'भारत में प्रतिभा की कमी नहीं, पर उस अनुपात में नहीं मिलती है व्यावसायिक सफलता', क्या है इसकी वजह ?
भारत में वर्ल्ड क्लास कंपनियों की कमी है. इकोसिस्टम अभी उतना मजबूत नहीं है.

Published : August 10, 2026 at 1:33 PM IST
पिछले सप्ताह कोलंबिया से लौटे पांच भारतीय किशोर अपने साथ मेडल से भी अधिक कीमती चीज लेकर आए. वे भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय संपत्ति—यानी यहां की प्रतिभा—की एक मिसाल लेकर आए. 5 से 12 जुलाई तक आयोजित 56वें इंटरनेशनल फिजिक्स ओलंपियाड में, भारत की पांच सदस्यीय टीम ने पांच गोल्ड मेडल जीते. इस जीत के साथ भारत चीन, रूस, दक्षिण कोरिया, कजाकिस्तान और ताइवान जैसे वैज्ञानिक रूप से शक्तिशाली देशों के साथ संयुक्त रूप से शीर्ष स्थान पर रहा.
यह उपलब्धि असाधारण थी. 85 से अधिक देशों के 381 सबसे होनहार स्कूली छात्रों के साथ मुकाबला करते हुए, भारतीय टीम ने पांच-पांच घंटे की दो कठिन परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन किया. इन परीक्षाओं में किताबी ज्ञान के बजाय मौलिक सोच की जरूरत थी.यह सफलता अचानक नहीं मिली है. यह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के तहत होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन की लगभग तीन दशकों की धैर्यपूर्ण मेहनत का नतीजा है.
पहचान, मार्गदर्शन और वैज्ञानिक प्रशिक्षण की एक कठिन प्रक्रिया के जरिए, भारत ने लगातार विश्व-स्तरीय युवा वैज्ञानिक तैयार किए हैं. पिछले एक दशक में, फिजिक्स ओलंपियाड में भाग लेने वाला हर भारतीय प्रतिभागी मेडल जीतकर लौटा है, और उनमें से लगभग दो-तिहाई गोल्ड मेडल विजेता रहे हैं.फिर भी, इस शानदार सफलता के पीछे एक चिंताजनक आंकड़ा छिपा है.
एचबीसीएसई के अनुसार, भारत के ओलंपियाड मेडल विजेताओं में से लगभग 64 प्रतिशत डॉक्टरेट रिसर्च करते हैं, लेकिन उनमें से केवल 32 प्रतिशत ही अंततः भारत में रहते हैं. देश ने प्रतिभा की खोज करने की कला में तो महारत हासिल कर ली है, लेकिन उसे अपने यहां बनाए रखने में उतनी सफलता नहीं मिली है.यह विरोधाभास केवल साइंस ओलंपियाड तक ही सीमित नहीं है. यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या भारत अपनी अपार बौद्धिक संपदा को विश्व-स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्यमों में बदल सकता है ?
प्रतिभा का अर्थ बुद्धिमत्ता से कहीं अधिक है. प्रतिभा को अक्सर अकादमिक उत्कृष्टता के समान माना जाता है. वास्तव में, यह इससे कहीं अधिक व्यापक है. प्रतिभा अवलोकन करने, प्रश्न पूछने, नवाचार करने और समस्याओं को हल करने की क्षमता है. यह ज्ञान को रचनात्मकता, जिज्ञासा को अनुशासन और कल्पना को दृढ़ता के साथ जोड़ती है.हालांकि, प्रतिभा अपने आप में न तो रोजगार सृजित करती है और न ही समृद्धि. इसका आर्थिक मूल्य तभी प्राप्त होता है जब विचारों को उत्पादों, प्रौद्योगिकियों और व्यवसायों में परिवर्तित किया जाता है.
🇮🇳 India Tops the World at the 56th International Physics Olympiad 2026!
