पाकिस्तान में बलूचों के विद्रोह से क्यों घबराए चीन-अमेरिका? क्या खतरे में है बलूचिस्तान में दोनों की मौजूदगी
बलूच अपने हक और अलग राज्य की मांग के लिए 1948 से संघर्ष कर रहे, 2003 से इसमें आई तेजी ने दुनिया का ध्यान खींचा.

Published : February 5, 2026 at 5:09 PM IST
|Updated : February 6, 2026 at 9:20 AM IST
हैदराबाद: इन दिनों पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य बलूचिस्तान सुलग रहा है. दरअसल, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने हेरोफ 2.0 यानी काला तूफान नाम से ऑपरेशन शुरू करते हुए ग्वादर से लेकर पसनी और पाकिस्तान-ईरान सीमा पर स्थित जगहों को निशाना बनाया है. ये हमले कोई पहली बार नहीं हुए हैं, बल्कि बलूच अपने हक के लिए 1948 से लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं.
पाकिस्तान के इस ताजा अंदरूनी संघर्ष का पूरी दुनिया पर असर देखने को मिल रहा है. खासकर चीन और अमेरिका के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगी हैं. ETV Bharat की खास रिपोर्ट में पढ़िए, बलूचों के विद्रोह की वजह क्या है? बलूचों के विद्रोह से अमेरिका-चीन क्यों घबराए हुए हैं? दुनिया के ताकतवर देशों की बलूचिस्तान में दिलचस्पी क्यों है?

पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत, पर आबादी नाम मात्र की: बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत (पाकिस्तान का 44% हिस्सा) है लेकिन, यहां आबादी सबसे कम है. 2023 की जनगणना के अनुसार, बलूचिस्तान की आबादी लगभग 19.26 मिलियन (1 करोड़ 92 लाख 60 हजार) है, जो पाकिस्तान की कुल आबादी 241.49 मिलियन (24 करोड़, 14 लाख, 90 हजार) का 8% है. जमीन के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत होने के बावजूद यह सबसे कम आबादी वाला प्रांत है, जिसकी 2017 और 2023 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर 56% रही है.
बलूचिस्तान, 3 देशों के बीच बंटा है: बलूचिस्तान ऐसा क्षेत्र है जिसकी एक अलग सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है, जो तीन देशों, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान के बीच बंटा हुआ है. इस क्षेत्र का नाम बलूच जनजाति के नाम पर पड़ा है, जो सदियों पहले यहां बस गए थे. इसका सबसे बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान में है. लेकिन, इसका सूखा, रेगिस्तानी इलाका इसे देश का सबसे कम आबादी वाला और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्र बनाता है.

बलूच क्यों कर रहे विद्रोह: बलूच लोगों का मानना है कि बलूचिस्तान में खनिज संसाधनों का भंडार होने के बाद भी यहां के लोग गरीब हैं. बलूच लिबरेशन आर्मी का पाकिस्तान सरकार पर आरोप है कि यहां से खनिज निकालकर बेचे जा रहे हैं. इससे देश को भरपूर आमदनी हो रही है. लेकिन, इसका फायदा बलूचिस्तान के लोगों को नहीं मिल रहा है.
यही नहीं बलूचिस्तान में करीब 2280 मेगावाट बिजली बनाती है. लेकिन, उसे सिर्फ 700-800 मेगावाट मिलती है. प्रांत में 56% लोग बिजली के बिना रहते हैं. इसके अलावा पाकिस्तान में इस्तेमाल होने वाली गैस का 17% हिस्सा बलूचिस्तान से आता है लेकिन, खुद इसका केवल 7% ही इस्तेमाल कर पाता है. यही कारण है कि बलूचों का विद्रोह लगातार बढ़ता जा रहा है.
बलूचिस्तान की जमीन के नीचे दबा है खजाना: बलूचिस्तान में विशाल पहाड़ और खूबसूरत समुद्र तट हैं, जिनके नीचे प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है. यहां कोयला, सल्फर, क्रोमाइट, लौह अयस्क, बैराइट, संगमरमर, क्वार्टजाइट और चूना पत्थर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. बलूचिस्तान में तेल के बड़े भंडार हैं. दुनिया में तांबे और सोने की सबसे ज्यादा मात्रा यहीं है. बलूचिस्तान के पास 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (7.65 लाख करोड़ रुपए) के खनिज भंडार हैं. यही कारण है कि बलूचिस्तान में चल रहे संघर्ष ने अमेरिका और चीन की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि, दुनिया के दोनों सबसे ताकतवर देशों ने यहां भारी निवेश किया हुआ है.

