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क्या है 200 साल पुरानी 'मोनरो डॉक्ट्रिन', जिसे ट्रंप ने अब 'डोनरो' का नाम दिया है?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन पश्चिमी गोलार्ध पर अपना प्रभुत्व जमाने के प्रयास में 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के तर्क को फिर से जीवित कर रहा है.

Donald Trump
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (File) (AP)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : January 7, 2026 at 4:37 PM IST

6 Min Read
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वेनेजुएला के मौजूदा राजनीतिक संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. ट्रंप ने 3 जनवरी, 2026 को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान 'मोनरो डॉक्ट्रिन' का जिक्र किया. फिर, उन्होंने दावा किया कि उनके प्रशासन ने 1823 के इस सिद्धांत की जगह ले ली है और इसे "डोनरो डॉक्ट्रिन" (Donroe Doctrine) का नया नाम दिया है.

ट्रंप ने वेनेजुएला के संदर्भ में 'मोनरो डॉक्ट्रिन' का जिक्र करते हुए साफ चेतावनी दी है कि पश्चिमी गोलार्ध में किसी भी विदेशी ताकत का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. आखिर यह 'मोनरो डॉक्ट्रिन' क्या है, जो दो सदियों बाद भी अमेरिकी विदेश नीति का सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है? आइए समझते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई और ट्रंप इसे आज के दौर में कैसे (डोनरो डॉक्ट्रिन) लागू करना चाहते हैं.

क्या है मोनरो डॉक्ट्रिन

अमेरिका की एक ऐतिहासिक विदेश नीति है, जिसकी शुरुआत 1823 में तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने की थी. इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को चेतावनी देना था कि वे पश्चिमी गोलार्ध (उत्तर और दक्षिण अमेरिका) के देशों के मामलों में हस्तक्षेप न करें और न ही यहां नए उपनिवेश बनाने की कोशिश करें. प्रेसिडेंट जेम्स मोनरो के 1823 में कांग्रेस में दिये गये भाषण के इस हिस्से को 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के नाम से जाना जाता है.

आसान शब्दों में, यह अमेरिका का एक ऐसा ऐलान था जिसने पूरी दुनिया को संदेश दिया कि "अमेरिका, अमेरिकियों के लिए है" और इस क्षेत्र में किसी भी बाहरी या विदेशी ताकत का दखल अमेरिकी सुरक्षा के लिए खतरा माना जाएगा. दशकों तक इसी नीति के आधार पर अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध में अपना दबदबा बनाए रखा है.

'मोनरो डॉक्ट्रिन' के भू-राजनीतिक कारण

यह बात साल 1823 की है, जब नव-स्वतंत्र लैटिन अमेरिकी गणराज्य खतरे में थे. संयुक्त राज्य अमेरिका से राजनयिक मान्यता मिलने के बावजूद, वे अपने पूर्व यूरोपीय आकाओं द्वारा संभावित पुनर्विजय (फिर से गुलाम बनाए जाने) से सुरक्षित नहीं थे.

स्पेनिश राजशाही पहले से कहीं अधिक मजबूत थी, जिसे रूस, प्रशिया (तत्कालीन जर्मनी का हिस्सा) और ऑस्ट्रिया के 'होली एलायंस' (पवित्र गठबंधन) से समर्थन मिल रहा था. इसी गठबंधन ने 1823 में स्पेन में एक अल्पकालिक संवैधानिक सरकार को कुचलने में मदद की थी, जिससे लैटिन अमेरिकी देशों पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे.

अमेरिका ने इस सिद्धांत का पालन कैसे किया

मोनरो डॉक्ट्रिन का सहारा साल 1865 में लिया गया था, जब अमेरिकी सरकार ने मैक्सिको के राष्ट्रपति बेनिटो जुआरेज के समर्थन में राजनयिक और सैन्य दबाव बनाया था. अमेरिका के इस समर्थन ने जुआरेज को सम्राट मैक्सिमिलियन के खिलाफ एक सफल विद्रोह का नेतृत्व करने में सक्षम बनाया. बता दें कि सम्राट मैक्सिमिलियन को फ्रांसीसी सरकार ने मैक्सिको के सिंहासन पर बैठाया था.

