बांग्लादेश चुनाव का रुख तय करेंगे 10 करोड़ Gen-Z और महिलाएं; जानिए कैसे होता है चुनाव? नतीजों पर भारत, पाकिस्तान-चीन की नजर क्यों
बांग्लादेश में आज सुबह से देश की 300 सीटों के लिए मतदान हो रहा है. चुनाव में BNP और जमात ही मुख्य मुकाबले में हैं.

Published : February 10, 2026 at 3:06 PM IST
|Updated : February 12, 2026 at 4:03 PM IST
हैदराबाद: भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में लंबे अंतराल के बाद आम चुनाव हो रहे हैं. आज यानी 12 फरवरी 2026 को देश की 300 सीटों पर मतदान शुरू हो गया गया. देश के 12 करोड़ 70 लाख मतदाता अपनी नई सरकार चुनने के लिए सुबह से मतदान कर रहे हैं. चुनाव में Gen-Z और महिला मतदाता निर्णायक हो सकते हैं. बांग्लादेश के चुनाव आयोग के अनुसार 18 से 29 साल की उम्र के लगभग 4 करोड़ Gen-Z और करीब 6 करोड़ 20 लाख महिला मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. चुनाव में ये दो बड़े वर्ग अहम भूमिका निभा सकते हैं.
ये चुनाव सिर्फ बांग्लादेश के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि दक्षिण एशियाई देशों के लिए भी अहम माने जा रहे हैं. चुनाव के नतीज बांग्लादेश के दूसरों के साथ व्यापारिक संबंध और राजनयिक रिश्ते भी तय करेंगे. बता दें कि, आज शाम 4:30 बजे तक मतदान होगा. इसके बाद से ही मतगणना शुरू हो जाएगी. आईए, जानते हैं कि बांग्लादेश में चुनाव कैसे होता है? इसके नतीजे भारत, पाकिस्तान और चीन के लिए क्या मायने रखते हैं?
बांग्लादेश में पहली बार कब हुआ था चुनाव: स्वतंत्रता के बाद से बांग्लादेश ने 54 वर्षों के लोकतंत्र का अनुभव किया है, जो उथल-पुथल और दृढ़ता दोनों के लिए जाना जाता है. 1972 के संविधान ने बहुदलीय संसदीय प्रणाली की स्थापना की और मार्च 1973 में बांग्लादेश ने एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अपना पहला संसदीय चुनाव देखा. उस चुनाव ने एक राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की, जिसमें तब से 12 संसदीय चुनाव हुए हैं, जो शासन, जन इच्छा और लोकतांत्रिक संघर्ष में बदलाव को दर्शाते हैं.
बांग्लादेश चुनाव 2026 के मुद्दे
- भ्रष्टाचार: ढाका स्थित कम्युनिकेशन रिसर्च फाउंडेशन और बांग्लादेश इलेक्शंस एंड पब्लिक ओपिनियन स्टडीज के एक हालिया जनमत सर्वेक्षण में पाया गया कि भ्रष्टाचार मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में बांग्लादेश लंबे समय से दुनिया के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शुमार रहा है. हाल ही में जारी 2025 भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में बांग्लादेश 150वें स्थान पर है.
- मुद्रास्फीति: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में मुद्रास्फीति बढ़कर 8.58% हो गई और सर्वेक्षण में शामिल दो-तिहाई से अधिक उत्तरदाताओं ने "कीमतों" को अपनी दूसरी सबसे बड़ी चिंता बताया.
- आर्थिक विकास: मतदाताओं ने आर्थिक विकास को अपनी तीसरी सबसे बड़ी चिंता के रूप में स्थान दिया.
- रोजगार: बांग्लादेश में अनुमानित 40% आबादी 30 वर्ष से कम आयु की है. ऐसे में महीनों की अस्थिरता के बाद अगली सरकार पर लाखों युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने का भारी दबाव होगा.
बीएनपी के नेतृत्व वाला गठबंधन: पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) 300 प्रत्यक्ष निर्वाचित सीटों में से 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसके गठबंधन सहयोगियों में 6 से अधिक छोटी पार्टियां शामिल हैं. बीएनपी का चुनावी अभियान निम्न-आय वर्ग के परिवारों के लिए वित्तीय सहायता, प्रधानमंत्री के कार्यकाल की अधिकतम सीमा 10 वर्ष, विदेशी निवेश से प्रेरित आर्थिक विकास और भ्रष्टाचार-विरोधी उपायों पर केंद्रित है. जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि इस गठबंधन को मामूली बढ़त प्राप्त है, जो दशकों तक अवामी लीग के प्रभुत्व के बाद जनता की बदलाव की इच्छा को दर्शाता है.
