ठंडे यूरोप में झुलसाने वाली गर्मी क्यों? पहली बार तापमान 44°C पार, WHO अलर्ट-हर साल होंगी एक लाख मौतें
Europe Temperature: यूरोपीय देशों में गर्मी से हाहाकार मचा है. सड़कें और ट्रैफिक लाइटें पिघल रहीं, रेलवे ट्रैक उखड़ रहे, AC की डिमांड बढ़ी.

Published : July 8, 2026 at 4:09 PM IST
|Updated : July 8, 2026 at 4:59 PM IST
हैदराबाद (समन्वय पाण्डेय): Europe Heatwave 2026: ठंडी हवाओं और सर्द मौसम की पहचान रखने वाला यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है. गर्मी ने यहां तापमान के अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. इसके साथ ही यहां की पिघलती सड़कें, उखड़ते रेलवे ट्रैक और मुड़ती हुई ट्रैफिक लाइटों ने हालात बद से बदतर कर दिए हैं. 21 जून से अब तक 1300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
गर्मी का कहर सबसे ज्यादा फ्रांस में देखने को मिल रहा है. यहां पहली बार तापमान 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. मौसम विभाग के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बुरा असर यूरोप में देखने को मिल रहा है. साल 2022 की हीटवेव में रिकॉर्ड 60,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे, 2023 में आंकड़ा 47,000 के पार पहुंचा था. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार अगर ऐसे ही हालात रहे तो साल 2050 तक यूरोप में हर साल गर्मी से 1,20,000 से ज्यादा लोगों की मौतें हो सकती हैं.
यूरोपीय देशों में भीषण गर्मी की वजह क्या: यूरोपीय देशों के भीषण गर्मी की चपेट में आने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और वायुमंडल में बनने वाली हीट डोम (Heat Dome) और ओमेगा ब्लॉक' (Omega Block) जैसी मौसमी प्रणालियां हैं. इसके चलते यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है.

हर दशक में बढ़ रहा 0.5°C तापमान: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization, WMO) के अनुसार, 1976 की ऐतिहासिक हीटवेव (लू) के बाद से यूरोपीय देशों का तापमान लगभग 2°C बढ़ गया है. 1991 के बाद से तापमान में हर दशक में लगभग 0.5°C की बढ़ोतरी हुई है. जो 0.2°C प्रति दशक की वैश्विक दर से काफी ज्यादा है. इस वजह से सर्द मौसम वाला यूरोप अब जलने लगा है.
यूरोप में 1950 के बाद से आईं 30 भीषण हीटवेव: WMO के यूरोप रीजनल क्लाइमेट सेंटर के अनुसार, 1950 के बाद से यूरोप में आई 30 सबसे भीषण हीटवेव में से 23 तो 2000 के बाद आई हैं. इनमें से कई हाल के वर्षों में देखी गई हैं. जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change, IPCC) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी का बार-बार आने की संभावना बनी हुई है.
इंसान खुद बिगाड़ रहा मौसम चक्र: मौजूदा समय में यूरोप जो भीषण गर्मी में झुलस रहा है उसका सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है, जिसके लिए खुद इंसान जिम्मेदार है. जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन ने ऐसी भीषण गर्मी की संभावना को कई गुना बढ़ा दिया है. 1976 की हीटवेव जैसे हालात अब कहीं ज्यादा तापमान पैदा कर रहे हैं. क्योंकि, आधारभूत यानी बेस तापमान पहले से ही ज्यादा हो गया है. UN के जलवायु प्रमुख साइमन स्टिएल का इस बारे में कहना है कि भीषण गर्मी "जलवायु संकट की साफ छाप" है, जो कोयला, तेल और गैस जलाने से पैदा हुआ है.
भीषण गर्मी में यूरोप की बिल्डिंग्स पैदा कर रहीं दिक्कत: जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर सरकारी पैनल ने एक और चिंता की बात की है. IPCC के अनुसार, हीटवेव में यूरोप की इमारतें और शहर समस्या पैदा करते हैं. दरअसल, ज्यादातर इमारतें सर्दियों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं, जिनकी दीवारें मोटी थीं और गर्मी को अंदर बनाए रखने के लिए अच्छा इंसुलेशन था.
लेकिन, गर्मियों में यही डिजाइन गर्म हवा को अंदर ही रोक लेता है, जिससे रात में घरों को ठंडा करना मुश्किल हो जाता है. कंक्रीट, डामर और गहरे रंग की छतों से बने शहर बहुत ज्यादा गर्मी सोखते हैं. इसे 'अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट' कहा जाता है. कंक्रीट, डामर और गहरे रंग की छतों गर्मी सोखने के बाद उसे धीरे-धीरे छोड़ते हैं, जिससे शहरी इलाके ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा गर्म हो जाते हैं.
