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क्यों लगती है रील देखने और बनाने की लत, कितनी खतरनाक है ये आदत?

सोशल मीडिया पर वायरल होने की चाह आज युवाओं को ऐसे अंधे दौड़ में ले जा रही है, जहां मंजिल नहीं, बस रेस है.

क्यों लगती है रील देखने और बनाने की लत
क्यों लगती है रील देखने और बनाने की लत (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : October 28, 2025 at 2:41 PM IST

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Updated : October 28, 2025 at 4:57 PM IST

8 Min Read
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शिमला: सोशल मीडिया का क्रेज आज हर वर्ग के लोगों में देखा जा रहा है. वायरल कंटेंट परोसने, लाइक, व्यूज की चाह आज युवाओं को ऐसी अंधी दौड़ में ले जा रही है, जिसका कोई अंत नहीं है. सोशल मीडिया पर कंटेंट के लिए कई बार लोग अपनी जान तक दांव पर लगा दे रहे हैं. ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से सामने आया है, जहां रील बनाते हुए एक युवक की दर्दनाक मौत हो गई.

रील का जुनून या रील की लत?

कोई रील बना रहा है तो कोई लगातार रील देखने के लिए फोन को स्क्रॉल कर रहा है. इससे लोग मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं. सबसे ज्यादा बुरा असर रील और दूसरे प्रकार का कंटेंट बनाने वालों पर पड़ रहा है. कंटेंट बनाने के लिए किसी भी हद तक जाना, लाइक, व्यूज काउंट करना, रीच कम आना, वीडियो या रील में नेगिटिव कमेंट का आना ऐसे कई तरह के कारण हैं जो अवसाद का कारण बन रहे हैं. सोशल मीडिया के इस मकड़जाल में युवा बुरी तरह से ट्रैप हो चुके हैं. हर उम्र का व्यक्ति चाहे स्कूल का बच्चा हो, कॉलेज का स्टूडेंट, या दफ्तर जाने वाला युवा सबको रील बनाना पसंद है कुछ लोग रचनात्मक कंटेंट बनाते हैं, लेकिन बहुत से लोग वायरल होने के नाम पर ऐसे खतरे मोल ले लेते हैं, जिनकी कीमत जान से चुकानी पड़ती है. साइकोलॉजिस्ट डॉ. सुरेन शर्मा बताते हैं कि 'मेरे पास कई ऐसे युवा आते हैं जो कहते हैं कि अगर उनकी रील पर कम लाइक्स आते हैं तो उन्हें बेचैनी होती है, गुस्सा आता है, और वो खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं. ये स्थिति धीरे-धीरे डोपामिन एडिक्शन में बदल जाती है.'

डोपामिन क्या है और यह कैसे असर डालता है?

रील और लाइक्स का खेल हमें कैसे डोपामिन का एडिक्शन बना देता है इसके बारे में इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज में साइकियाट्रिस्ट डॉ. दिनेश ने बताया कि 'डोपामिन दिमाग का एक केमिकल है जो खुशी और संतोष से जुड़ा होता है. जब भी कोई हमारी रील को लाइक करता है या हमें फॉलो करता है, तो हमारे दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जिससे हमें अच्छा महसूस होता है. हर नोटिफिकेशन, हर लाइक, हर नया फॉलोअर हमारे दिमाग को छोटा-सा रिवॉर्ड देता है. ये छोटा रिवॉर्ड बार-बार मिलने से हमारा दिमाग उसी की तलाश में रहने लगता है. यही वजह है कि लोग बार-बार फोन चेक करते हैं, रील बनाते हैं, और वायरल होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. ठीक ऐसा ही रील्स देखने वालों के साथ भी होता है, क्योंकि रील्स देखने से भी डोपामिन रिलिज होता है और इंसान लगातार रील्स देखता चला जाता है और इसके ट्रैप में फंसा जाता है.'

क्या रील बनाना भी एक तरह का नशा है?

