Explained : अमेरिका के पॉवरफुल होने के बावजूद ईरान ने किस हथियार से मचाई तबाही, ट्रंप को मांगनी पड़ी मदद !
ईरान के ड्रोन ने अमेरिकी मिलिट्री बेस पर मचाई तबाही. तकनीक कॉपी कर अमेरिका को करना पड़ रहा काउंटर.

Published : March 8, 2026 at 8:59 AM IST
|Updated : March 8, 2026 at 1:44 PM IST
नई दिल्ली : ईरान और इजराइल-यूएस के बीच चल रहे युद्ध में ईरान के एक सस्ते ड्रोन ने खलबली मचा दी है. ईरान ने इसकी मदद से सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी रास तनुरा पर हमला किया. इस हमले के बाद कंपनी को प्रोडक्शन बंद करना पड़ा. उसके बाद ईरान ने कतर के एनएनजी टर्मिनल को निशाने पर लिया. वहां भी इसकी सप्लाई रोकनी पड़ी. इस तरह से इस ड्रोन की मदद से ईरान ने खाड़ी के लगभग उन सभी देशों को टारगेट किया, जहां अमेरिकी मिलिट्री बेस हैं.
इस ड्रोन का नाम है - शाहेद ड्रोन. इसकी लागत 16 लाख रुपये से लेकर 32 लाख रुपये तक पड़ती है. ईरान ने पड़ोसी देशों में स्थित अमेरिकी बेसों पर हमला करने के लिए इसका बखूबी इस्तेमाल किया है. इसका असर कितना अधिक पड़ा है, इसे इस बात से समझिए कि अमेरिका ने आनन-फानन में शाहेद ड्रोन की तकनीक को कॉपी कर अपना नया ड्रोन बना लिया, ताकि वे इसका मुकाबला कर सकें.
अमेरिकी फोर्सेस ने इसकी जरूरत को महसूस किया और उन्होंने तुरंत इस तरह के ड्रोन की डिमांड की. ईरान सैकड़ों शाहेद ड्रोन लॉन्च कर रहा है - जिनकी संख्या बैलिस्टिक मिसाइलों के बराबर या उससे भी अधिक है - ताकि इजरायल, संयुक्त राज्य अमेरिका और मध्य पूर्व में उसके सहयोगियों की हवाई रक्षा प्रणालियों को कमजोर किया जा सके और महत्वपूर्ण सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया जा सके.
How Shahed-136 Kamakazi Drone Works? pic.twitter.com/svAVOnN8AL
— Engineering Explained (@Engineering67) March 5, 2026
शाहेद ड्रोन की खासियत
इसे ऑपरेट करने की जरूरत नहीं पड़ती है. दरअसल, इसमें सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का उपयोग किया जाता है. यह ड्रोन मुख्य रूप से नागरिक-स्तरीय जीपीएस और रूसी ग्लोनास नेटवर्क का उपयोग करके अपने उड़ान पथ को निर्देशित करता है.
यह दोहरी प्रणाली दृष्टिकोण ड्रोन को सक्रिय मानव संचालन के बिना लंबी दूरी तक सटीक रूप से नेविगेट करने की अनुमति देता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित करके इसे ऑन कर दिया जाता है. इसके बाद ड्रोन खुद-ब-खुद अपने टारगेट पर पहुंच जाता है और वहां विस्फोट हो जाता है.
इसकी रेंज 2500 किलोमीटर तक है. यह मिसाइल की तरह तेज नहीं उड़ता है. यह जमीन से काफी सटकर उड़ता है, इसलिए अधिकतर रडार इसे पकड़ नहीं पाते हैं. इसका आकार भी पतला होता है. पतला आकार और कम ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता इसे रडार और मिसाइलों से खतरे पर केंद्रित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों द्वारा पता लगाना मुश्किल बना देती है.

यह लगभग 10 फीट लंबा होता है. इसके विंग्स आठ फीट के होते हैं. इनके आगे के हिस्से में विस्फोटक सामग्री लगी होती है, जो टकराने पर फट जाती है. ये अपने टारगेट पर स्वतः ही पहुंच जाते हैं, इन्हें फिर से कमांड देने की जरूरत नहीं पड़ती है. ये दिन भर उड़ सकते हैं.
ड्रोन के नए वेरिएंट में कंट्रोल्ड रिसेप्शन पैटर्न एंटीना लगा होता है. इन विशेष मॉड्यूल में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए डिजाइन किए गए 16 अलग-अलग तत्व होते हैं. इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से वास्तविक उपग्रह संकेतों को अलग करके, ड्रोन अपने सटीक पथ को बनाए रखता है.