BLA के हमले से चीन क्यों परेशान: बलूचिस्तान में BLA के हालिया हमलों से चीन की चिंता बढ़ गई है. इसका कारण पाकिस्तान में उसके अरबों डॉलर के निवेश और वहां काम कर रहे चीनी लोगों की सुरक्षा को खतरा है. बलूच विद्रोहियों के ग्वादर बंदरगाह और अन्य ढांचागत परियोजनाओं को निशाना बनाने से चीन के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचने की आशंका है. यही कारण है कि चीन इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और स्थिरता बनाए रखने के लिए समर्थन दे रहा है.
चीन का बलूचिस्तान में निवेश: दरअसल, चीन ने 2015 में पाकिस्तान में 46 बिलियन डॉलर (3.81 लाख करोड़ रुपए) की एक आर्थिक परियोजना की घोषणा की थी, जिसका बलूचिस्तान एक अहम हिस्सा है. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के जरिए बीजिंग अमेरिका और भारत के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान और साउथ एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है. CPEC पाकिस्तान के दक्षिणी ग्वादर बंदरगाह (कराची से 626 किलोमीटर) को अरब सागर में बलूचिस्तान से चीन के पश्चिमी शिनजियांग क्षेत्र से जोड़ेगा.

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चीन का बलूचिस्तान से महत्वपूर्ण खनिज निकालने का समझौता: ग्वादर बंदरगाह CPEC का मुख्य प्रोजेक्ट है. क्योंकि इससे बीजिंग को मलक्का जलडमरूमध्य को बाइपास करके सीधे अरब सागर तक पहुंचने में मदद मिलेगी. CPEC के तहत, चीनी कंपनियों ने बलूचिस्तान से महत्वपूर्ण खनिज निकालने के लिए समझौते किए हैं, जिसमें सैंदक कॉपर-गोल्ड खदान और लेड-जिंक खदान प्रोजेक्ट शामिल हैं.
बलूचों के हमले से अमेरिका क्यों परेशान: बलूचिस्तान में BLA के हालिया हमलों से अमेरिका भी चिंतित है. क्योंकि, बलूचिस्तान में अमेरिका की अरबों डॉलर की माइनिंग परियोजनाएं जैसे रेको दिक खतरे में हैं. रेको दिक दुनिया के सबसे बड़े अविकसित तांबा और सोने के भंडारों में से एक है. इसके अतिरिक्त, ये हमले CPEC को बाधित कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र में स्थिरता और अमेरिका के रणनीतिक हित प्रभावित हो रहे हैं. हमले, अमेरिकी निवेश के लिए एक बड़ा जोखिम साबित हो सकते हैं.

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अमेरिका का बलूचिस्तान में निवेश: सितंबर 2025 में, अमेरिकी कंपनी US स्ट्रेटेजिक मेटल्स और पाकिस्तान सरकार के बीच एक MoU हुआ था. इसके जरिए अमेरिका ने बलूचिस्तान में अपनी भागीदारी बढ़ा दी. इस समझौते से मिनरल्स सेक्टर में अमेरिका 500 मिलियन डॉलर (4100 करोड़ रुपए) का निवेश करेगा. पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर मिनरल्स की पहली खेप अक्टूबर 2025 में अमेरिका भेजी गई. US के ऑपरेशन्स को और आसान बनाने के लिए पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में पसनी बंदरगाह को डेवलप करने का प्रस्ताव दिया है, जो मिनरल्स के एक्सपोर्ट के लिए खास चैनल दे सकता है.
बलूचिस्तान पर क्या है भारत का रुख: 15 अगस्त 2016 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया था. उन्होंने बलूचिस्तान, गिलगित और बाल्टिस्तान के स्वतंत्रता संग्राम और पाकिस्तान के इन प्रांतों में मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का जिक्र किया था. इसके जरिए पीएम मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान पर बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (POK) में अत्याचारों और अराजकता के लिए अंगुली उठाई थी.

भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की अंदरूनी समस्याओं और प्रांतों में चल रहे प्रतिरोध आंदोलन को उजागर किया. भारत ने बलूचिस्तान हमलों को भारत से जोड़ने वाले पाकिस्तान के दावों को भी खारिज किया है.
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कब शुरू हुआ बलूचों का विद्रोह: बलूचिस्तान का पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध का लंबा इतिहास रहा है. बलूच लोगों के लिए एक आजाद राज्य की मांग करने वाले ग्रुपों का विद्रोह 1948 में शुरू हुआ, जो 1950, 1960, 1970 में फिर से उभरे. 2003 के बाद ये काफी बढ़ गया. इस संघर्ष की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप के बंटवारे के बाद के दौर में हैं. खासकर मार्च 1948 में कलात रियासत के पाकिस्तान में विलय के साथ.

प्रिंस अब्दुल करीम ने आजादी की पहली बलूच लड़ाई शुरू की: जुलाई 1948 तक खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने पहली लड़ाई शुरू की. जो 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-1977 में लड़ी गईं और वर्तमान में 2003 से जारी हैं. जिसे 2005 में सुई में एक आर्मी ऑफिसर द्वारा कथित तौर पर महिला डॉक्टर के रेप की घटना ने भड़काया. 2006 में बलूच कबायली सरदार नवाब अकबर बुगती की हत्या के बाद यह पूरे प्रांत में फैल गई, जिसका आरोप बलूच राष्ट्रवादियों ने पाकिस्तानी सेना पर लगाया था. तब से, यह बगावत जारी है, जिसके कारण सैकड़ों मौतें हुई हैं और क्रूरता के मामले सामने आए.
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2021-22 के बाद विद्रोह में तेजी: 2021-22 से बलूचिस्तान में आंदोलन ने रफ्तार पकड़ ली. उग्रवादी और राजनीतिक आंदोलन साथ-साथ चले. दोनों को काफी समर्थन मिला. उग्रवादी आंदोलन की क्रूरता और पैमाना काफी बढ़ गया. साथ ही पाकिस्तानी राज्य के खिलाफ हमलों की हिम्मत भी बढ़ी. घात लगाकर हमलों और IED धमाकों के अलावा, उग्रवादियों ने मिलिट्री चौकियों, छावनियों और यहां तक कि एक नौसैनिक एयर बेस पर भी हमला किया है.
आत्मघाती हमलों का भी इस्तेमाल किया गया है, जिसमें उच्च शिक्षित महिला आत्मघाती हमलावर भी शामिल थीं. ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स रिपोर्ट (2025) से लगाया जा सकता है, जिसमें बताया गया था कि 2025 में बलूचिस्तान में 500 से ज्यादा आतंकवादी हमलों के लिए BLA जिम्मेदार था.
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बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन: बलूचिस्तान मानवाधिकार परिषद (HRCB) ने प्रांत में मानवाधिकारों की स्थिति पर अपनी 6 महीने की रिपोर्ट जारी की है. जो जनवरी से जून 2025 तक की है. बलूचिस्तान पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, जबरन गायब किए जाने के 814 मामले सामने आए, जो 2024 के पूरे साल के कुल मामलों के लगभग बराबर है. इनमें छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता, मजदूर और आम नागरिक शामिल थे. इसके अलावा, कम से कम 131 लोगों को बिना मुकदमे के मार दिया गया.
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