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भारत की मध्य एशियाई रणनीति: उज़्बेकिस्तान से रक्षा संबंधों को मजबूत करना क्यों है जरूरी?

चीन की बढ़ती मौजूदगी, अफगानिस्तान में सुरक्षा की चुनौतियां ने इस क्षेत्र को भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है.

India Uzbekistan Defence Ties
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार, 27 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए 'खेलो इंडिया डायलॉग' में शामिल हुए. (IANS/PMO)
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By Aroonim Bhuyan

Published : August 28, 2026 at 3:51 PM IST

11 Min Read
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नई दिल्ली: उज्बेकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग को मजबूत करने का भारत का प्रयास एक बड़ी भू-राजनीतिक सच्चाई को दिखाता है. अब मध्य एशिया को केवल रूस के प्रभाव वाला क्षेत्र नहीं माना जा सकता. चीन की बढ़ती मौजूदगी, अफगानिस्तान में सुरक्षा की चुनौतियां और संपर्क तथा रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की होड़ ने इस क्षेत्र को भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है.

इस स्थिति में, ताशकंद (उज्बेकिस्तान) के साथ करीबी सैन्य संबंध भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बना सकते हैं. यह एक ऐसे क्षेत्र में बेहद जरूरी है जहां भारत के हित तो बढ़ रहे हैं, लेकिन वहां तक सीधे पहुंचने के रास्ते सीमित हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 29-30 अगस्त की उज्बेकिस्तान यात्रा से पहले, गुरुवार को एक विशेष मीडिया ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने कहा कि भारत और उज्बेकिस्तान के बीच पहले से ही सैन्य संबंध हैं, जो पिछले कुछ समय से चल रहे हैं.

जॉर्ज ने कहा, "हमने 2019 में रक्षा पर एक संयुक्त कार्य समूह की संस्थागत व्यवस्था बनाई थी. इसके बाद, इस साल की शुरुआत में हुई बैठक में रक्षा उद्योग के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्तों की तलाश की गई." उन्होंने बताया कि भारत और उज्बेकिस्तान नियमित रूप से 'डस्टलिक' (DUSTLIK) नामक वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेते हैं, जिसका सातवां संस्करण इसी साल अप्रैल में उज्बेकिस्तान में आयोजित किया गया था.

उन्होंने आगे कहा, "दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भी काफी बातचीत हुई है, जिसमें उज्बेकिस्तान की डिफेंस इंडस्ट्री एजेंसी के एक प्रतिनिधिमंडल ने 2025 में 'एयरो-इंडिया' (AERO-India) में हिस्सा लिया था."

सचिव (पश्चिम) ने आगे बताया कि स्थापित किए गए संयुक्त कार्य समूह के तहत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी भारत और उज्बेकिस्तान के बीच मजबूत सहयोग है.

जॉर्ज ने कहा, "पिछले साल ताशकंद में संयुक्त कार्य समूह की नौवीं बैठक हुई थी. इसके अलावा भारत और उज्बेकिस्तान 'सेंट्रल एशिया फॉर्मेट' के तहत भी सहयोग करते हैं, जो क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों की समीक्षा करता है, आतंकवाद विरोधी अभियानों और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देता है, तथा 2022 में शुरू की गई बातचीत के सिलसिले को जारी रखता है. हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के स्तर पर भी बातचीत होती है. भारत-मध्य एशिया एनएसएस (NSS) और सुरक्षा परिषदों के सचिवों की तीसरी बैठक अक्टूबर 2025 में बिश्केक में हुई थी. इसलिए, हमारे रक्षा सहयोग में कई महत्वपूर्ण कड़ियां हैं, और इस यात्रा के दौरान हम इन सभी क्षेत्रों में अपने संबंधों को और मजबूत करने की उम्मीद करते हैं."

उज्बेकिस्तान मध्य एशिया के केंद्र में एक रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण स्थान पर है. इसकी सीमाएं अन्य चारों मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ अफगानिस्तान से भी मिलती हैं, जिससे इसका सुरक्षा माहौल अफगानिस्तान और पूरे यूरेशिया क्षेत्र के घटनाक्रमों से गहराई से जुड़ा हुआ है.

भारत के लिए उज्बेकिस्तान (ताशकंद) के साथ मजबूत सैन्य संबंध बनाना एक ऐसा रास्ता है, जिससे वह उस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है जो भारत की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है. मध्य एशिया एक ऐसा क्षेत्र है जहां रूस, चीन, ईरान, तुर्की और पश्चिमी देशों के रणनीतिक हित आपस में टकराते हैं.

