मदा नदी पर निर्भर है. नगर निगम की पाइपलाइनों के जरिए पानी लाया जाता है और घरों में एक दिन छोड़कर (अल्टरनेट डे) सप्लाई की जाती है. यह एक बहुत बड़ा काम है, जिसके लिए नगर निगम को केवल बिजली के बिल के रूप में ही हर महीने लगभग 25 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं.
यहां एक मुख्य सवाल उठता है इंदौर इतनी दूर से पानी क्यों लाता है, जबकि वह इसे स्थानीय स्तर पर भी जुटा सकता है? शहर ने नर्मदा नदी का रुख इसलिए किया क्योंकि इसके ऐतिहासिक जल स्रोत- खान और सरस्वती नदियां- 1990 के दशक की शुरुआत से तेजी से हुए शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण बेहद प्रदूषित और अपर्याप्त हो गए. ये स्थानीय नदियां अब गर्मियों में सूख जाती हैं और शहर की लगातार बढ़ती भारी मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं. इस वजह से, सदाबहार नर्मदा नदी से पानी लाना जल सुरक्षा के लिए एक जरूरी, हालांकि जटिल इंजीनियरिंग विकल्प बन गया है.
दूषित पानी के इस संकट ने विफलता को उजागर किया है. प्रदूषण केवल पाइप वाली सप्लाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरी जल प्रणाली-सतह के पानी (नदियों) और भूजल (ग्राउंडवाटर) दोनों को खराब कर दिया है. यह समस्या सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है. यह बिगड़ती जल व्यवस्था के उस राष्ट्रव्यापी बोझ को दर्शाती है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में कम या ज्यादा गंभीर रूप में मौजूद है.

भारत की गिरती जल गुणवत्ता
अनुमान है कि साल 2050 तक शहरी आबादी की वृद्धि के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे होगा. देश की शहरी आबादी, जो 1901 में केवल 11% थी, वह 2017 तक बढ़कर लगभग 38% हो गई है. बिना रुके होने वाले इस शहरीकरण ने उन जल संसाधनों पर भारी दबाव डाल दिया है, जो पहले से ही संकट में हैं. जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता इस स्थिति को और भी गंभीर बना रही है, जिससे कृषि उत्पादकता कम हो रही है और आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरों की ओर पलायन कर रहा है, जिससे पहले से ही दबाव झेल रही जल प्रणालियों पर निर्भरता और बढ़ रही है.
दशकों से भारत बहुत ही चिंताजनक दर से अपने भूजल (ग्राउंडवाटर) को खत्म कर रहा है, जिसका मुख्य कारण जरूरत से ज्यादा पानी निकालना और बारिश में कमी आना है. 'हरित क्रांति' के बाद से, चावल जैसी अधिक पानी की खपत वाली फसलों की सिंचाई के लिए भूजल ही मुख्य आधार रहा है, लेकिन यह सफलता उर्वरकों (Fertilisers) के अत्यधिक उपयोग और जलभृतों (Aquifers) के अंधाधुंध दोहन पर टिकी थी.
कृषि, जो मीठे पानी (Freshwater) का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, उसके कारण गंगा के मैदानी इलाकों में भूजल का स्तर हर साल 4 सेंटीमीटर नीचे गिर रहा है. नासा के शोधकर्ता मैथ्यू रोडेल के अनुसार, अकेले उत्तर भारत हर साल 19.2 गीगाटन भूजल खो देता है. भारत सालाना 75 अरब घन मीटर भूजल निकालता है-जो पूरी दुनिया के कुल निष्कर्षण का हैरान करने वाला एक-तिहाई हिस्सा है. पानी की सबसे अधिक कमी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल जैसे कृषि क्षेत्रों में केंद्रित है.

इस असंतुलन के परिणाम बेहद भयानक हैं
नीति आयोग (NITI Aayog) का अनुमान है कि 2030 तक 40% भारतीयों के पास 'पीने के पानी तक पहुंच नहीं' होगी. आयोग ने चेतावनी दी है कि बड़े शहरों के भूजल स्रोत (Aquifers) पूरी तरह सूखने की कगार पर हैं. पानी की ऐसी किल्लत खाद्य आपूर्ति के लिए खतरा पैदा करती है, जिससे कीमतें आसमान छू सकती हैं और सामाजिक अशांति फैल सकती है.