अगर कोई चीज आपको बार-बार करने का मन करे, और उसे न करने पर बेचैनी या गुस्सा महसूस हो तो वह लत (addiction) मानी जाती है. रील्स भी अब उसी कैटेगरी में आ रही हैं. डॉ. सुरेन शर्मा कहते हैं कि 'रील बनाना या देखना आज एक डिजिटल नशा बन चुका है. जैसे शराब या सिगरेट के बाद राहत महसूस होती है, वैसे ही कुछ लोगों को रील बनाने या देखने के बाद राहत महसूस होती है, लेकिन यह राहत कुछ समय की होती है. फिर वही बेचैनी लौट आती है. इससे मानसिक परेशानियां शुरू होती हैं और टाइम के साथ साथ आपके शरीर का नुकसान होता है, कुछ लोगों को परामर्श के लिए मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ता है और फिर आपके पैसों का भी नुकसान होता है.'

ADDICTION OF REELS AND SOCIAL MEDIA
सोशल मीडिया के ट्रैप में क्यों फंस रहे लोग (ETV Bharat GFX)

Gen Z सबसे ज़्यादा क्यों फंसी है इस जाल में?

Gen Z यानी आज की युवा पीढ़ी का बचपन मोबाइल और इंटरनेट के साथ बीता है. यह वो पीढ़ी है जिसने किताबों से ज़्यादा स्क्रीन देखी है. डॉ. दिनेश बताते हैं कि 'Gen Z के लिए सोशल मीडिया पहचान का जरिया बन चुका है, जब उन्हें दूसरों से तारीफ या ध्यान नहीं मिलता, तो आत्मसम्मान पर असर पड़ता है. उन्हें लगता है कि अगर लाइक्स नहीं आए, तो उनकी वैल्यू कम है. दरअसल, यह पीढ़ी डिजिटल दुनिया में वर्चुअल वैलिडेशन पर निर्भर हो चुकी है यानी दूसरों की राय से खुद को आंकना. हर लाइक, हर व्यू अब एक मिनी रिवॉर्ड सिस्टम है जितने ज्यादा लाइक्स, उतनी ज्यादा खुशी, लेकिन जब लाइक्स या व्यूज कम आते हैं, तो व्यक्ति को लगता है कि वो फेल हो गया है. यही मानसिक स्थिति एंग्जायटी (चिंता) और डिप्रेशन तक ले जा सकती है.'

ADDICTION OF REELS AND SOCIAL MEDIA
क्या है समाधान? (ETV Bharat GFX)

डॉ. सुरेन बताते है कि 'एक 19 साल की छात्रा मेरे पास परामर्श के लिए आई थी. उसे भी रील्स बनाने का क्रेज है. इस वजह से पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता था. रोज रील डालने की आदत थी अगर 1000 से कम व्यू आते तो पूरे दिन परेशानी रहती थी और चिड़चिड़ापन, गुस्सा रहता था. ये एक गंभीर स्थिति है. इस स्थिति में मनोचिकित्सक से परामर्श जरूरी है, ताकि ये लत छूट सके.' डॉ सुरने बताते हैं कि रील कल्चर का दिमाग पर क्या असर पड़ता है-

  • नींद पर असर: देर रात तक रील बनाना या स्क्रॉल करना नींद की अवधि को कम करता है.
  • एकाग्रता में कमी: लगातार स्क्रीन देखने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है.
  • स्वयं की तुलना: दूसरों की लाइफ देखकर अपने प्रति असंतोष बढ़ता है.
  • मानसिक थकान और तनाव: बार-बार असफल रील्स बनाने से आत्मविश्वास गिरता है.
  • रिश्तों में दूरी: रील के चक्कर में परिवार और दोस्त पीछे छूट जाते हैं.