आतंकवाद, उग्रवाद, ड्रग्स की तस्करी, सीमा सुरक्षा और अफगानिस्तान से पैदा होने वाली अस्थिरता जैसी चिंताओं के कारण भी यह क्षेत्र और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. यही वजह है कि आतंकवाद को रोकने और चरमपंथी नेटवर्कों को पैर पसारने से रोकने के मामले में भारत और उज्बेकिस्तान के विचार काफी मिलते-जुलते हैं. दोनों देशों का सैन्य अभ्यास 'डस्टलिक' (DUSTLIK) मुख्य रूप से गैर-कानूनी हथियारों से लैस गुटों के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने पर केंद्रित है, जो उनकी इस साझी सुरक्षा चिंता को दिखाता है.

अफगानिस्तान और उसके आसपास के सुरक्षा हालात दोनों देशों के लिए बेहद खास हैं. उज्बेकिस्तान की सीमा सीधे अफगानिस्तान से लगती है, जबकि भारत लंबे समय से इस क्षेत्र से या इसके जरिए काम करने वाले आतंकवाद और चरमपंथी नेटवर्कों को लेकर चिंतित रहा है.

नतीजतन, रक्षा सहयोग दोनों देशों के लिए अपने काम करने के अनुभव, खुफिया जानकारियों और आतंकवाद से निपटने के तरीकों को एक-दूसरे के साथ साझा करने का एक जरिया बनता है. विशेष सैन्य अभियानों, निगरानी, टोह लेने और संयुक्त योजना से जुड़े सैन्य अभ्यास दोनों पक्षों को ऐसी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार कर सकते हैं, जिनका सामना अकेले पारंपरिक सेना के दम पर करना मुश्किल होता है.

भारत के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ करीबी सुरक्षा संबंध बनाए रखने का एक फायदा यह भी है कि इससे उसे अफगानिस्तान के ताजा हालातों और भारत की सुरक्षा पर उनके पड़ने वाले असर को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है.

भारत और उज्बेकिस्तान के बीच बढ़ते संबंधों को केवल किसी तीसरे देश (जैसे चीन या रूस) का मुकाबला करने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. नई दिल्ली और ताशकंद, दोनों ही रूस और चीन के साथ अपने संबंध बनाए रखते हैं और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखने में गहरी रुचि रखते हैं.

इसके बावजूद, मध्य एशिया को लेकर चल रही भू-राजनीतिक होड़ उज्बेकिस्तान के साथ भारत के बढ़ते संबंधों को रणनीतिक रूप से बहुत कीमती बनाती है.

चीन ने पूरे मध्य एशिया में अपने आर्थिक, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा से जुड़े प्रभाव को बढ़ाया है, जबकि रूस ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र का एक प्रभावशाली सैन्य और राजनीतिक खिलाड़ी बना हुआ है. दूसरी ओर, उज्बेकिस्तान ने एक 'बहु-आयामी विदेश नीति' अपनाई है, जिसका मकसद इन बड़ी शक्तियों के बीच खुद को स्वतंत्र रूप से फैसले लेने के काबिल बनाए रखना है.

भारत का नजरिया इस माहौल में बिल्कुल सही बैठता है. कोई औपचारिक गठबंधन बनाने के बजाय, नई दिल्ली उज्बेकिस्तान की रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करते हुए उसके साथ द्विपक्षीय सैन्य और सुरक्षा साझेदारी को मजबूत कर सकती है.

यह मध्य एशिया के प्रति भारत के बड़े नजरिए के अनुकूल है: किसी एक बाहरी ताकत को इस पूरे क्षेत्र पर कब्जा करने देने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ कई साझेदारियां खड़ी करना. रक्षा सहयोग का एक बड़ा भू-राजनीतिक पहलू भी है, क्योंकि भूगोल के कारण मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच सीमित है.

पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ने पारंपरिक रूप से मध्य एशिया के साथ भारत के जमीनी जुड़ाव को मुश्किल बनाया है. यही वजह है कि वैकल्पिक राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध विकसित करने के लिए उज्बेकिस्तान जैसे देशों के साथ रिश्ते बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

इस संदर्भ में, कनेक्टिविटी का बड़ा एजेंडा- जिसमें ईरान और चाबहार बंदरगाह मार्ग के साथ भारत का जुड़ाव शामिल है और अधिक रणनीतिक महत्व हासिल कर लेता है. भारत और उज्बेकिस्तान के बीच मजबूत रिश्ते मध्य एशिया के साथ अधिक भरोसेमंद संपर्क स्थापित करने के भारत के प्रयासों को पूरा कर सकते हैं, साथ ही प्रतिद्वंद्वी क्षेत्रीय ताकतों के नियंत्रण या प्रभाव वाले रास्तों पर निर्भरता को कम कर सकते हैं.

