Explained: खामेनेई की मौत और हॉर्मुज संकट के बीच, क्यों चर्चा में है भारत का 'तेल सुरक्षा कवच'?
'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' वही संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है. भारत अपनी जरूरतों के लिए इस पर निर्भर है.


Published : March 1, 2026 at 7:04 PM IST
अमेरिका-इजरायल के हमले में शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) को दशकों के सबसे अस्थिर दौर में धकेल दिया है. इस घटना से एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खतरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है. यह चिंता तब और बढ़ गई जब रविवार को ओमान ने खबर दी कि 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' के पास उसके एक तेल टैंकर पर हमला हुआ है.
'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' वही संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है. भारत के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों के लिए भारी मात्रा में इन समुद्री रास्तों पर निर्भर है, इस संकट ने उसके 'रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व' (SPR) यानी आपातकालीन तेल भंडार की ओर ध्यान फिर से केंद्रित कर दिया है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है, जो अपनी खपत का लगभग 80-90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. हर महीने आने वाले कच्चे तेल के शिपमेंट का एक बड़ा हिस्सा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के रास्ते से ही गुजरता है.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास ओमान के तेल टैंकर पर हुए हमले की खबर ने इन डर को और गहरा कर दिया है कि दुनिया का यह सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग अब युद्ध का मैदान बन सकता है. भारत के लिए, जिसकी ऊर्जा की जीवन रेखा इन्ही विवादित समुद्री रास्तों से होकर गुजरती है, ने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) की अहमियत को एक 'दीर्घकालिक सावधानी' से बदलकर एक 'तत्काल आर्थिक सुरक्षा कवच' बना दिया है.
SPR क्या है और इसकी कल्पना कब की गई थी?
अमेरिका का SPR (रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व), आपातकालीन कच्चे तेल का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है. इसकी स्थापना मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में आने वाली बाधाओं के प्रभाव को कम करने और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कार्यक्रम के तहत वाशिंगटन (अमेरिकी सरकार) की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए की गई थी.
केंद्र सरकार के स्वामित्व वाला यह तेल भंडार 'गल्फ ऑफ अमेरिका' के तट पर चार स्थानों पर विशाल भूमिगत नमक की गुफाओं में जमा करके रखा जाता है. SPR का विशाल आकार (रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी क्षमता 71.4 करोड़ बैरल है) इसे तेल आयात में कटौती के खिलाफ एक बड़ी सुरक्षा और विदेश नीति का एक प्रमुख हथियार बनाता है.
जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति को 'ऊर्जा नीति और संरक्षण अधिनियम' (EPCA) के तहत यह लगता है कि तेल बेचना जरूरी है, तब SPR के तेल को प्रतिस्पर्धी दरों पर बेचा जाता है. ऐतिहासिक रूप से, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अब तक चार बार SPR से आपातकालीन तेल जारी करने की अनुमति दी है.
भारत ने खुद का SPR बनाने का फैसला क्यों किया?
भारत में SPR बनाने का विचार 1991 के खाड़ी युद्ध के समय का है, जब इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो गई थी और कीमतों में भारी उछाल आया था. उस समय, भारत एक गंभीर 'भुगतान संतुलन' संकट का सामना कर रहा था और उसके पास केवल कुछ हफ्तों के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा भंडार बचा था. इस तेल संकट ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति भारत की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया था.
इस संकट ने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का बीज बो दिया, हालांकि इसे लागू करने में एक दशक से अधिक का समय लगा. एक औपचारिक SPR के प्रस्ताव को 2000 के दशक की शुरुआत में गति मिली. 1998 में, सरकार ने आपातकालीन तेल भंडार बनाने की संभावनाओं की जांच के लिए एक समिति गठित की. समिति ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा मानकों के अनुरूप कम से कम 90 दिनों के आयात के बराबर भंडारण बनाने की सिफारिश की थी.
2004 में, भारत सरकार ने औपचारिक रूप से SPR कार्यक्रम के पहले चरण के रूप में भूमिगत कच्चे तेल भंडारण सुविधाओं के निर्माण को मंजूरी दी. इस परियोजना को लागू करने के लिए, 2006 में इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) का गठन किया गया.
भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व कहां स्थित हैं?
भारत के रणनीतिक तेल भंडार (SPR) तीन स्थानों पर स्थित हैं. विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर (उडुपी के पास). ये रणनीतिक भंडार तेल कंपनियों के पास पहले से मौजूद कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के भंडार के अतिरिक्त हैं, जो आपूर्ति में किसी भी रुकावट के दौरान एक सुरक्षा कवच (cushion) के रूप में काम कर सकते हैं.