— DAE India (@DAEIndia) July 12, 2026
🥇🥇🥇🥇🥇India's young physicists deliver an extraordinary performance at #IPhO2026 in Colombia. All five members of the Indian team win Gold Medals. 1/3@PMOIndia @DrJitendraSingh @HBCSE_TIFR @TIFRScience pic.twitter.com/OP8IWRXHhG
कंप्यूटर और जैव प्रौद्योगिकी से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, प्रत्येक प्रमुख तकनीकी क्रांति की शुरुआत किसी के मन में एक विचार के रूप में हुई थी, जिसके बाद यह एक व्यावसायिक उद्यम बन गई.इसलिए, किसी राष्ट्र की सफलता का सच्चा मापदंड केवल उसके द्वारा उत्पादित प्रतिभाशाली छात्रों की संख्या नहीं है, बल्कि उसके द्वारा सक्षम किए गए नवोन्मेषकों और उद्यमियों की संख्या है.
विचारों से स्टार्टअप तकउद्यमिता के माध्यम से नवाचार समाज तक पहुंचता है. स्टार्टअप अनुसंधान को उत्पादों में परिवर्तित करते हैं, निवेश आकर्षित करते हैं, रोजगार सृजित करते हैं और उत्पादकता में सुधार करते हैं.एक स्टार्टअप तब यूनिकॉर्न बन जाता है जब वह निजी स्वामित्व में रहते हुए एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का मूल्यांकन प्राप्त कर लेता है. यूनिकॉर्न नवाचार की व्यावसायिक सफलता और किसी देश के उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती का संकेत देते हैं. आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने वाले देश ही यूनिकॉर्न के अग्रणी निर्माता भी हैं.
भारत का स्टार्टअप युग - भारत, अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बनकर उभरा है. 100 से अधिक भारतीय स्टार्टअप एक अरब डॉलर का मूल्य पार कर चुके हैं, जो डिजिटल उद्यमिता की तीव्र वृद्धि को दर्शाता है. स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी सरकारी पहल, आधार और यूपीआई का विस्तार, बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी-प्रेमी युवा आबादी ने नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है.
आज भारतीय स्टार्टअप वित्तीय प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लॉजिस्टिक्स, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जो लाखों ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करते हुए उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित कर रहे हैं.
स्वदेशी यूनिकॉर्न भारत की क्षमता को दर्शाते हैंकई भारतीय कंपनियां यह साबित करती हैं कि स्थानीय प्रतिभाएं वैश्विक स्तर के व्यवसाय स्थापित कर सकती हैं. फिनटेक क्षेत्र में, नितिन और निखिल कामथ द्वारा स्थापित जेरोधा ने कम लागत वाली ब्रोकरेज के माध्यम से खुदरा निवेश में क्रांति ला दी है, जबकि यह काफी हद तक स्व-वित्तपोषित रही है. पाइन लैब्स मर्चेंट कॉमर्स और डिजिटल भुगतान में अग्रणी बन गई है. फाल्गुनी नायर द्वारा स्थापित नायका ने तकनीक और एक ओमनीचैनल बिजनेस मॉडल के माध्यम से भारत के सौंदर्य प्रसाधन खुदरा उद्योग में क्रांति ला दी.
इसी तरह, लेंसकार्ट ने चश्मे के बाजार को बदल दिया. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में, बेंगलुरु स्थित सर्वम एआई भारत की पहली प्रमुख जेन एआई यूनिकॉर्न कंपनी के रूप में उभरी है, जो भारतीय भाषाओं के लिए अनुकूलित स्वतंत्र भाषा मॉडल और वाक् तकनीक विकसित कर रही है. स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में नवाचार का प्रतिनिधित्व इनोवेसर जैसी कंपनियां करती हैं, जो स्वास्थ्य सेवा वितरण में सुधार के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत डेटा विश्लेषण का उपयोग करती हैं. ये कंपनियां दर्शाती हैं कि भारतीय उद्यमी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्यम बनाते हुए स्थानीय चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान कर सकते हैं.
