EXPLAINER: कपल्स को IVF ट्रीटमेंट के बारे में कब सोचना चाहिए? लिपस्टिक, शैम्पू और हेयर कलर भी इनफर्टिलिटी का बन सकता है कारण, डॉक्टर से जानिए कैसे?
डॉ. फिरोजा पारिख का कहना है कि बहुत से लोगों को IVF की सफलता दर पर शक है. आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि...

Published : July 24, 2026 at 2:31 PM IST
- लेखक: स्नेहा भारती
कोई कितना भी पढ़ा-लिखा, सफल या काबिल क्यों न हो, हर कोई अपने जीवन में मम्मी-पापा शब्द सुनना चाहता है. माता-पिता बनने का एहसास दुनिया के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक है. हालांकि, कई जोड़े विभिन्न कारणों (बदलती लाइफस्टाइल, हाई-रेडिएशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और शादी में देरी) के कारण गर्भधारण करने में असमर्थ हैं. जब कोई जोड़ा स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असमर्थ होता है, तो यह उनके लिए भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और समाज में हो रहे बदलावों के कारण आज ऐसे कई तरीके हैं जिनसे माता-पिता बनने के सपने को साकार किया जा सकता है. इनमें से एक है आईवीएफ.
आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) एक चिकित्सा प्रक्रिया है जो ऐसे जोड़ों के सपनों को हकीकत में बदल देती है, जिससे कई लोग माता-पिता बन पाते हैं. आइए सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में वेल वुमेन सेंटर विभाग की निदेशक हैं और प्रसिद्ध प्रसूति, स्त्री रोग और अग्रणी आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. फिरोजा पारिख से जानते हैं कि आईवीएफ क्या है और यह कैसे काम करता है और दम्पत्तियों को आईवीएफ उपचार पर कब विचार करना चाहिए?
निःसंतान दंपत्तियों के लिए वरदान है आईवीएफ
डॉ. फिरोजा पारिख का कहना है कि आईवीएफ उन दंपत्तियों के लिए वरदान माना जाता है जो शादी के कई साल बाद भी निःसंतान रहते हैं, उनका कहना है कि इससे बांझपन से जुड़ी समस्याएं कम हो जाती हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि आधुनिक आईवीएफ प्रौद्योगिकियों के आगमन के कारण, इस प्रक्रिया को चुनने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है. प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति का सम्मान करने के लिए हर साल 25 जुलाई को विश्व आईवीएफ दिवस मनाया जाता है.
आईवीएफ क्या है और यह कैसे काम करता है?
डॉ. फिरोजा पारिख का कहना है कि इन विट्रो फर्टिलाइजेशन, जिसे IVF भी कहा जाता है, कई प्रक्रियाओं का एक जटिल क्रम है जिससे गर्भधारण हो सकता है. यह बांझपन का इलाज है, बांझपन वह स्थिति है जिसमें ज्यादातर जोड़े कम से कम एक साल तक कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाते हैं. IVF का इस्तेमाल बच्चे में आनुवंशिक समस्याओं के ट्रांसमिशन को रोकने के लिए भी किया जा सकता है.
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन के दौरान, ओवरी से मैच्योर अंडे इकट्ठा किए जाते हैं और लैब में स्पर्म से फर्टिलाइज किए जाते हैं. फिर, एक या ज्यादा फर्टिलाइज्ड एग्स (जिन्हें एम्ब्रियो कहते हैं) को यूट्रस में रखने का प्रोसेस किया जाता है, जहां बच्चे डेवलप होते हैं. एक पूरे IVF साइकिल में लगभग 2 से 3 हफ्ते लगते हैं. कभी-कभी, इन स्टेप्स को अलग-अलग स्टेज में बांटा जाता है, और प्रोसेस में ज्यादा समय लग सकता है.
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का सबसे असरदार तरीका है जिसमें एग्स या एम्ब्रियो और स्पर्म को हैंडल किया जाता है. कुल मिलाकर, ट्रीटमेंट के इस ग्रुप को असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता है. IVF कपल के अपने एग्स और स्पर्म का इस्तेमाल करके किया जा सकता है, या इसमें किसी जाने-पहचाने या अनजान डोनर के एग्स, स्पर्म या एम्ब्रियो शामिल हो सकते हैं. कुछ मामलों में, एक जेस्टेशनल कैरियर (जिसके यूट्रस में एम्ब्रियो इम्प्लांट किया जाता है) का इस्तेमाल किया जा सकता है.
IVF से हेल्दी बच्चा होने की संभावना कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे आपकी उम्र और इनफर्टिलिटी का कारण. इसके अलावा, IVF में ऐसे प्रोसीजर होते हैं जिनमें समय लगता है, वे महंगे होते हैं और उनमें ज्यादा चीर-फाड़ होती. अगर यूट्रस में एक से ज्यादा एम्ब्रियो रखे जाते हैं, तो प्रेग्नेंसी में एक से ज्यादा बच्चे हो सकते हैं, इसे मल्टीपल प्रेग्नेंसी कहते हैं.