उन्नत कोमेटा-एम नेविगेशन मॉड्यूल ड्रोन को एक साथ कई हस्तक्षेप स्रोतों को अनदेखा करने की अनुमति देता है. फील्ड डेटा से पता चलता है कि 16-तत्वों वाला यह मॉड्यूल एक साथ 15 अलग-अलग जीपीएस स्पूफर्स को सफलतापूर्वक ब्लॉक कर सकता है. इस क्षमता के लिए रक्षा बलों को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों का एक अत्यंत सघन नेटवर्क तैनात करना आवश्यक है.
बैकअप इनर्शियल नेविगेशन 50 किलोग्रामजब सैटेलाइट सिग्नल पूरी तरह से जाम हो जाते हैं, तो ड्रोन अपने आंतरिक इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर स्विच कर जाता है. यह बैकअप सिस्टम वर्तमान ऊंचाई को बनाए रखने के लिए बैरोमीटर और आगे की दिशा को बनाए रखने के लिए कंपास का उपयोग करता है. 50 किलोग्राम का पेलोड तब तक बिना सिग्नल जाम वाले क्षेत्र से बाहर निकलकर जीपीएस सिग्नल दोबारा प्राप्त करने तक अपनी ब्लाइंड उड़ान जारी रखता है.
इंजीनियरों ने हाल ही में ड्रोन के नेविगेशन सिस्टम में 3G और LTE मोबाइल मॉडेम जोड़े हैं. इस सुविधा से रियल-टाइम काइनेमैटिक पोजिशनिंग संभव हो पाती है, जो इंटरनेट से जुड़े बेस स्टेशनों का उपयोग करके सैटेलाइट लोकेशन डेटा को तुरंत सही करती है.
हाल ही में किए गए अपग्रेड में बेहतर स्थिति निर्धारण के लिए नए रिसीवर मॉड्यूल को शामिल किया गया है. ये आधुनिक घटक L1, L2 और L5 उपग्रह आवृत्तियों को सपोर्ट करते हैं, जिससे नेविगेशन सिस्टम को बाधित करना काफी मुश्किल हो जाता है. कई आवृत्ति बैंडों पर काम करने से मानक सैन्य स्पूफिंग युक्तियों के खिलाफ मजबूत सुरक्षा मिलती है.
रूस, वेनेजुएला और हिजबुल्ला को ईरान ने किया निर्यात
शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल रूस ने यूक्रेन युद्ध में घनी आबादी वाले शहरों और बिजली स्टेशनों को निशाना बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किया है. ईरान ने अपने इस ड्रोन को रूस, वेनेजुएला और हिजबुल्ला के साथ भी साझा किया है. रूस खुद इसका नया संस्करण बना रहा है.
शाहेद का काउंटर करने के लिए अमेरिका ने बनाया लुकास
JUST IN: 🇺🇸The U.S. has reverse-engineered Iran's Shahed drone to make the LUCAS, a $35,000 clone. pic.twitter.com/Mkgu7yWRQv
— Radar 𝘸 Archie🚨 (@RadarHits) March 6, 2026
अमेरिका ने इसका मुकाबला करने के लिए मानवरहित लड़ाकू आक्रमण प्रणाली (एलयूसीएएस यानी लुकास) का उपयोग किया है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी एक खबर में इस ड्रोन को ईरानी ड्रोन जैसा ही बताया है. यानी उसी मॉडल पर आधारित है. अमेरिकी केंद्रीय कमान ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "ईरान के शाहेद ड्रोन की तर्ज पर बने "लुकास" कम लागत वाले ड्रोन अब अमेरिकी निर्मित प्रतिशोध को अंजाम दे रहे हैं."
ये दोनों ही ड्रोन (लुकास और शाहेद) युद्धक्षेत्र में कमाल कर रहे हैं. उनकी क्षमताएं लगभग बराबर हैं. हालांकि, अमेरिका का दावा है कि उसने शाहेद से बेहतर लुकास को बनाया है. पहले इस तरह के हमलों के लिए महंगे मिसाइलों का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. स्वायत्त प्रणालियों के लिए सॉफ्टवेयर में प्रगति, तेजी से विनिर्माण और सटीक मार्गदर्शन लक्ष्यीकरण के प्रसार से कम लागत वाले ड्रोन युद्ध की एक स्थायी वास्तविकता बन रहे हैं.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि लुकास की असली उपलब्धि इसकी तकनीक नहीं, बल्कि इसके विकास की गति है. सेना ने प्रतिद्वंद्वी कंपनी के हथियार की रिवर्स इंजीनियरिंग करके लगभग 18 महीनों में अपना संस्करण तैयार कर लिया. 25 लाख डॉलर की टोमाहॉक क्रूज मिसाइल की तुलना में इसकी कीमत मात्र 35,000 डॉलर है, जो इसके आर्थिक पहलू को तर्कसंगत बनाती है.