विदेशों में भारतीय प्रतिभा का और भी अधिक दक्ष प्रदर्शन - विडम्बना यह है कि भारत की उद्यमशीलता की सफलता की कहानी देश की सीमाओं के बाहर और भी अधिक प्रभावशाली हो जाती है. भारतीय मूल के उद्यमियों ने विदेशों में 150 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां स्थापित की हैं, जिनमें अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में 96 अरब डॉलर के स्टार्टअप शामिल हैं, जो इजराइल, चीन या यूनाइटेड किंगडम के संस्थापकों की तुलना में कहीं अधिक हैं. इनमें आईआईटी मद्रास के स्नातक अरविंद श्रीनिवास द्वारा सह-स्थापित Perplexity AI भी शामिल है, जो अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनियों में से एक है. 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य वाली Databricks, AI और क्लाउड डेटा एनालिटिक्स में वैश्विक अग्रणी बन गई है. अरविंद जैन द्वारा स्थापित Glean ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके उद्यम खोज को बदल दिया है. Mercor तेजी से एक प्रमुख AI-संचालित भर्ती मंच के रूप में उभरी है. कुल मिलाकर, भारतीय उद्यमियों ने विश्व स्तर पर 200 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियों की स्थापना की है. विडंबना यह है कि उन्होंने भारत की तुलना में विदेशों में अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां स्थापित की हैं. इससे भारत प्रवासी यूनिकॉर्न संस्थापकों का विश्व का सबसे बड़ा स्रोत बन जाता है.
प्रतिभा देश छोड़कर क्यों जाती है -अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका सालाना 240 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक वेंचर कैपिटल में निवेश करता है, जबकि भारत में यह लगभग 7-8 अरब अमेरिकी डॉलर है. जोखिम पूंजी के विशाल भंडार उद्यमियों को महत्वाकांक्षी विचारों को तेजी से आगे बढ़ाने में सक्षम बनाते हैं.स्टैनफोर्ड और एमआईटी जैसे विश्व-प्रमुख विश्वविद्यालय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर काम करते हैं, जहां शोधकर्ता, निवेशक, सलाहकार और उद्योग जगत के नेता सहज रूप से संवाद करते हैं. नियम आमतौर पर अधिक पूर्वानुमानित होते हैं, बौद्धिक संपदा संरक्षण मजबूत होता है, स्टॉक-विकल्प नीतियां अधिक अनुकूल होती हैं और वैश्विक बाजारों तक पहुंच आसान होती है.चीन एक और शिक्षाप्रद तुलना प्रस्तुत करता है. हालांकि यूनिकॉर्न निर्माण में यह संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है, चीनी यूनिकॉर्न कंपनियों की महत्ता चीन के भीतर ही रहती है. देश ने अपनी प्रतिभा को सफलतापूर्वक बनाए रखा है और उसका व्यवसायीकरण किया है. इसके विपरीत, भारत अपने प्रतिभाशाली नवोन्मेषकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निर्यात करना जारी रखता है.
मिसिंग कड़ी - कमी तो है और इसे स्वीकार भी करना होगा. यह हर साल लाखों इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी पेशेवर तैयार करता है. भारतीय मूल के सीईओ दुनिया की कई सबसे बड़ी कंपनियों का नेतृत्व करते हैं. भारतीय शोधकर्ता अत्याधुनिक वैज्ञानिक खोजों में योगदान देते हैं. भारतीय उद्यमी विभिन्न महाद्वीपों में अरबों डॉलर की कंपनियां खड़ी कर रहे हैं.कमजोरी कहीं और है.
