म्यांमार के विद्रोही गुट और सैन्य सरकार आएंगे एक साथ! आखिर, क्यों भारत कर रहा यह कूटनीतिक पहल?
नई दिल्ली म्यांमार में राष्ट्रीय सुलह को पूर्वोत्तर सीमा पर स्थिरता और दक्षिण-पूर्व एशिया तक रणनीतिक पहुंच बनाए रखने के लिए आवश्यक मानती है.


Published : June 2, 2026 at 5:38 PM IST
नई दिल्लीः म्यांमार के सैन्य नेतृत्व (सैन्य सरकार) और वहां के जातीय विद्रोही समूहों (एथनिक रेजिस्टेंस ग्रुप्स) को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की भारत की कोशिशें, उसकी उन बढ़ती चिंताओं को दर्शाती हैं कि पड़ोसी देश में लंबे समय से जारी अस्थिरता दक्षिण-पूर्व एशिया में नई दिल्ली की कनेक्टिविटी (सड़क और परिवहन संपर्क) की महत्वाकांक्षाओं को खतरे में डाल सकती है.
सोमवार को यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई द्विपक्षीय शिखर बैठक के बाद, विदेश सचिव विक्रम मिस्री की टिप्पणियों से यह साफ होता है कि भारत इस बात को स्वीकार कर चुका है कि 'कालादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' और 'भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग (ट्राइलेटरल हाईवे)' जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का भविष्य अब पूरी तरह से म्यांमार में एक व्यापक राजनीतिक समझौते से जुड़ चुका है.
Had a productive meeting with President U Min Aung Hlaing of Myanmar. We in India are honoured that he has chosen India for his first foreign visit as President. Equally gladdening is the fact that he began the visit from Bodh Gaya, with the blessings of Lord Buddha. We reviewed… pic.twitter.com/eL1sXgsrE6
— Narendra Modi (@narendramodi) June 1, 2026
म्यांमार के विरोधी राजनीतिक और जातीय हितधारकों के बीच बातचीत को आसान बनाने के भारत के प्रयासों का महत्व केवल कूटनीति तक ही सीमित नहीं है. जैसे-जैसे सैन्य जुंटा (सैन्य सरकार) और जातीय सशस्त्र संगठनों के बीच संघर्ष मुख्य परिवहन गलियारों को बाधित कर रहा है, नई दिल्ली म्यांमार में राष्ट्रीय सुलह को न केवल अरबों डॉलर की कनेक्टिविटी परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए बल्कि भारत की संवेदनशील पूर्वोत्तर सीमा पर स्थिरता सुनिश्चित करने और दक्षिण-पूर्व एशिया तक रणनीतिक पहुंच बनाए रखने के लिए भी आवश्यक मानती है.
द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के बाद एक विशेष मीडिया ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि पूर्वी पड़ोसी देश (म्यांमार) के सभी जातीय समूहों को एक ही मंच पर लाने और एक संयुक्त म्यांमार के भीतर आगे का रास्ता खोजने के प्रयास जारी हैं.
विदेश सचिव ने कहा, "अभी तक सभी हितधारकों के बीच कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है." उन्होंने आगे कहा, "और उन बिंदुओं के संदर्भ में जो प्रधानमंत्री उठा रहे थे कि म्यांमार जैसे-जैसे लोकतंत्र की ओर वापस लौटने का रास्ता तलाश रहा है, देश में एक स्थायी शांति की आवश्यकता है, सभी को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है, सभी हितधारकों को बातचीत की मेज पर लाने की आवश्यकता है और उन सभी मध्यस्थों के दृष्टिकोण की जांच करने की आवश्यकता है जो लंबे समय से इस प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं."