इसके बाद 1904 में, कई लैटिन अमेरिकी देशों के यूरोपीय कर्जदाताओं ने अपना बकाया वसूलने के लिए सशस्त्र हस्तक्षेप की धमकी दी. तब राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने तुरंत मोनरो डॉक्ट्रिन के अपने तथाकथित 'रूजवेल्ट कोरोलरी' के जरिए यह घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमेरिका के पास ऐसी "पुरानी गलतियों" को रोकने के लिए "अंतर्राष्ट्रीय पुलिस शक्ति" का उपयोग करने का अधिकार है.

जहां मोनरो डॉक्ट्रिन का मूल संदेश यूरोपीय शक्तियों को पश्चिमी गोलार्ध से बाहर रखना था, वहीं राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने इसके अर्थ को और मजबूत किया ताकि पश्चिमी गोलार्ध के अन्य देशों में अमेरिकी सेना भेजने को सही ठहराया जा सके. इसके परिणामस्वरूप, 1904 में सेंटो डोमिंगो, 1911 में निकारागुआ और 1915 में हैती में अमेरिकी मरीन भेजे गए. कथित तौर पर इसका उद्देश्य यूरोपीय देशों को वहां से दूर रखना था.

1962 में, मोनरो डॉक्ट्रिन का प्रतीकात्मक रूप से तब आह्वान किया गया जब सोवियत संघ ने क्यूबा में मिसाइल लॉन्चिंग साइट बनाना शुरू किया. 'ऑर्गनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स' के समर्थन के साथ, राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने द्वीप के चारों ओर नौसैनिक और हवाई घेराबंदी कर दी. कई दिनों के तनाव के बाद, सोवियत संघ मिसाइलों को वापस लेने और साइटों को हटाने पर सहमत हो गया. इसके बाद, अमेरिका ने भी तुर्की में अपने कई पुराने हवाई और मिसाइल ठिकानों को हटा दिया.

19वीं सदी में मोनरो डॉक्ट्रिन की 'अलगाववादी नीति' अमेरिकी विदेश नीति की आधारशिला थी. लेकिन 20th सदी के दो विश्व युद्धों ने एक हिचकिचाते हुए अमेरिका को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी नई भूमिका में खींच लिया.

डोनाल्ड ट्रंप की 'डोनरो डॉक्ट्रिन'

ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के अनुसार: "हम एक ऐसा गोलार्ध चाहते हैं जो विदेशी ताकतों की घुसपैठ या प्रमुख संपत्तियों पर उनके मालिकाना हक से मुक्त रहे, और जो महत्वपूर्ण सप्लाई चेन का समर्थन करे. हम रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों तक अपनी निरंतर पहुंच सुनिश्चित करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में, हम 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के एक नए विस्तार यानी 'ट्रंप कोरोलरी' (Trump Corollary) को लागू करेंगे."

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन पश्चिमी गोलार्ध पर अपना प्रभुत्व जमाने के प्रयास में 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के तर्क को फिर से जीवित कर रहा है और उसे एक नया अर्थ दे रहा है. जहां 19वीं सदी का सिद्धांत बाहरी ताकतों को अमेरिकी महाद्वीपों में दखल देने के खिलाफ चेतावनी देता था, वहीं ट्रंप का संस्करण इस अवधारणा को और व्यापक बनाता है.

इसका उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध में न केवल चीन, रूस और ईरान के प्रभाव को सीमित करना है, बल्कि सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों, चुनिंदा देशों के साथ गठबंधन और ट्रंप के व्यक्तिगत हिसाब-किताब के जरिए अमेरिकी वर्चस्व को सक्रिय रूप से स्थापित करना है. साल 2026 में, अमेरिका का यह कड़ा रुख नीतिगत अतिरेक और अनपेक्षित परिणामों के जोखिम को बढ़ा सकता है.

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