सोशल मीडिया के ट्रैप में क्यों फंस रहे लोग

लोग क्यों सोशल मीडिया के ट्रैप में फंस रहे हैं इसके बारे में डॉ. सुरेन कहते हैं 'यह सिर्फ यूजर्स की गलती नहीं है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे डिज़ाइन किए गए हैं कि हम ज्यादा समय वहीं बिताएं. यानी, जितनी देर आप स्क्रॉल करते हैं, उतना ही ज़्यादा प्लेटफॉर्म को फायदा, लेकिन इससे आपका मानसिक संतुलन बिगड़ता जाता है. सोशल मीडिया बुरा नहीं है, लेकिन जब यह हमारे व्यवहार और सोच को कंट्रोल करने लगे, तो खतरा है. हमें रील्स बनानी चाहिए, लेकिन रील्स के लिए नहीं जीना चाहिए.'

क्या है समाधान?
1. डिजिटल डिटॉक्स ज़रूरी है
हर दिन कम से कम 1 घंटा नो-स्क्रीन टाइम रखें.
सोने से पहले और सुबह उठते ही मोबाइल न छुएं.

2. ऑफलाइन एक्टिविटीज़ बढ़ाएं
वॉक, म्यूज़िक, बुक रीडिंग या स्पोर्ट्स दिमाग को रिफ्रेश करते हैं.

3. पैरेंट्स की भूमिका
बच्चों को रील्स पर कंटेंट बनाने की आज़ादी दें, लेकिन सुरक्षा और संतुलन पर नजर रखें.

4. डिजिटल एजुकेशन स्कूलों में शामिल हो
बच्चों को सिखाया जाए कि लाइक से ज़्यादा जरूरी है लाइफ.

5. प्रोफेशनल मदद लें
अगर किसी को रील या सोशल मीडिया से दूर रहना मुश्किल लग रहा है, तो मनोचिकित्सक या काउंसलर से मिलना चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार धनंजय शर्मा ने कहते हैं कि 'रील्स की दुनिया में हर कोई मुस्कुरा रहा होता है, लेकिन कैमरे के पीछे बहुत लोग तनाव, असुरक्षा और अकेलेपन से जूझ रहे होते हैं. एक पल की मुस्कान, एक फिल्टर की खूबसूरती, और एक बैकग्राउंड सॉन्ग, ये सब मिलकर एक झूठी परफेक्शन बनाते हैं, और जब हमारी असल जिंदगी वैसी नहीं होती, तो हम खुद से नाखुश हो जाते हैं. सबसे बड़ा कारण पैसा है. सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएटर्स को मिलने वाला पैसा है. कुछ कंटेंटे किएटर्स सोशल मीडिया पर अपनी शानों शौकत की जिंदगी और लैविस लाइफ दिखाते हैं. बड़ी बड़ी गाड़ियां और बंगले दिखाते हैं. इसी को देखकर उनके फॉलोअर्स भी उनसे प्रभावित हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर पैसा कमाने और उनकी तरह लाइफ स्टाइल जीने के चक्कर में किसी भी हद तक जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें कम समय में फेम चाहिए. सोशल मीडिया से आने वाला पैसा भी लोगों को इस तरफ खींच रहा है. हालांकि पैसा कमाना बुरी बात नहीं है, लेकिन इसके लिए आपनी जान को जोखिम में डालना सही नहीं. इसके अलावा सोशल मीडिया पर लगातार काम करने के बाद भी कामयाबी न मिलने मानसिक विकार का प्रमुख कारण है.'

डॉ. दिनेश की चेतावनी 'आज जो बच्चे रील बना रहे हैं, वही कल एंग्जायटी और डिप्रेशन से जूझ सकते हैं. हमें अभी से उन्हें संतुलन सिखाना होगा. मोबाइल को टूल बनाएं, लाइफलाइन नहीं. सोशल मीडिया पर वायरल होने की चाह आज युवाओं को ऐसे अंधे दौड़ में ले जा रही है, जहां मंजिल नहीं है बस लाइक्स, व्यूज और फेम की रेस है.'

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Last Updated : October 28, 2025 at 4:57 PM IST