बैठक के बाद जारी एक अलग संयुक्त बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए भारत के समर्थन को दोहराया. बयान में कहा गया है, "दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के सुरक्षा हितों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों के लिए अपनी संप्रभु भूमि के दुरुपयोग को रोकने के महत्व पर जोर दिया. राष्ट्रपति ने म्यांमार के इस आश्वासन को दोहराया कि उसकी धरती का इस्तेमाल भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. प्रधानमंत्री ने पुष्टि की कि भारत, म्यांमार के एक दृढ़ और विश्वसनीय भागीदार के रूप में, दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को और गहरा करने के लिए प्रतिबद्ध है."
बयान में आगे कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में "शांति, स्थिरता, राष्ट्रीय सुलह और सामाजिक-आर्थिक विकास हासिल करने की दिशा में म्यांमार के नेतृत्व में किए जा रहे प्रयासों के लिए भारत के समर्थन" को व्यक्त किया. इसमें यह भी जोड़ा गया, "उन्होंने दोनों देशों के बीच आपसी सम्मान और मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर निरंतर सहायता और सहयोग की पेशकश भी की."
भारत को अब यह पूरी तरह महसूस होने लगा है कि उसके दीर्घकालिक सुरक्षा हितों, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और व्यापक इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) रणनीति की सफलता म्यांमार के सैन्य अधिकारियों और वहां के कई जातीय विद्रोही संगठनों के बीच आपसी राजनीतिक समझौते पर ही टिकी हुई है. यह उद्देश्य केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है. यह सीधे तौर पर भारत के पूर्वी पड़ोस में उसके रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों से जुड़ा हुआ है.
भारत की विदेश नीति में म्यांमार एक बेहद खास स्थान रखता है क्योंकि यह एकमात्र ऐसा दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश है जो भारत के साथ भूमि और समुद्री दोनों सीमाएं साझा करता है. यह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक भौगोलिक पुल का काम करता है. नतीजतन, भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) के तहत लगभग हर बड़ी जमीनी कनेक्टिविटी परियोजना म्यांमार से होकर ही गुजरती है.

म्यांमार में स्थिरता के बिना, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों से जोड़ने का सपना पूरा होना बेहद मुश्किल हो जाएगा. आज म्यांमार में भारत की दो सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी परियोजनाएं 'कालादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' और 'भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग (ट्राइलेटरल हाईवे)' हैं.
कालादान परियोजना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत को पूरी तरह से संकीर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन्स नेक) पर निर्भर रहे बिना अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है. यह परियोजना कोलकाता को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ती है, सितवे को कालादान नदी के माध्यम से अंतर्देशीय जलमार्ग द्वारा पलेटवा से जोड़ती है, और पलेटवा को सड़क नेटवर्क के जरिए मिजोरम से जोड़ती है.
भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग को मणिपुर के मोरे, म्यांमार के तमू और मांडले, तथा थाईलैंड के माई सोट को आपस में जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है. भविष्य में, इसके एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा बनने की उम्मीद है, जिसका विस्तार कंबोडिया, लाओस और वियतनाम तक होगा. साल 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से वहां जारी राजनीतिक अस्थिरता, उग्रवाद और मौजूदा गृहयुद्ध के कारण इन दोनों परियोजनाओं को बार-बार देरी का सामना करना पड़ा है.
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा, "इन परियोजनाओं पर कई सालों से काम चल रहा है, और ज्यादातर मामलों में इनमें देरी हुई है. निश्चित रूप से, इस समय दोनों परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी बाधा म्यांमार की सुरक्षा स्थिति है."
उन्होंने बताया कि कालादान हाईवे इस समय एक ऐसे इलाके में है जहां म्यांमार की सेना और रखाइन राज्य के जातीय विद्रोही संगठनों के बीच भीषण लड़ाई चल रही है. दूसरी तरफ, त्रिपक्षीय राजमार्ग (ट्राइलेटरल हाईवे) का वह हिस्सा जहां काम चल रहा था और हाल के वर्षों में रुक-रुक कर आगे बढ़ा है, वह भी एक ऐसे क्षेत्र में है जहां जातीय सशस्त्र समूह और पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज काफी सक्रिय हैं और म्यांमार सेना के साथ संघर्ष में उलझे हुए हैं.