जमात-ए-इस्लामी का 11-दलीय गठबंधन: शफीकुर रहमान के नेतृत्व में जमात-ए-इस्लामी ने नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के साथ गठबंधन किया है, जो 2024 के विद्रोह के युवा नेताओं द्वारा गठित एक मध्यमार्गी पार्टी है. यह गठबंधन जमात के नेतृत्व में 224 सीटों पर, एनसीपी के नेतृत्व में 30 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है, जबकि शेष सीटें छोटी पार्टियों के लिए आरक्षित हैं. गठबंधन इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित शासन, वस्त्र उद्योग से परे आर्थिक विविधीकरण और पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंधों पर जोर देता है. विश्लेषकों का अनुमान है कि भले ही गठबंधन को पूर्ण बहुमत न मिले, लेकिन यह संसदीय समीकरणों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है.
बांग्लादेश चुनाव क्यों महत्वपूर्ण: बांग्लादेश में कई दशकों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि चुनाव में देश की दो प्रमुख राजनीतिक हस्तियां, शेख हसीना और खालिदा जिया नहीं हैं. दरअसल, साल 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने बांग्लादेश में शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को गिरा दिया था. इसके बाद से हसीन भारत की शरण में हैं और उनकी पार्टी अवामी लीग को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया. बांग्लादेश चुनाव आयोग ने भी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद कर दिया था. इसके बाद तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 पार्टियों का गठबंधन चुनाव में आमने सामने है.
बांग्लादेश की संसद का आकार कितना बड़ा: बांग्लादेश में एक सदनीय संसद है, जिसमें कुल 350 सदस्य होते हैं. इनमें से 300 सांसद राष्ट्रीय चुनाव के जरिए एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुने जाते हैं. इनको जनता अपना वोट देकर चुनती है. 151 सीट जीतने वाले दल या गठबंधन की सरकार बनती है. इनका कार्यकाल 5 साल का होता है. सदन में 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं. इनका चयन सत्तारूढ़ दल या गठबंधन करता है. प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख होते हैं. राष्ट्रपति राज्य के प्रमुख होते हैं और उनका चुनाव राष्ट्रीय संसद द्वारा किया जाता है. राष्ट्रपति का पद औपचारिक होता है और राज्य के संचालन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता.
बांग्लादेश में कैसे होता है चुनाव: बांग्लादेश में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम से चुनाव होता है. इसमें मतदाता किसी एक प्रत्याशी को वोट देता है. जिस प्रत्याशी को अन्य की तुलना में सबसे अधिक वोट मिलते हैं, वह विजयी घोषित किया जाता है. प्रत्याशी को जीतने के लिए कुल वोटों के 50% से अधिक (बहुमत) की आवश्यकता नहीं होती, केवल प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा वोट होने चाहिए. वोटिंग बैलेट पेपर से होती है.
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बांग्लादेश चुनाव 2026 में कितने उम्मीदवार: इस साल बांग्लादेश की संसद की 300 सीटों के लिए बीएनपी और जमात समेत 51 पार्टियों के कुल 1981 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं. इनमें 78 महिलाएं हैं. इसके साथ ही 249 निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में हैं. शेरपुर जिले में जमात उम्मीदवार के निधन के बाद कुल 299 सीटों पर ही वोटिंग होगी. 12 फरवरी 2026 को होने वाले मतदान में कुल 12 करोड़ 76 लाख 95 हजार मतदाता भाग लेंगे. मतदान सुबह 7:30 बजे से शुरू होगा और शाम 4:30 बजे तक चलेगा. इसके बाद 4:30 बजे से ही मतगणना शुरू होगी. इस साल पहली बार विदेश में रहने वाले बांग्लादेशी भी पोस्टल बैलेट से वोट दे सकते हैं.
दुनिया की नजर बांग्लादेश चुनाव 2026 पर क्यों: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव पर दुनिया भर के ताकतवर देशों की भी नजर है. दरअसल, इस चुनाव में मतदाता सिर्फ नई सरकार ही नहीं चुनेंगे, बल्कि एक संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी वोट देंगे जो तय करेगा कि जुलाई चार्टर लागू होगा या नहीं. इस चार्टर में बताया गया है कि बांग्लादेश पर कैसे शासन किया जाएगा. इस चुनाव में इस बात की भी परीक्षा होगी कि सालों की राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता से जूझ रहे बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली संभव है या नहीं.
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बांग्लादेश चुनाव पर भारत, पाकिस्तान-चीन की नजर: साल 2024 के विद्रोह के बाद शेख हसीना को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था. इसके बाद से उन्होंने भारत में शरण ले रखी है. इसको लेकर भारत के बांग्लादेश से संबंध तनावपूर्ण हो गए. भारत और बांग्लादेश की क्रिकेट को लेकर भी विवाद हुआ. बांग्लादेश ने टी-20 क्रिकेट वर्ल्डकप में भारत में मैच खेलने से इनकार कर दिया था. जिसके बाद बांग्लादेश को टूर्नामेंट से ही हटना पड़ा.
इस बीच बांग्लादेश के पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर हुए हैं. जबकि 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश जब एक नया देश बना था, उसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण ही रहे थे. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में बांग्लादेश के चीन के साथ भी रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं. ऐसे में बांग्लादेश में होने जा रहे चुनाव पर भारत, पाकिस्तान और चीन नजर बनाए हुए हैं.