🚨 INSANE US MOVE 🤯:
— GPX News (@GPX_News) March 7, 2026
US Command says:
“We captured an Iranian Shahed drone, sent it to the U.S., dismantled it, studied its components, built copies with ‘Made in USA’ labels, and prepared to use them against Iran 🇮🇷.” ⚡️#Breaking #Iran #US pic.twitter.com/I5rDYFdiF8
अमेरिका ने शाहेद को रोकने के लिए यूक्रेन से मांगी मदद
शाहेद का मुकाबला सबसे अधिक यूक्रेन ने किया है. उसने ऐसे ड्रोन विकसित किए हैं, जो शाहेद का काउंटर करते हैं. अमेरिका ने यूक्रेन से मदद भी मांगी है. हालांकि, यूक्रेन खुद जंग में उलझा हुआ है, लिहाजा वह अमेरिका की मदद कर पाएगा, कहना मुश्किल है. दूसरी ओर ईरान को भी शाहेद में मदद की जरूरत है. उसकी वजह है- इसका प्रोडक्शन. अमेरिका ने अपने हमले में ड्रोन प्रोडक्शन सेंटर को टारगेट किया है. इसलिए ईरान अब रूस से मदद चाहता है, ताकि उसे इसकी खेप मिल सके. वैसे, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान में अभी भी शाहेद के प्रोडक्शन सेंटर काम कर रहे हैं, और इन्हें लोकेट करना आसान नहीं है.
यूक्रेनी हथियार उत्पादकों के अनुसार, अमेरिका और खाड़ी देशों, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सऊदी अरब और कतर शामिल हैं, ने यूक्रेन में घरेलू स्तर पर उत्पादित इंटरसेप्टर ड्रोन के लिए बार-बार अनुरोध किया है.
यूक्रेन के पास फिलहाल इंटरसेप्टर ड्रोनों की प्रचुर मात्रा है, और निर्माताओं का कहना है कि वे देश की रक्षा व्यवस्था को खतरे में डाले बिना हजारों और ड्रोन बना सकते हैं. उनका कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती ड्रोन के चालक दल को प्रशिक्षित करना और लंबी दूरी से लक्ष्यों का पता लगाने में सक्षम रडार प्रणालियों के साथ ड्रोनों को एकीकृत करना है.
एपी न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरसेप्टर ड्रोन एक स्वतंत्र उत्पाद नहीं हैं और इन्हें रडार की एक व्यापक प्रणाली में एकीकृत किया जाना चाहिए जो आने वाले लक्ष्यों का पता लगा सके और उन पर नजर रख सके. हालांकि कुछ मॉडल आंशिक रूप से स्वचालित हैं, निर्माताओं का कहना है कि प्रभावी ढंग से इनका उपयोग करने के लिए चालक दल को अभी भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है.ओलेह काटकोव ने कहा, "यह एक ऐसा उपकरण है जिसके लिए प्रशिक्षण आवश्यक है. और वास्तविक, प्रमाणित विशेषज्ञता - केवल कागज पर नहीं - केवल यूक्रेन में मौजूद है."
शाहेद का मुकाबला करने के लिए, कीव ने लगभग 1,000 से 2,000 डॉलर की कीमत वाले कम लागत वाले इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित किए, और 2025 में कुछ ही महीनों के भीतर इन प्रणालियों को प्रोटोटाइप से बड़े पैमाने पर उत्पादन में स्थानांतरित कर दिया.
ड्रोन को गिराने के लिए अमेरिका को पैसे अधिक खर्च करने पड़ रहे हैं
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने एक हजार से अधिक ड्रोन का इस्तेमाल किया है और उनमें से 100 के करीब ड्रोन को अमेरिकी इंटरसेप्टर ने गिराया है. यानी शाहेद की मारक क्षमता बरकरार है. शाहेद ड्रोनों को कई तरीकों से गिराया जा सकता है, जिनमें विशेष जीपीएस जैमिंग उपकरण और लेजर हथियार प्रणाली शामिल हैं. लेकिन वर्तमान में इनमें से कई ड्रोन लड़ाकू विमानों या महंगी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों से दागे जा रहे हैं.
जब ईरान ने 2024 में सैकड़ों ड्रोनों से इजराइल पर हमला किया था, तब ब्रिटेन ने कथित तौर पर आरएएफ लड़ाकू विमानों का उपयोग करके कुछ ड्रोनों को लगभग 200,000 पाउंड प्रति मिसाइल की अनुमानित कीमत वाली मिसाइलों से मार गिराया था.
शाहेद का प्रोडक्शन प्रभावित
माना जाता है कि युद्ध से पहले ईरान ने हजारों की संख्या में शाहेद ड्रोन बनाया था. लेकिन अब उनकी संख्या कितनी है, कहना मुश्किल है. एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लड़ाई के पहले दिन से ईरान द्वारा लॉन्च किए गए ड्रोन की संख्या में 83 फीसदी की कमी आई है, जबकि बैलिस्टिक मिसाइलों के उपयोग में 90 फीसदी की गिरावट आई है.
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