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ब्रिक्स की बैठक से पहले सदस्य देशों से समर्थन मांग रहा ईरान

ईरान ने कूटनीति तेज की, अमेरिका के साथ संघर्ष में उलझे ब्रिक्स सदस्यों से समर्थन मांगा.

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सांकेतिक तस्वीर (ANI)
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By Nirmala Ganapathy

Published : September 7, 2026 at 1:48 PM IST

6 Min Read
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नई दिल्ली : ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले, ईरान ने पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के मद्देनजर अपने खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करने के लिए सदस्य देशों को मनाने के अपने राजनयिक प्रयासों को तेज कर दिया है.

हालांकि, ब्रिक्स के भीतर, विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच, मतभेद बढ़ गए हैं. उनकी वजह से ब्रिक्स घोषणा पत्र प्रभावित हो सकता है. इस संघर्ष को लेकर दोनों की अपनी-अपनी राय है. उनका नजरिया अलग है. फिर भी, तेहरान अमेरिका के साथ संघर्ष में ब्रिक्स एकजुटता के लिए दबाव बनाना जारी रखे हुए है.

हाल ही में, ईरान के न्यायपालिका प्रमुख, अयातुल्ला गुलाम-हुसैन मोहसेनी एजेई ने चल रही ब्रिक्स न्यायपालिका प्रमुखों की बैठक में सभी सदस्य देशों से "ईरान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा" करने का आह्वान किया था. उन्होंने कहा, "उभरती वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में ब्रिक्स की भूमिका तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है. हम एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें कोई भी शक्ति खुद को कानून से ऊपर न समझे."

उन्होंने ब्रिक्स सदस्यों से "कानून के साथ खड़े होने" का आह्वान किया.उन्होंने ईरान पर हुए हमलों को "गैरकानूनी और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन" बताया. सुप्रीम कोर्ट ने 4 से 6 सितंबर तक ब्रिक्स मुख्य न्यायाधीशों के मंच की मेजबानी की.नेताओं के शिखर सम्मेलन से पहले आयोजित विभिन्न बैठकों में ईरान ब्रिक्स सदस्य देशों का समर्थन मांग रहा है, क्योंकि सदस्य देशों द्वारा निंदा करना एक कूटनीतिक जीत होगी.

ब्रिक्स समूह विश्व की लगभग 45 प्रतिशत आबादी और वैश्विक जीडीपी के लगभग 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है.इस वर्ष, भारत नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जो 12 से 13 सितंबर तक आयोजित होगा.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन सहित कई नेताओं के शिखर सम्मेलन में भाग लेने की उम्मीद है.संयुक्त अरब अमीरात का प्रतिनिधित्व अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान कर सकते हैं.

फिर भी, ईरान संघर्ष ने इस समूह के भीतर मतभेदों को उजागर कर दिया है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे विविध हितों वाले देश शामिल हैं.संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान द्वारा अपने क्षेत्र और कुवैत जैसे अन्य पड़ोसी देशों पर किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों की निंदा की है.

सऊदी अरब मक्का संधि के माध्यम से अपनी सुरक्षा क्षमता को मजबूत कर रहा है, जिसमें तुर्की और पाकिस्तान भी शामिल हैं.ईरान संघर्ष पर समूह के भीतर मौजूद मतभेदों को दर्शाते हुए, ब्रिक्स सदस्य मई में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद कोई संयुक्त बयान जारी करने में विफल रहे.

इसके बजाय, भारत ने अध्यक्षीय वक्तव्य और परिणाम दस्तावेज जारी किया, जिसमें यह उल्लेख किया गया कि "पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व क्षेत्र की स्थिति के संबंध में कुछ सदस्यों के बीच मतभेद हैं."

उस बैठक में भी, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ब्रिक्स देशों से अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की निंदा करने का आग्रह किया था.उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का परोक्ष रूप से उल्लेख करते हुए, ब्रिक्स के एक सदस्य देश पर संयुक्त वक्तव्य के कुछ हिस्सों को अवरुद्ध करने का आरोप भी लगाया था.

मई से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंध और भी बिगड़ गए हैं. संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान पर अपने क्षेत्र पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले का आरोप लगाते हुए अगस्त में ईरान के साथ सभी आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध तोड़ दिए.

ईरान द्वारा ब्रिक्स एकजुटता के लिए किया गया यह नवीनतम प्रयास ऐसे समय में आया है जब संघर्ष और भी बढ़ गया है, और सप्ताहांत में अमेरिका ने खर्ग द्वीप पर ईरानी रॉकेट लॉन्चरों को नष्ट कर दिया. ईरान ने जवाबी कार्रवाई में जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं.परिणामस्वरूप, छह महीने से अधिक समय से चल रहे इस युद्ध के समाधान के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं, जबकि इसने ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर दिया है.

अमेरिका ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है, जिसके तहत ईरान के वित्तीय चैनलों और अन्य नेटवर्कों को निशाना बनाया गया है.ईरान विवाद पर ब्रिक्स देशों के भीतर मतभेद मौजूद हैं, लेकिन हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के नेताओं की बैठक में ईरान की कूटनीति को बढ़ावा मिला है.

नेताओं की बैठक के बाद एससीओ ने एक संयुक्त घोषणा जारी कर ईरान पर हुए सैन्य हमलों की निंदा की.भारत समेत सदस्य देशों द्वारा स्वीकृत इस संयुक्त घोषणा में कहा गया कि ये हमले अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों और मानदंडों का उल्लंघन हैं.फिर भी, विश्लेषकों का मानना ​​है कि ईरान के लिए इस संघर्ष पर सभी सदस्य देशों को एकमत करना एक कठिन चुनौती है.

विभिन्न अरब देशों में सेवा दे चुके पूर्व राजनयिक जिक्रुर रहमान ने कहा, "एससीओ में यूएई नहीं था. यहां यूएई है. ईरान पर हमले के मुद्दे पर अमेरिका और यूएई सबसे करीब हैं. इस मुद्दे पर अमेरिका की निंदा की बात करें, तो मुझे नहीं लगता कि इसकी कोई संभावना है."उन्होंने कहा कि एससीओ शिखर सम्मेलन जैसी कूटनीतिक जीत ईरान के लिए ब्रिक्स सम्मेलन में हासिल करना मुश्किल होगा. उन्होंने कहा, "ईरान पर अमेरिकी हमले की निंदा करते हुए एक संयुक्त बयान जारी करना मुश्किल होगा. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में घोषणा पर कठिन बातचीत होगी."

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