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चीन के बढ़ते प्रभुत्व के बीच मध्य एशिया में भारत की नई पहल, कितनी कामयाब हो पाएगी ?

मध्य एशिया को साधने की कोशिश में भारत. कनेक्टिविटी की बड़ी समस्या. भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन की घोषणा.

PM Modi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PIB)
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By Nirmala Ganapathy

Published : September 2, 2026 at 4:32 PM IST

6 Min Read
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नई दिल्ली : पांच साल के अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन को लेकर घोषणा की है. इसे अगले साल आयोजित किया जाना है. इस घोषणा के जरिए भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों की नई रुचि का भी पता चलता है. इससे पहले बैठक 2022 में हुई थी.

इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी का इरादा ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच मुफ्त व्यापार समझौते को लेकर काफी प्रगति हो चुकी है. इसमें आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और रूस शामिल हैं. लेकिन क्या यह राजनयिक गति गहरे आर्थिक संबंधों में तब्दील हो पाएगी, जबकि मध्य एशिया की कनेक्टिविटी परियोजनाएं यूक्रेन और ईरान संघर्ष के बीच फंसी हुई हैं, साथ ही इस क्षेत्र में चीन की गहरी उपस्थिति का मुकाबला करने की चुनौती भी है?

समस्या जानी-पहचानी है. भारत मध्य एशिया को अपने विस्तारित पड़ोस का हिस्सा मानता है, लेकिन उसकी वहां तक ​​सीधी पहुंच नहीं है.कनेक्टिविटी की कमीमध्य एशिया के साथ यह संबंध ऐसे समय में स्थापित किए जा रहे हैं जब भारत विभिन्न देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है.भारत के लिए मध्य एशियाई देशों (जिनमें कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं) का आकर्षण वाटर कार्बन भंडार, महत्वपूर्ण खनिजों और भारतीय वस्तुओं के लिए एक गंतव्य के रूप में निहित है.

इसी प्रकार, मध्य एशियाई देशों के लिए, भारत न केवल एक बढ़ता हुआ बाजार है, बल्कि इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपस्थिति रखने वाली प्रमुख शक्तियों चीन और रूस का तीसरा विकल्प भी है. फिर भी, गहरे संबंधों में सबसे बड़ी बाधा कनेक्टिविटी की कमी है.चीन और रूस के विपरीत, भारत किसी भी मध्य एशियाई देश के साथ भूमि सीमा साझा नहीं करता है, और एकमात्र भूमि मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरने के कारण दुर्गम है.

ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन ईरान संघर्ष से इसे बड़ा धक्का पहुंचा है. भारत को ईरान के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुंच मिल सकती थी, ईरान संघर्ष और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह ठप सा हो गया है.फिर भी, भारत भरोसा बनाए हुए है. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने सोमवार को कहा कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए "स्थायी समाधान खोजने के लिए प्रमुख हितधारकों के साथ बातचीत कर रहा है."इसी तरह, रूस, मध्य एशिया और ईरान को जोड़ने वाले रेलमार्गों, राजमार्गों और समुद्री मार्गों का नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा, ईरान और यूक्रेन संघर्षों के बीच धीमी गति से आगे बढ़ रहा है.

भौगोलिक बाधाओं और कनेक्टिविटी की कमी के बावजूद, व्यापारिक संबंध बढ़ रहे हैं. यह इन संबंधों में निहित संभावनाओं को रेखांकित करता है. भारत और पांच मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार 2025 में 2 अरब डॉलर से कम तक पहुंच गया, जो पिछले 15 वर्षों में 3.5 गुना वृद्धि दर्शाता है.

भारत मध्य एशियाई देशों से तेल, उर्वरक, कच्चा रेशम और तांबे की ट्यूब आयात करता है, जबकि विनिर्मित वस्तुएं, दवाएं और कृषि उत्पाद निर्यात करता है.दोनों देशों में आर्थिक संबंधों को गहरा करने की मंशा स्पष्ट है. पीएम मोदी की यात्रा के दौरान, उज्बेकिस्तान ने पर्यटन और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय नागरिकों के लिए 30 दिनों की वीजा-मुक्त व्यवस्था की घोषणा की.