दम्पत्तियों को आईवीएफ उपचार पर कब विचार करना चाहिए? सही समय क्या है
डॉ. फिरोजा पारिख सलाह देती हैं कि जिन कम उम्र की महिलाओं को कंसीव करने में दिक्कत हो रही है, उन्हें कुछ समय इंतजार करना चाहिए, क्योंकि उनमें एग काउंट ज्यादा होता है. हालांकि, ज्यादा उम्र की महिलाओं को IVF के बारे में जरूर सोचना चाहिए, क्योंकि उम्र के साथ एग की संख्या कम हो जाती है. अगर कोई कपल लगभग एक साल से कोशिश कर रहा है और नाकाम रहा है (खासकर अगर महिला 35 साल से कम उम्र की है) तो उन्हें आम तौर पर पहले मेडिकल जांच करवानी चाहिए और IVF के बारे में तभी सोचना चाहिए जब कोई प्रॉब्लम पता चले. हालांकि, अगर महिला 35 साल से ज्यादा की है, तो उसे IVF के बारे में जरूर सलाह लेनी चाहिए. इसके अलावा, अगर फैलोपियन ट्यूब ब्लॉक या बहुत ज्यादा डैमेज हैं, एंडोमेट्रियोसिस, इर्रेगुलर पीरियड्स, या ओव्यूलेशन की दिक्कतें हैं, तो IVF के बारे में जरूर सोचना चाहिए. इसके अलावा, जब पुरुषों में स्पर्म काउंट बहुत कम होता है या स्पर्म मोटिलिटी खराब होती है, तो डॉक्टर अक्सर ICSI के साथ IVF की सलाह देते हैं. ऐसे भी मामले होते हैं जहां सभी टेस्ट रिजल्ट नॉर्मल होते हैं, फिर भी प्रेग्नेंसी नहीं होती है. तो उन कप्लस को भी IVF के बारे में विचार करना चाहिए.

IVF प्रोसेस का सक्सेस रेट क्या है?
IVF प्रोसेस असल में नेचुरल कंसीवेशन की नकल या कॉपी करता है. आज तक, दुनिया भर में IVF से 13 मिलियन बच्चे पैदा हुए हैं. डॉ. फिरोजा पारिख कहती हैं कि सक्सेस रेट कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे, सक्सेस की संभावना तब ज्यादा होती है जब मेल पार्टनर के स्पर्म पैरामीटर अच्छे हों और फीमेल पार्टनर कम उम्र की हो. इसके उलट, फैलोपियन ट्यूब में दिक्कतें या एबनॉर्मलिटीज सक्सेस रेट को कम कर सकती हैं. फाइब्रॉएड या एंडोमेट्रियोसिस जैसी कंडीशन भी सक्सेस की संभावना को कम कर सकती हैं. इसके अलावा, देश में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है, भारत एक ऐसा देश जिसे अक्सर डायबिटीज कैपिटल कहा जाता है. इसलिए, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, या इम्यूनोलॉजिकल प्रॉब्लम होने से सक्सेस रेट पर बुरा असर पड़ सकता है. डॉ. फिरोजा पारिख IVF के बारे में सोच रही महिलाओं को सलाह देती हैं कि वे पहले अपनी पूरी हेल्थ की स्थिति को समझें, किसी भी मौजूदा कंडीशन के लिए जरूरी ट्रीटमेंट करवाएं, और उसके बाद ही IVF प्रोसेस शुरू करें, इस तरीके से सक्सेसफुल नतीजे की संभावना बढ़ जाती है.
क्या कम एग काउंट वाली महिलाएं IVF करवा सकती हैं?
डॉ. फिरोजा पारिख कहती हैं कि हां, कम एग काउंट वाली महिलाएं इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) करवा सकती हैं. एग काउंट कम होने का मतलब है कि आपकी ओवरीज में कम एग बचे हैं और वे स्टैंडर्ड फर्टिलिटी दवाओं पर कम असरदार तरीके से रिस्पॉन्स दे सकती हैं. हालांकि, कम क्वांटिटी का मतलब यह नहीं है कि जीरो सक्सेस है. IVF में, क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी मायने रखती है, और एक सफल प्रेग्नेंसी के लिए सिर्फ एक हेल्दी एम्ब्रियो की जरूरत होती है.
डॉ. फिरोजा पारिख का कहना है कि आजकल कम उम्र की महिलाओं में भी अंडों की संख्या कम हो रही है, जिसकी कई वजहें हैं, जिनमें भारत और कई विकासशील देशों में वायु प्रदूषण भी शामिल है. यह समस्या स्पर्म पर असर डालती है और महिलाओं में अंडों की संख्या में कमी का कारण भी बनती है.
लिपस्टिक, शैम्पू और हेयर कलर के इस्तेमाल में बरते सावधानी
इसके साथ ही डॉ. फिरोजा पारिख एंडोक्राइन को नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल्स के बारे में एक जरूरी बात भी बताती हैं, उनका कहना है कि एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स जो लिपस्टिक, शैम्पू और हेयर कलर जैसे प्रोडक्ट्स में पाए जाते हैं, जो बहुत खतरनाक होते हैं. वह इन्हें इस्तेमाल न करने की सलाह देती हैं क्योंकि ये एग काउंट कम करते हैं, इन प्रोडक्ट्स में अक्सर प्लास्टिसाइजर, बिस्फेनॉल और थैलियम एसीटेट जैसे सब्सटेंस होते हैं, जो बहुत खतरनाक होते हैं. ये केमिकल्स पुरुषों में स्पर्म और महिलाओं में एग से चिपक जाते हैं, जिससे कपल्स नेचुरली कंसीव नहीं कर पाते या, दूसरे शब्दों में, इनफर्टिलिटी में योगदान देते हैं.
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी हेल्थ जानकारी और सुझाव सिर्फ आपकी समझ के लिए हैं. यह जानकारी साइंटिफिक रिसर्च, स्टडीज और मेडिकल और हेल्थ एक्सपर्ट्स की सलाह के आधार पर दी जा रही है. हालांकि, इन टिप्स को फॉलो करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लेना सबसे अच्छा है.)