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बांग्लादेश चुनाव के नतीजों से भारत को उम्मीद: विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत चाहता है कि चुनाव के बाद बांग्लादेश में ऐसी सरकार बने जो रिश्ते सुधार सके. दरअसल, अवामी लीग के चुनाव में नहीं होने के बाद भारत चाहता है कि बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बने. जमात-ए-इस्लामी पार्टी की जीत होने पर भारत की चिंता बढ़ सकती है. जमात-ए-इस्लामी के सत्ता में आने पर कट्टरपंथ और सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ने की उम्मीद है.
हालांकि, चुनाव नतीजों के पहले से ही भारत जमात और बीएनपी दोनों ही पार्टियों से संपर्क बनाए हुए है. चीन भी बांग्लादेश में अपनी पैर लगातार पसार रहा है. उसने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में काफी निवेश किया है. पाकिस्तान भी बांग्लादेश को अपने पक्ष में करने में लगा है. पाकिस्तान ने बांग्लादेश से वीजा के नियम आसान करने के लिए कहा है. यही नहीं पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बैठकों में बांग्लादेश का खुलकर साथ दे रहा है.
दक्षिण एशिया का पावर बैलेंस: दक्षिण एशिया के पावर बैलेंस के लिए बांग्लादेश अहम है. क्योंकि यह देश भूगोल, राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों चारों मोर्चों पर एक साथ असर डालता है. दक्षिण एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते बांग्लादेश की स्थिरता दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को महत्वपूर्ण रूप से आकार दे सकती है.
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क्या है जुलाई चार्टर: बांग्लादेश में 12 फरवरी को नई सरकार चुनने के साथ मतदाता जुलाई चार्टर पर आधारित संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी अपना वोट देंगे. दरअसल, चार्टर में बताया गया है कि बांग्लादेश पर कैसे शासन किया जाएगा. इसका उद्देश्य कार्यपालिका में केंद्रित अधिकार को कम करना है. इसके साथ ही शासन के विभिन्न आयामों के बीच नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना है. साथ ही उस राजनीतिक प्रभुत्व को रोकना है जो हाल के दशकों में देश में दिखा है.
चार्टर में ऊपरी और निचले सदन वाली यानी दो सदनों वाली संसद बनाने का सुझाव दिया गया है. अगर इस जनमत संग्रह में 'हां' वोट मिलते हैं तो नई संसद कानूनी रूप से 84 सुधारों के एक सेट को लागू करने के लिए बाध्य होगी. अगर 'नहीं' वोट की जीत होती है, तो जुलाई चार्टर बाध्यकारी नहीं होगा. सुधार कार्य बहुमत वाली पार्टी पर निर्भर होगा.
बांग्लादेश का अल्पसंख्यक हिंदू वोट किस ओर जाएगा: बांग्लादेश चुनाव 2026 में वो दो पार्टियां आमने-सामने हैं जो कभी मिलकर चुनाव लड़ा करती थीं. जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी). शेख हसीना के कार्यकाल में बीएनपी मुख्य विपक्षी दल था. हालांकि, चुनाव एकतरफा नहीं, बल्कि कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है. यही कारण है कि दोनों दल देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर रही हैं. क्योंकि, माना जा रहा है कि हिंदू वोट निर्णायक हो सकता है. BNP और जमात दोनों के नेता हिंदुओं की सुरक्षा का वादा कर रहे हैं. मंदिरों में जा रहे हैं. लेकिन जमात की कठोर और कट्टर छवि के कारण, हिंदुओं में BNP की स्वीकार्यता ज्यादा मानी जा रही है.
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बांग्लादेश में अब तक हुए चुनावों के नतीजे: बांग्लादेश का चुनावी इतिहास शेख हसीना की अवामी लीग पर केंद्रित रहा है, जो 2009 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की बड़ी हार के बाद सत्ता में आई थी. दरअसल, 2001 के चुनाव में अवामी लीग सिर्फ 62 सीटें ही जीत पाई थी. जबकि बीएनपी ने 193 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था. 2014 में शेख हसीना की अवामी लीग ने फिर से भारी जीत हासिल की.
पार्टी ने 2018 के चुनाव में अपनी पकड़ और मजबूत की. BNP सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई, जो अब तक का उसका सबसे कमजोर प्रदर्शन था. जमात पर 2015 में बैन लगा दिया गया था, इसलिए वह 2018 का चुनाव नहीं लड़ सकी थी. इसके बाद 2024 के चुनाव में अवामी लीग ने 272 सीटें जीतीं और पार्लियामेंट में बहुमत बनाए रखा. विपक्षी नेताओं पर बढ़ते दबाव के बीच BNP ने फिर से बायकॉट किया. अगस्त 2024 में हिंसक छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और उन्होंने भारत में शरण ली.
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