फ्रांस में सबसे ज्यादा गर्मी: WMO के अनुसार, फ्रांस में जून में दिन का सामान्य तापमान लगभग 23-25 डिग्री सेल्सियस होता है. लेकिन, हीटवेव के दौरान कुछ क्षेत्रों में यह 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. पेरिस में तो 40 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान पहुंच गया. यह देश का अब तक का सबसे गर्म दिन था.
जर्मनी का तापमान 41 पार: WMO के अनुसार, जर्मनी में जून में अधिकतम तापमान लगभग 20-24 डिग्री सेल्सियस होता है. लेकिन, हीटवेव के कारण पूर्वी जर्मनी के कोस्चेन में तापमान 41.7 डिग्री सेल्सियस के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. जहां 46 स्टेशनों पर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया. जो एक रिकॉर्ड है.

यूनाइटेड किंगडम और नीदरलैंड में भी रिकॉर्डतोड़ गर्मी: WMO के अनुसार, UK में जून में दिन का सामान्य अधिकतम तापमान 18-22 डिग्री सेल्सियस होता है. लेकिन, लू के कारण तापमान 37.7 डिग्री सेल्सियस के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. वहीं, नीदरलैंड की जलवायु समुद्री है, जहां गर्मियां ठंडी और सर्दियां हल्की होती हैं. जनवरी में औसत तापमान 2°C और जुलाई में 19°C रहता है. लेकिन, जून 2026 में 8 प्रांतों में 39.4 डिग्री सेल्सियस का नया राष्ट्रीय उच्चतम तापमान दर्ज किया गया.
स्विट्जरलैंड में तापमान का नया रिकॉर्ड: WMO के अनुसार, स्विट्जरलैंड में आमतौर पर जुलाई से अगस्त तक दिन का तापमान 18 से 28°C के बीच रहता है. लेकिन, इस साल जून में उत्तरी शहर बेसल में 39°C का नया रिकॉर्ड बना. वहीं, चेकिया में जून में सामान्य तापमान लगभग 22-25°C रहता है. लेकिन, हीटवेव के कारण यह 41.9°C तक पहुंच गया.
पोलैंड का तापमान 40 पार: पोलैंड में सामान्य उच्चतम तापमान लगभग 20-23°C रहता है. लेकिन, इस बार यह 40.5°C के नए सर्वकालिक रिकॉर्ड पर पहुंच गया. इसी प्रकार हंगरी में भी रिकॉर्ड गर्मी पड़ रही है. यहां, जून में सामान्य औसत तापमान लगभग 24-27°C रहता है. लेकिन, इस साल बुडापेस्ट के पास जून महीने का नया उच्चतम तापमान 40.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया.
गर्मी बिगाड़ रही यूरोपीय लोगों की सेहत, ले रही जान: संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, रात में तापमान ज़्यादा होने के कारण यूरोपीय देशों में कई लोगों को सोने में दिक्कत हो रही है. अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड भर रहे हैं, एम्बुलेंस की कॉल बढ़ गई हैं. WHO के अनुसार, 21 जून से गर्मी के कारण 1,300 से ज्यादा लोगों की मौतें हुई हैं. इनमें बुज़ुर्ग और पहले से बीमार लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. गर्मी से राहत पाने की कोशिश में डूबने की घटनाएं भी बढ़ी हैं.
स्कूल-कॉलेज और ऑफिस बंद: यूरोप में घर और इमारतें सर्दियों के हिसाब से बनी हैं. क्योंकि, यहां ठंड बहुत होती है. इसलिए इमारतें ऐसी बनाई जाती हैं जो गर्मी को अंदर ही रोक लेती हैं. लेकिन, इस बार की गर्मी में यही इमारतें सबसे ज्यादा दिक्कत कर रही हैं. गर्मी के कारण लोगों का घर के अंदर रहना मुश्किल हो गया है. स्कूल-कॉलेज और ऑफिस बंद कर दिए गए हैं या उनके समय में कटौती की गई है.
सड़कें चिटक रहीं, रेलवे ट्रैक पिघल रहे, बिजली की मांग बढ़ी: यूरोपीय देशों में भीषण गर्मी के कारण ट्रेन, सड़क और बिजली सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है. रेल की पटरियाँ टेढ़ी हो रही हैं. सड़कें चिटक रही हैं. साथ ही बिजली की मांग बढ़ गई है. इतना ही नहीं, कई सार्वजनिक सेवाओं को रद तक करना पड़ा है.