दोनों देशों ने भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की और दुर्लभ खनिज सहयोग के अलावा, भारत को यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए एक रूपरेखा पर चर्चा की. यह चर्चा किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में हुई.

मोदी ने संप्रभुता पर जोर देते हुए आर्थिक संपर्क की वकालत की और ऊर्जा एवं व्यापार पर संघर्षों के वैश्विक प्रभावों को संबोधित किया.मोदी ने कहा, "भारत उन सभी प्रयासों का समर्थन करता है जो बाजारों को जोड़ते हैं, व्यापार को सुगम बनाते हैं और विकास के नए रास्ते खोलते हैं."

अब सवाल ये है कि क्या भारत चीन को कुछ अलग पेशकश कर सकता है ?सवाल यह है कि क्या भारत भौगोलिक और भू-राजनीतिक बाधाओं को पार करके उस क्षेत्र में अपनी रुचि को वास्तविक प्रभाव में बदल सकता है, जहां चीन की रुचि और प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा है.

मध्य एशिया के साथ चीन का व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक है और यह क्षेत्र बेल्ट एंड रोड पहल में एक महत्वपूर्ण पारगमन और ऊर्जा गलियारा है.चीन-ग्लोबल साउथ प्रोजेक्ट (एक स्वतंत्र, निष्पक्ष मल्टीमीडिया पहल) के अनुसार, चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तेल और गैस से हटकर विनिर्माण, सौर और पवन जैसी हरित ऊर्जा और कृषि प्रौद्योगिकी में विविधतापूर्ण हो गया है.

मध्य एशिया में चीनी निवेश 35 अरब डॉलर है, जो रूसी निवेश से भी अधिक है. दूसरी ओर, मध्य एशिया में भारत का कुल संचयी निवेश लगभग 1.5 अरब डॉलर होने का अनुमान है, जबकि भारत का व्यापार 2 अरब डॉलर से कम है.विश्लेषकों का मानना ​​है कि हालांकि भारत चीन से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता, फिर भी वह मध्य एशियाई देशों को चीन के बढ़ते प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए एक विकल्प प्रदान कर सकता है.

तिलोत्तमा फाउंडेशन के यूरेशिया और पश्चिम एशिया केंद्र की प्रमुख और यूरेशिया एवं पश्चिम एशिया विशेषज्ञ मीना सिंह रॉय ने कहा, “मध्य एशियाई देश चाहते हैं कि भारत और अधिक प्रयास करे और सहयोग की गति को बनाए रखे. सहयोग के भावी क्षेत्र हैं - डिजिटल अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बैंकिंग क्षेत्र, खेल, पर्यटन, खाद्य सुरक्षा, वस्त्र, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र.”

उन्होंने आगे कहा, “भारत और मध्य एशिया के बीच मजबूत राजनीतिक और रणनीतिक संबंधों में आर्थिक संबंध एक कमजोर कड़ी हैं.”उन्होंने सुझाव दिया कि भारत मध्य एशिया के लिए एक विशेष दूत नियुक्त कर सकता है.हालांकि भारत और मध्य एशियाई देशों की ओर से संबंधों को गहरा करने में राजनीतिक और रणनीतिक रुचि स्पष्ट है, लेकिन अंततः कनेक्टिविटी ही यह निर्धारित करेगी कि भारत इस क्षेत्र में कितना प्रभाव डाल सकता है.लेकिन कनेक्टिविटी परियोजनाओं के अभाव में भी, भारत सक्रिय रह सकता है और व्यापार को बढ़ावा देने के तरीके तलाशता रह सकता है.रॉय ने कहा, “हमें सहयोग की गति को बनाए रखना होगा. अगर हम 2027 में मध्य एशियाई शिखर सम्मेलन आयोजित करते हैं, तो हमें इसे 2028 में भी करना होगा.”

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