नीतियों की विफलता इस संकट को और बढ़ा रही है, जिसमें बिजली पर दी जाने वाली अनियंत्रित सब्सिडी शामिल है, जो पानी बचाने को बढ़ावा देने के बजाय जरूरत से ज्यादा पंपिंग (पानी निकालने) को प्रोत्साहित करती है. पानी की गुणवत्ता भी पूरी तरह गिर चुकी है. वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक (Global Water Quality Index) में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है.
पानी में यह प्रदूषण प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से है
ओडिशा में फ्लोराइड की विषाक्तता एक बड़ी समस्या है. बंगाल बेसिन में आर्सेनिक जहर की तरह फैला है, जो सिंचाई के जरिए खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर रहा है. राजस्थान व दिल्ली के हालिया अध्ययनों से फ्लोराइड, नाइट्रेट और यूरेनियम के व्यापक प्रदूषण का पता चला है. 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के 13-15% भूजल नमूनों में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सीमा से अधिक पाई गई, जो कैंसर और किडनी की बीमारियों के गंभीर जोखिम पैदा करती है.
पानी की कमी और प्रदूषण के इस दोहरे संकट से निपटने के लिए हमारी तकनीकी क्षमता बेहद अपर्याप्त है. अधिकांश बड़े शहरों में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों की भारी कमी है. कई बड़े शहरों में पीने का पानी पानी के टैंकरों से सप्लाई किया जाता है, क्योंकि पानी के पुराने सोर्स सूख गए हैं. पूरे देश में इन टैंकरों की हालत बहुत गंदी है. केंद्र सरकार पानी बांटने वाले टैंकरों के लिए 304-ग्रेड स्टील का इस्तेमाल ज़रूरी क्यों नहीं कर सकती?
यहां एक बुनियादी सवाल बना हुआ है: जल जीवन जैसे मिशनों पर सरकार द्वारा भारी-भरकम खर्च किए जाने के बावजूद, ये समस्याएं लगातार क्यों फैल रही हैं और गंभीर होती जा रही हैं? इंदौर की त्रासदी कोई अपवाद नहीं, बल्कि जल शासन (Water Governance) में राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त विफलता का एक लक्षण है. यह एक कड़ी चेतावनी है कि यदि संकट के पैमाने को देखते हुए प्रबंधन में सुधार नहीं किया गया, तो भविष्य में स्थिति और भी भयावह हो सकती है.

समाधान
भारत के जल संकट के प्रस्तावित समाधान के रूप में बड़े पैमाने पर तकनीकी सुधारों के मॉडल को काफी लोकप्रियता मिली है. सरकार लगातार प्रमुख नदियों को आपस में जोड़ने (interlinking) की अवधारणा को बढ़ावा दे रही है. यह भू-इंजीनियरिंग का एक रूप है जिसमें बेसिन के बीच पानी का हस्तांतरण शामिल है, ताकि पानी की कमी को दूर किया जा सके.
इसका एक प्रमुख उदाहरण भारत की पहली बड़ी, बिजली-संचालित नदी-जोड़ परियोजना है, जिसके तहत 2016 के उज्जैन महाकुंभ के लिए लगभग सूखी शिप्रा (Kshipra) नदी को पुनर्जीवित करने के लिए नर्मदा नदी का पानी पंप किया गया था. इस 432 करोड़ रुपये की योजना में पानी को 350 मीटर की ऊंचाई तक उठाया गया और विशाल पंपिंग स्टेशनों का उपयोग करके 50 किलोमीटर तक मोड़ा गया. इसने अब एक मिसाल कायम कर दी है, जिसके बाद अगला कुंभ मेला 2028 में उज्जैन में होने की उम्मीद है.
हालांकि, 'अधिशेष' (ज्यादा पानी वाली) नदियों को 'कमी' वाली नदियों से जोड़ने का यह भव्य दृष्टिकोण बुनियादी रूप से त्रुटिपूर्ण है. यह पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान की अनदेखी करता है और नदियों व उनके महत्वपूर्ण डेल्टा क्षेत्रों के पारिस्थितिक विनाश का जोखिम पैदा करता है. मीठे पानी के मार्ग को बदलने से, ये परियोजनाएं डेल्टाओं तक पहुंचने वाले उस प्रवाह को रोक देती हैं जो समुद्र के खारे पानी को अंदर आने से रोकने के लिए जरूरी होता है, जिससे वहां का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) तबाह हो जाता है.