क्या यूरोपीय देशों में पड़ रही भीषण गर्मी का भारत के मौसम पर कोई असर पड़ेगा: कई रिपोर्टों के अनुसार, यूरोप में गर्मी की वजह महाद्वीप के ऊपर बना एक स्थानीय हाई-प्रेशर सिस्टम (ओमेगा ब्लॉक) है. यह एक क्षेत्रीय मौसम पैटर्न है और हजारों किलोमीटर दूर भारत के मानसून सिस्टम पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ता.
यूरोप की इस घटना और भारत में होने वाली बारिश के बीच किसी महत्वपूर्ण जुड़ाव) का कोई स्पष्ट सबूत नहीं है. भारत में मानसून की मौजूदा स्थिति मुख्य रूप से प्रशांत महासागर में बन रहे अल-नीनो, हिंद महासागर के तापमान और स्थानीय वायुमंडलीय पैटर्न जैसे कारकों से तय होती है, ना कि यूरोप की हीटवेव से.
यूरोप की गर्मी का भारतीय पर्यटन और कारोबार पर असर: WMO के अनुसार, यूरोप में पड़ रही झुलसाने वाली गर्मी के कारण ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा के कामों में बड़ी रुकावट आ रही है. यूरोप से भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हो सकती है या यूरोप जाने वाले भारतीय यात्रियों पर असर पड़ सकता है. इससे टूरिज़्म सेक्टर, एयरलाइंस और हॉस्पिटैलिटी बिडनेस प्रभावित हो सकते हैं.
UN और WMO ने यूरोप में आर्थिक गतिविधियों, इंफ्रास्ट्रक्चर, खेती और मजदूरों की प्रोडक्टिविटी पर असर पड़ने की संभावना जताई है. इनके अनुसार, अगर यूरोप की फैक्ट्रियां, बंदरगाह या ट्रांसपोर्ट धीमे पड़ते हैं, तो भारतीय टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, रत्न, इंजीनियरिंग सामान के एक्सपोर्टर्स के ऑर्डर शिपमेंट लेट हो सकते हैं. इसकी भारी कीमत एक्सपोर्टर्स को चुकानी पड़ सकती है.

यूरोप में हीटवेव का आर्थिक असर: मैनहेम यूनिवर्सिटी और ECB की 2025 में जारी की गई एक ज्वाइंट रिपोर्ट में बदलते मौसम चक्र का एनालिसिस करके आर्थिक नुकसान का आंकड़ा बताया गया है. इसके अनुसार, यूरोप की इकोनॉमी को मौसम के कारण लगभग 0.3% का नुकसान हुआ है. यूरोप में सबसे ज्यादा गर्मी वाले सालों 2003, 2010, 2015 और 2018 पर 2021 की एक स्टडी में पाया गया कि सिर्फ लेबर प्रोडक्टिविटी घटने से पूरे महाद्वीप की GDP को 0.3-0.5% का नुकसान हुआ.
गर्मी ने यूरोप की GDP को पहुंचाया भारी नुकसान: लैंसेट की एक स्टडी के मुताबिक, बहुत ज्यादा गर्मी के कारण काम करने की क्षमता घटती है. इसके चलते 2024 में यूरोप की इकोनॉमी को अनुमानित 26.4 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, जो इस क्षेत्र की GDP का 0.17% है. साथ ही, 2024 में गर्मी से होने वाली मौतों की वजह से हुआ नुकसान लगभग 0.15% था.
यूरोप को तगड़ा आर्थिक नुकसान का अंदेशा: जून 2026 में पब्लिश हुई एक रिस्क रिपोर्ट में, एलियांज़ (Allianz) ने अनुमान लगाया कि 2030 तक फ्रांस सबसे ज्यादा प्रभावित देश होगा, जिसे गर्मी की वजह से 240 बिलियन डॉलर का नुकसान होगा. इसके बाद इटली को 147 बिलियन डॉलर, जर्मनी को 131 बिलियन डॉलर और आखिर में स्पेन को 120 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है. 2030 तक बहुत ज्यादा गर्मी यूरोप की सबसे बड़ी इकोनॉमीज से 638 बिलियन डॉलर का नुकसान कर सकती है.
यूरोप में हर साल एक लाख से ज्यादा मौतें होने का खतरा: WHO के अनुसार, यूरोपीय देशों में अगर तापमान बढ़ने से रोकने के लिए बड़े कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक हर साल गर्मी की वजह से 1,20,000 से ज्यादा लोगों की मौतें होने की संभावना है. क्योंकि, ज्यादा गर्मी साइलेंट किलर के रूप में काम करती है. आने वाले समय में यह तपिश जानलेवा हो सकती है और मौत का आंकड़ा लाखों के पार पहुंचा सकती है.
ये भी पढ़ें: देश के 50% जिलों में जल संकट का अलर्ट, वाटर स्ट्रेस की स्थिति GDP को 6% नुकसान का खतरा

