पाकिस्तान की संसदीय समिति ने 27वें संशोधन को दी मंजूरी, आसिम मुनीर की बढ़ेगी ताकत
पाकिस्तान में संविधान संशोधन के तहत 'चेयरमैन, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी' को हटाकर एक नए 'रक्षा बलों के प्रमुख' की नियुक्ति की जाएगी.

By PTI
Published : November 9, 2025 at 10:58 PM IST
इस्लामाबाद: पाकिस्तान की सीनेट और नेशनल असेंबली की संयुक्त संसदीय समिति ने रविवार को 27वें संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी. इस संशोधन में अनुच्छेद 243 में बदलाव का प्रस्ताव है, जिसके तहत 'चेयरमैन, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी' को हटाकर एक नए 'रक्षा बलों के प्रमुख' की नियुक्ति की जाएगी. संविधान में बदलाव से पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर की ताकत बढ़ सकती है और वह तीनों सेनाओं के प्रमुख बन सकते हैं.
इसी संशोधन के तहत अन्य प्रस्तावों में एक संघीय संवैधानिक न्यायालय (एफसीसी) की स्थापना और सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को कम करना शामिल है. विपक्ष ने पाकिस्तान सरकार के इस कदम की आलोचना की है और इसे सुप्रीम कोर्ट को खत्म की साजिश करार दिया.
संयुक्त संसदीय समिति की बैठक की अध्यक्षता करने वाले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सीनेटर फारूक नाइक ने मीडिया को बताया कि "बैठक में विधेयक के मूल मसौदे को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई." उन्होंने कहा, "कुछ छोटे-मोटे सेक्शन हैं जिन्हें समिति ने मुझे (नाइक) और कानून मंत्री (आजम नजीर तरार) को समाधान निकालने के लिए अधिकृत किया है. सब कुछ सर्वसम्मति से किया गया है."
उन्होंने बताया कि सोमवार (10 नवंबर) को सुबह 11 बजे सीनेट की बैठक होगी, जिसमें समिति की रिपोर्ट के आलोक में विधेयक पर विचार किया जाएगा तथा प्रत्येक संशोधन पर मतदान किया जाएगा तथा इसे दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाएगा.
सीनेट के बाद, इसे नेशनल असेंबली में पेश किया जाएगा, जहां इसे फिर से दो-तिहाई बहुमत से पारित होना होगा. अंतिम चरण में, इसे कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी लेनी होगी.
नए संशोधन की कड़ी आलोचना
इस बीच, नए संशोधन की सीनेट सत्र में कड़ी आलोचना हुई. विपक्षी सदस्यों ने विरोध स्वरूप काली पट्टियां पहनकर सीनेट सत्र में भाग लिया. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के सीनेटर अली जफर ने कहा कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन सुप्रीम कोर्ट के लिए घातक होगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद जनता के वोट से बनती है और संविधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है. उन्होंने आगे कहा कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की गारंटी है, जिसका मूल सिद्धांत नागरिक सर्वोच्चता है.
जफर ने वर्तमान संसद की वैधता पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस संशोधन पर कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं है; इस संसद का गठन त्रुटिपूर्ण चुनाव के माध्यम से किया गया था. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि नई संवैधानिक अदालतें गैर-जरूरी हैं.
मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (एमडब्ल्यूएम) के प्रमुख अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने एक बयान में कहा, "पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं पंगु हो गई हैं... राष्ट्र को (प्रस्तावित) 27वें संशोधन के खिलाफ कदम उठाना चाहिए."
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों से देश के सर्वोच्च न्यायिक मंच के रूप में सुप्रीम कोर्ट का स्थान समाप्त हो जाएगा और यह पद प्रस्तावित संघीय संवैधानिक न्यायालय (FCC) को सौंप दिया जाएगा.
डॉन अखबार के अनुसार, हालांकि, संशोधन का समर्थन करने वालों का कहना है कि नया संवैधानिक न्यायालय न्यायपालिका को आधुनिक बनाएगा, लंबित मामलों को कम करेगा और संवैधानिक तथा अपीलीय क्षेत्राधिकारों को अलग करेगा. उनका तर्क है कि इस सुधार से न्याय प्रणाली में दक्षता और स्पष्टता बढ़ेगी.
एक वरिष्ठ वकील ने डॉन को बताया, "सामान्य दीवानी, फौजदारी और वैधानिक अपीलों पर निर्णय लेने के सीमित अधिकार क्षेत्र के साथ, सर्वोच्च न्यायालय अब और भी अधिक 'सर्वोच्च जिला न्यायालय' बन गया है."
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