नीति निर्माता एक महत्वपूर्ण जलविज्ञानी सत्य को नजरअंदाज करते हैं. किसी भी नदी में कोई 'अतिरिक्त' पानी फालतू नहीं होता. 'समुद्र में बर्बाद होने वाले पानी' को रोकने जैसे सरल गणितीय तर्क जानबूझकर नदी बेसिन के जटिल पारिस्थितिक कार्यों की अनदेखी करते हैं. इन परियोजनाओं के समर्थक नदी को एक एकीकृत तंत्र के रूप में देखने में विफल रहते हैं, जो अपने उद्गम स्थल से लेकर डेल्टा के उन मैदानों तक आपस में जुड़ी होती है जहां वह समुद्र से मिलती है.
इसके परिणाम पहले से ही स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं. सरदार सरोवर बांध के पूरा होने के बाद से नर्मदा नदी के निचले हिस्से (डाउनस्ट्रीम) की जो हालत हुई है, वह हमारे सामने एक आधुनिक और चेतावनी भरी मिसाल है. यह उदाहरण दिखाता है कि नदियों के प्राकृतिक बहाव में इस तरह के हस्तक्षेपों के कितने गहरे और अक्सर कभी न सुधरने वाले (irreversible) प्रभाव होते हैं.
भारत का जल संकट अब नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खराब पर्यावरणीय शासन, अपर्याप्त कानून और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार है. इस संकट को भारत की व्यापक 'जल आपातकाल' की स्थिति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए- एक ऐसा संकट जो गंभीर प्रदूषण और गंदगी से परिभाषित होता है. इसके बावजूद, सभी नदी बेसिनों में पारिस्थितिक समाधानों (ecological solutions) की लगातार अनदेखी की जा रही है.
इस बिगड़ती स्थिति को पलटने के लिए, एक नई राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता है, जो 'वॉटरशेड मैनेजमेंट' (जल-विभाजन प्रबंधन) और सशक्त स्थानीय भागीदारी पर आधारित एक समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए.

इस नीति को निम्नलिखित कार्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए:
- स्थानीय और वैज्ञानिक विशेषज्ञता का मेल: एक ऐसा सहभागी ढांचा (फ्रेमवर्क) तैयार किया जाए जहां जलविज्ञानी, इंजीनियर और जीवविज्ञानी, स्थानीय नागरिकों के साथ मिलकर जल चक्र (Hydrological Cycle) की निगरानी और प्रबंधन के लिए काम करें.
- भूजल प्रणालियों का पुनरुद्धार: प्राकृतिक हरियाली बढ़ाने के लिए भूमि-उपयोग के नियमों में बदलाव किया जाए और वन क्षेत्रों में सघन पौधारोपण का विस्तार किया जाए ताकि भूजल पुनर्भरण (Recharge) में सुधार हो सके. इसके साथ ही, विशेष रीचार्ज ढांचों का निर्माण किया जाए और पानी निकालने की प्रक्रिया का वैज्ञानिक प्रबंधन हो, ताकि अत्यधिक दोहन की भरपाई हो सके.
- मजबूत शासन तंत्र की स्थापना: एक नदी संरक्षण कोष बनाया जाए और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में समुदाय के नेतृत्व वाली रीचार्ज पहल शुरू की जाए. भूजल स्रोतों (Aquifer) के प्रबंधन की ऐसी प्रभावी योजनाएं विकसित की जाएं जो पानी के उपयोग को नियंत्रित करें और कुशल सिंचाई रणनीतियां बनाने के लिए किसानों को सक्रिय रूप से शामिल करें.
- अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा: सरकार को गंदे पानी (सीवेज/अपशिष्ट जल) को साफ करने और उसे फिर से इस्तेमाल में लाने के लिए बड़े पैमाने पर रचनात्मक कार्यक्रम विकसित करने चाहिए. यह एक ऐसा संसाधन है जो वर्तमान में नियंत्रण और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बर्बाद हो रहा है.
इन समन्वित प्रयासों के कुशल और समय पर क्रियान्वयन के बिना, भारत का जल भविष्य और इसके साथ जुड़ी देश की खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता, बेहद अंधकारमय बनी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में बताए गए विचार लेखक के अपने हैं. यहां बताए गए तथ्य और राय ETV भारत के विचारों को नहीं दिखाते हैं.)
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