इन सुविधाओं के निर्माण का प्रबंधन ISPRL द्वारा किया जा रहा है, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन 'तेल उद्योग विकास बोर्ड' (OIDB) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है.
कच्चे तेल के ये भंडार जमीन के नीचे चट्टानी गुफाओं में बनाए गए हैं और भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर स्थित हैं. इन गुफाओं से कच्चे तेल की आपूर्ति भारतीय रिफाइनरियों को या तो पाइपलाइनों के माध्यम से या पाइपलाइन और समुद्री रास्तों के मेल से की जा सकती है. हाइड्रोकार्बन (जैसे कच्चा तेल) को स्टोर करने के लिए भूमिगत चट्टानी गुफाओं को सबसे सुरक्षित साधन माना जाता है.
भारत के SPR की क्षमता कितनी है?
अभी तक, भारत के SPR नेटवर्क की कुल स्थापित क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है. इसमें विशाखापत्तनम में 1.33 MMT, मंगलुरु में 1.50 MMT और पादुर में 2.50 MMT की क्षमता शामिल है. यदि केवल इन्हीं का उपयोग किया जाए, तो ये सुविधाएं सामूहिक रूप से भारत की कुल तेल खपत के लगभग 9 से 10 दिनों की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं.
आमतौर पर, इन रणनीतिक तेल भंडारों का उपयोग केवल आपूर्ति में बड़े संकट के दौरान ही किया जाता है और ये तेल रिफाइनरियों और कंपनियों द्वारा रखे जाने वाले वाणिज्यिक स्टॉक से अलग होते हैं. जब SPR क्षमता को रिफाइनरियों और फ्लोटिंग स्टोरेज (जहाजों पर भंडार) में रखे गए स्टॉक के साथ मिलाया जाता है, तो भारत का कुल तेल भंडार लगभग 74 दिनों की शुद्ध आयात आवश्यकता के बराबर अनुमानित है- जो ऊर्जा सुरक्षा का एक व्यापक पैमाना है और इसमें सभी उपलब्ध आपूर्तियां शामिल हैं.
दूसरे चरण के तहत विस्तार योजना
भू-राजनीतिक अस्थिरता से होने वाले खतरों और ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए, भारत सरकार ने SPR (रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व) की क्षमता को बड़े पैमाने पर बढ़ाने के लिए एक महत्वाकांक्षी 'दूसरे चरण' (Phase II) की विस्तार योजना शुरू की है. इस योजना के तहत, सरकार ने ओडिशा के चंडीखोल (4 MMT) में अतिरिक्त 'वाणिज्यिक-सह-रणनीतिक' तेल भंडार सुविधाओं के निर्माण और पादुर (2.5 MMT) सुविधा के विस्तार को मंजूरी दे दी है.
दूसरे चरण के तहत ये नए केंद्र मिलकर 6.5 MMT की अतिरिक्त क्षमता जोड़ेंगे. जब इसे वर्तमान की 5.33 MMT क्षमता के साथ मिलाया जाएगा, तो भारत की कुल SPR क्षमता बढ़कर लगभग 11.83 MMT कच्चा तेल हो जाएगी.
मिडल ईस्ट संकट भारत के SPR के महत्व को क्यों बढ़ाता है
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और एलएनजी की सप्लाई हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते होती है. यहां होने वाली छोटी सी रुकावट या खतरे की आशंका भी तेल की कीमतों में भारी उछाल ला सकती है. भारत इस रास्ते से रोजाना लगभग 26 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है, और यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा मतलब होगा- आपूर्ति में तत्काल कमी या कीमतों में भारी बढ़ोतरी.
ऐसी स्थिति में, अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) का उपयोग करके भारत अपनी रिफाइनरियों के कामकाज और घरेलू ईंधन की आपूर्ति को तब तक सुचारू रख सकता है, जब तक कि वैकल्पिक स्रोतों या रास्तों का इंतजाम न हो जाए. यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाले अल्पकालिक उछाल के असर को भी कम कर सकता है, जो अन्यथा भारत में महंगाई और आर्थिक दबाव का कारण बनता.
हालांकि भारत ने रूस और अमेरिका से आयात बढ़ाकर अपने तेल स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है और खाड़ी देशों पर निर्भरता कम की है, लेकिन इस बदलाव में समय लगता है और यह वैश्विक लॉजिस्टिक्स व कीमतों पर निर्भर करता है. जब तक लंबी अवधि की रणनीतियां काम करना शुरू करती हैं, ये रणनीतिक भंडार एक 'तत्काल स्टेबलाइजर' (स्थिरता लाने वाले) के रूप में कार्य करते हैं.
भारत के SPR अब केवल एक मामूली आपातकालीन बफर नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व वाले ऊर्जा सुरक्षा बुनियादी ढांचे के रूप में विकसित हो चुके हैं.
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