भारत प्रतिभा पैदा करने में असाधारण रूप से कुशल हो गया है. यह अभी भी प्रतिभा का व्यवसायीकरण करना सीख रहा है. एक शानदार प्रयोगशाला विचार और एक सफल कंपनी के बीच का अंतर भारत में दुनिया की अग्रणी नवाचार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक है.सुधारों की अगली पीढ़ीस्टार्ट-अप इंडिया, अटल इनोवेशन मिशन, जैव प्रौद्योगिकी इनक्यूबेटर और डिजिटल इंडिया जैसी सरकारी पहलों ने उद्यमशीलता के माहौल में उल्लेखनीय सुधार किया है.
अगले चरण में निम्नलिखित दिशाओं में गहन परिवर्तन की आवश्यकता है:विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और क्वांटम प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास में सार्वजनिक और निजी निवेश में पर्याप्त वृद्धि करना.अधिक से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों को नवाचार और उद्यमशीलता के केंद्र बनना चाहिए. शिक्षकों और छात्रों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालयों, इनक्यूबेटरों और स्टार्टअप अनुदानों के माध्यम से अनुसंधान के व्यावसायीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. घरेलू उद्यम पूंजी का एक बड़ा स्रोत तैयार करें और गहन प्रौद्योगिकी स्टार्टअप को वित्त पोषित करें.सरलीकृत नियामक प्रक्रियाओं से उद्यमियों को अनुमोदन प्राप्त करने में लगने वाले समय के बजाय नवाचार पर अधिक समय देने में मदद मिलनी चाहिए. पेटेंटों की प्रक्रिया तेज होनी चाहिए, बौद्धिक संपदा अधिकारों को मजबूत किया जाना चाहिए और प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग को आसान बनाया जाना चाहिए.अंत में, भारत को अपने वैश्विक प्रवासी भारतीयों का सक्रिय रूप से लाभ उठाना चाहिए. सफल भारतीय मूल के उद्यमी मार्गदर्शक, निवेशक और सहयोगी बन सकते हैं, जिससे भारत के भीतर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्यमों के निर्माण में मदद मिलेगी.
भारत को जिस असली सोने की जरूरत है, उस पर ध्यान देना आवश्यक है. हमारे लिए भौतिकी ओलंपियाड में मिले पांच स्वर्ण पदक जश्न मनाने लायक हैं. ये इस बात का प्रमाण हैं कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर भारतीय बच्चे विश्व के सर्वश्रेष्ठ छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.
देश पहले ही विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम और आप्रवासी यूनिकॉर्न संस्थापकों का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है. अगला राष्ट्रीय लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि भारतीय प्रतिभा न केवल वैश्विक प्रतियोगिताओं में जीत हासिल करे, बल्कि देश में ही वैश्विक स्तर पर मूल्यवान उद्यमों का निर्माण भी करे.
प्रतिभा भारत का सबसे समृद्ध प्राकृतिक संसाधन है. फिर भी, केवल प्रतिभा से समृद्धि नहीं आती. इसे विश्व स्तरीय अनुसंधान, प्रचुर जोखिम पूंजी, दूरदर्शी सार्वजनिक नीति और नवाचार को पुरस्कृत करने वाली संस्थाओं का समर्थन प्राप्त होना चाहिए.इक्कीसवीं सदी में प्रभुत्व स्थापित करने वाले देश केवल प्रतिभाशाली दिमागों को शिक्षित नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें परिवर्तनकारी उद्यमों का निर्माण करने के लिए सशक्त बनाएंगे.भारत पहले ही यह साबित कर चुका है कि वह विश्व स्तरीय प्रतिभा का उत्पादन कर सकता है. अगली परीक्षा यह है कि क्या वह उस प्रतिभा को विश्व स्तरीय कंपनियों में परिवर्तित कर सकता है. ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतना एक उपलब्धि है. अगली पीढ़ी के वैश्विक यूनिकॉर्न बनाने की दौड़ जीतना कहीं अधिक बड़ी राष्ट्रीय विजय होगी.
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