मिस्री ने आगे कहा, "इसके बावजूद, हमने म्यांमार के अधिकारियों के साथ बातचीत जारी रखी है. जहां कहीं भी लड़ाई रुकने (शांति होने) के कारण काम आगे बढ़ाने की संभावना बनी है, या जहां कर्मचारियों और कामगारों की टीमों की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं था, वहां हम काम को आगे बढ़ाने में सफल रहे हैं."
दुनिया के कई देशों ने म्यांमार के साथ राजनयिक संबंध रखने से इनकार कर दिया है, क्योंकि उनकी नजर में वहां की नई सरकार दिखावे के चुनाव से बनी है और उसे वैधता हासिल नहीं है. इसके बावजूद, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने समझाया कि भारत ने अपने इस पूर्वी पड़ोसी देश के साथ बातचीत और संबंध क्यों जारी रखे हैं.
उन्होंने कहा, "इतिहास गवाह है कि संबंध तोड़ने या दूरी बनाने से कभी भी ऐसे नतीजे नहीं मिलते जो बातचीत और संबंध बनाए रखने से बेहतर हों. और इससे निश्चित रूप से कोई लोकतांत्रिक बदलाव भी नहीं आता है, जबकि हमारी दिलचस्पी लोकतांत्रिक बदलाव में ही है. दूसरी तरफ, संबंध तोड़ने से सिर्फ एक शून्य पैदा होता है, जिसे दूसरे देश हमारे नुकसान के लिए भरने आ जाते हैं. और मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि उन दूसरे देशों की लोकतंत्र में कोई दिलचस्पी नहीं है."
शिलांग स्थित थिंक टैंक 'एशियन कॉन्फ्लुएंस' के फेलो के. योम के अनुसार, म्यांमार के साथ भारत का जुड़ाव और विशेष रूप से नए राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग के मौजूदा नेतृत्व में यह संबंध कोई नई बात नहीं है.
योम ने ईटीवी भारत को बताया, "यह जुड़ाव कुछ ऐसे विदेश नीति के अनुमानों पर आधारित है कि सैन्य शासन के तहत वर्तमान व्यवस्था अपरिहार्य है. 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी', कनेक्टिविटी और निश्चित रूप से चीन का कारक - ये सभी चीजें कोई नई नहीं हैं." उन्होंने कहा कि सोमवार के शिखर सम्मेलन से उन्हें केवल एक ही नया पहलू दिखाई दिया, और वह था जातीय सशस्त्र संगठनों (एथनिक आर्म्ड ऑर्गनाइजेशन्स) को एक साझा मंच पर लाने का मुद्दा.
योम ने कहा, "म्यांमार में संघर्षरत पक्षों को साथ लाने के मामले में आप देखेंगे कि भारत अग्रिम मोर्चे पर नहीं रहा है. निश्चित रूप से आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) ने इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, हालांकि उसकी भूमिका को भी कई बाधाओं और अड़चनों का सामना करना पड़ा है. इस संघर्ष को सुलझाने के लिए बातचीत का रास्ता तलाशने वाला दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बाहरी देश चीन है."

उन्होंने बताया कि थाईलैंड ने भी जातीय सशस्त्र समूहों के बीच कुछ शांति वार्ताओं की पहल की थी. अपनी बात समझाते हुए उन्होंने कहा, "बैंकॉक ने म्यांमार के कुछ पड़ोसी देशों जैसे भारत, चीन, बांग्लादेश और लाओस को एक साथ लाने की कोशिश की थी. हालांकि, जब आसियान के सदस्यों ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो थाईलैंड ने इस प्रयास को बहुत आगे नहीं बढ़ाया."
योम के अनुसार, भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि शामिल सभी पक्षों को एक शांति वार्ता शुरू करनी चाहिए और म्यांमार के नेतृत्व तथा म्यांमार के स्वामित्व वाली पहल के दायरे में ही कोई समाधान तलाशना चाहिए.
के. योम ने कहा, "अगर सोमवार की चर्चा म्यांमार में संघर्ष का समाधान खोजने के लिए भारत की भूमिका को बढ़ाने के बारे में भी थी, तो मुझे लगता है कि यह कुछ नया है. अगर भारत म्यांमार में कुछ शांति पहलों की प्रक्रिया को शुरू करने के लिए एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए सहमत हुआ है, तो यह एक ऐसी बात है जिसके लिए हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि यह आगे कैसे विकसित होती है."
अगर पूरी बात को मिलाकर देखा जाए, तो म्यांमार के सैन्य नेतृत्व, जातीय सशस्त्र संगठनों और अन्य हितधारकों के बीच बातचीत को बढ़ावा देने के भारत के प्रयास किसी विचारधारा से ज्यादा ठोस रणनीतिक प्राथमिकताओं से प्रेरित हैं. 'कालादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट', 'भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग', पूर्वोत्तर में सीमा सुरक्षा, दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री पहुंच और व्यापक 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' की सफलता- यह सब कुछ पूरी तरह से एक स्थिर म्यांमार पर ही निर्भर करता है.
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