इसलिए, सैन्य कूटनीति आर्थिक और संपर्क से जुड़ी कूटनीति को और मजबूत कर सकती है. इसके अलावा, करीबी सैन्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू भी है.

भारत लगातार अपने रक्षा निर्यात को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और खुद को सैन्य उपकरणों, प्लेटफॉर्मों तथा तकनीकों के सप्लायर के रूप में स्थापित करना चाहता है. उज्बेकिस्तान को अपनी सेना के आधुनिकीकरण की जरूरत है, ऐसे में वह भारत के लिए एक संभावित बाजार होने के साथ-साथ औद्योगिक सहयोग का साझीदार भी बन सकता है.

दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच मौजूदा बातचीत इसका एक मजबूत आधार तैयार करती है. बेंगलुरु में रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित द्विवार्षिक एयर शो और विमानन प्रदर्शनी 'एयरो इंडिया 2025' में उज्बेकिस्तान की भागीदारी ने भारत की बढ़ती रक्षा-औद्योगिक क्षमताओं में उसकी दिलचस्पी को दिखाया था.

प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा का समय भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1 सितंबर को किर्गिस्तान में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के ठीक पहले हो रही है. भारत और उज्बेकिस्तान दोनों ही इस संगठन के सदस्य हैं, जो मध्य एशिया के सुरक्षा मुद्दों को एक बड़े बहुपक्षीय मंच का हिस्सा बनाता है.

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) भारत को एक ऐसा मंच देता है जहां वह आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर मध्य एशियाई देशों, रूस और चीन के साथ एक साथ बातचीत कर सकता है. नतीजतन, उज्बेकिस्तान के साथ द्विपक्षीय सैन्य संबंधों को गहरा करने से एससीओ के भीतर किसी एक क्षेत्रीय रिश्ते पर बहुत ज्यादा निर्भर हुए बिना, भारत को अपने सुरक्षा हितों को आगे बढ़ाने की ताकत मिल सकती है.

उदयपुर स्थित 'उषानास फाउंडेशन' थिंक टैंक की रिसर्च एसोसिएट रुचिका शर्मा के अनुसार, भारत और उज्बेकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग उनके द्विपक्षीय संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है.

रुचिका शर्मा ने ईटीवी भारत से कहा, "भारत के लिए उज्बेकिस्तान मध्य एशिया का एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है. साथ ही वह क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में, विशेष रूप से अफगानिस्तान और पाकिस्तान से पैदा होने वाले सुरक्षा खतरों, जिसमें 'इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान' की मौजूदगी शामिल है, से निपटने में एक बड़ा मददगार है. इस साल अप्रैल में आयोजित 'डस्टलिक' संयुक्त सैन्य अभ्यास का सातवां संस्करण दोनों देशों की आपसी तालमेल और आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को बेहतर बनाने पर केंद्रित था. यह साफ दिखाता है कि भारत खुद को क्षमता निर्माण के एक मजबूत साथी के रूप में स्थापित कर रहा है."

उन्होंने कहा कि इस रक्षा सहयोग से उज्बेकिस्तान को भारत की बढ़ती रक्षा-औद्योगिक क्षमताओं का लाभ उठाने का मौका मिलेगा. शर्मा ने आगे कहा, "यह सहयोग एक ऐसे माध्यम के रूप में काम करेगा जिसके जरिए भारत रणनीतिक भरोसा बना सकता है और मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी को और मजबूत कर सकता है."

संक्षेप में कहें तो, भारत-उज्बेकिस्तान रक्षा सहयोग के अगले चरण का आकलन इस बात से होगा कि क्या यह रिश्ता नियमित अभ्यासों और औपचारिक बातचीत से आगे बढ़कर अधिक गहरे व्यावहारिक, तकनीकी और औद्योगिक सहयोग में बदल पाता है या नहीं. इसके लिए तीन क्षेत्र विशेष रूप से भरोसेमंद दिखाई देते हैं: आतंकवाद का मुकाबला और खुफिया जानकारी साझा करना, रक्षा-औद्योगिक साझेदारी, तथा सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल.

'डस्टलिक' (DUSTLIK) के सात संस्करणों का सफल आयोजन यह दिखाता है कि दोनों देशों के बीच पहले से ही एक मजबूत सैन्य संबंध मौजूद है. अब चुनौती इस बात की है कि इस बने हुए भरोसे को बड़े रणनीतिक फायदों और क्षमताओं में कैसे बदला जाए.

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