बिना दवाओं के दर्द से राहत! आयुर्वेद की ‘कपिंग थेरेपी’ बनी लोगों की नई उम्मीद
आयुर्वेद की प्राचीन पद्धति का आधुनिक तरीके से इस्तेमाल कर रोगियों का किया जा रहा इलाज.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 13, 2026 at 5:38 PM IST
|Updated : February 14, 2026 at 11:34 AM IST
सिरमौर: बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण कमर, घुटनों, मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द आज एक आम समस्या बन चुका है. ऐसे दौर में आयुर्वेद की प्राचीन रक्तमोक्षण पद्धति ‘अलाबू चिकित्सा’ (कपिंग थेरेपी) हिमाचल प्रदेश में एक प्रभावी इलाज विकल्प के रूप में सामने आ रही है. आधुनिक उपकरणों और सख्त स्वच्छता मानकों के साथ अपनाई जा रही यह चिकित्सा बिना दवाई और बिना साइड इफेक्ट के दर्द प्रबंधन में नई उम्मीद जगा रही है. जिला सिरमौर में यह पद्धति दर्द से जूझ रहे लोगों के लिए राहत का मजबूत माध्यम बनती दिख रही है.
क्या है कपिंग थेरेपी ?
आयुष अस्पताल नाहन के आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर डॉ. जयदीप ने बताया कि कपिंग थेरेपी आयुर्वेद में वर्णित एक प्राचीन रक्तमोक्षण तकनीक है, जिसका उद्देश्य शरीर में जमा दूषित दोष एवं रक्त को बाहर निकालकर दर्द और सूजन को कम करना है. जिसे आज आधुनिक तकनीक के साथ अपनाया जा रहा है. इसको लेकर ईटीवी भारत संवाददाता ने जिला सिरमौर के वरिष्ठ आयुर्वेदिक चिकित्सकों और इससे आराम पाने वाले मरीजों से बातचीत कर इस प्राचीन पद्धति के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की.
क्या है अलाबू ?
जिला आयुष अधिकारी सिरमौर डॉ. इंदु शर्मा ने बताया कि प्राचीन काल में कपिंग थेरेपी पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों से की जाती थी. उस समय अलाबू यानी सूखी लौकी के आकार के प्राकृतिक यंत्र या श्रृंगी (जानवर के सींग) का उपयोग कर वैक्यूम बनाया जाता था. आग या गर्म विधि से अंदर की हवा निकालकर शरीर पर अलाबू लगाया जाता था, जिससे दूषित रक्त और दोष बाहर निकलते थे.
दो तरह की होती है कपिंग थेरेपी
सिरमौर के नाहन स्थित जिला आयुष अस्पताल में तैनात आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर डॉ. जयदीप ने बताया कि कपिंग थेरेपी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है-
- शुष्क अलाबू
- गीली अलाबू
- शुष्क अलाबू चिकित्सा में कप के जरिए प्रभावित स्थान पर वैक्यूम बनाया जाता है, जिससे उस हिस्से में रक्त संचार बढ़ता है. इसके प्रभाव स्वरूप ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त उस क्षेत्र तक पहुंचता है और सूजन एवं दर्द पैदा करने वाले तत्व बाहर निकल जाते हैं.
- गीली अलाबू चिकित्सा में हल्के-हल्के प्रच्छान यानी छोटे चीरे/नीडल प्रीक लगाकर कपिंग की जाती है. इस प्रक्रिया में वैक्यूम बनने से दूषित और जमा हुआ रक्त बाहर निकलता है, जिससे सूजन कम होती है और दर्द में राहत मिलती है.

डॉ. जयदीप ने बताया कि इस दौरान रोगी के रक्तचाप और सामान्य स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है. अलाबू चिकित्सा से पहले रोगी की पूरी काउंसलिंग की जाती है. सभी उपकरणों को पूर्ण रूप से स्टरलाइज कर स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण में उपचार किया जाता है.
"जिला सिरमौर में कपिंग थेरेपी से रोगियों को दर्द में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रहा है. यह चिकित्सा विशेष रूप से सायटिका, ऑस्टियोआर्थराइटिस, घुटनों, कमर, पैरों, जोड़ों एवं मांसपेशियों की सूजन और दर्द जैसी समस्याओं में काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है. कई रोगियों में कुछ ही सिटिंग के बाद दर्द में स्पष्ट राहत महसूस की गई है." - डॉ. जयदीप, AMO, जिला आयुष अस्पताल नाहन
अस्पतालों समेत सभी आयुष स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधा
जिला सिरमौर की आयुष अधिकारी डॉ. इंदु शर्मा ने बताया कि सिरमौर जिले में नाहन और पांवटा साहिब आयुष अस्पतालों के अलावा जिले के सभी 87 आयुष स्वास्थ्य केंद्रों में कई आयुर्वेदिक प्रोसीजर किए जा रहे हैं. इनमें अलाबू चिकित्सा यानी कपिंग थेरेपी एक बेहद प्रभावी उपचार पद्धति है. यह चिकित्सा आयुर्वेदिक ग्रंथों में अलाबू और श्रृंगी नाम से वर्णित है. हालांकि आधुनिक कप्स के प्रयोग से इसका स्वरूप थोड़ा बदला है, लेकिन इसकी उपयोगिता और प्रभाव आज भी बना हुआ है. जिले के आयुष चिकित्सकों को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है और सभी आयुष स्वास्थ्य संस्थानों में यह सुविधा नियमित रूप से दी जा रही है.

जिला आयुष अधिकारी का अनुभव बना उदाहरण
जिला आयुष अधिकारी सिरमौर डॉ. इंदु शर्मा ने कपिंग थेरेपी को लेकर अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया. उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले एक आयुष स्वास्थ्य केंद्र के विजिट के दौरान अत्यधिक चढ़ाई चढ़ने से उनकी टांगों में अचानक समस्या आ गई और घुटना मोड़ना भी मुश्किल हो गया था. दर्द काफी ज्यादा था. डॉ. शर्मा ने बताया कि उन्होंने एक भी पेनकिलर नहीं ली, सिर्फ तीन सिटिंग कपिंग थेरेपी करवाई और अब वह पूरी तरह ठीक हैं. इसके बाद उन्हें किसी भी दवा की जरूरत महसूस नहीं हुई.
"आज की जीवनशैली के कारण शरीर में विभिन्न प्रकार के दर्द आम हो गए हैं. अगर कोई व्यक्ति टांगों, कमर, घुटनों या अन्य शारीरिक दर्द से परेशान है, तो वह अपने नजदीकी आयुष अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में जाकर इस चिकित्सा का लाभ उठा सकता है." - डॉ. इंदु शर्मा, जिला आयुष अधिकारी, सिरमौर
बुजुर्ग महिला मरीज को 3 सिटिंग में मिली राहत
नाहन के बड़ा चौक निवासी 70 वर्षीय कुसुम ने बताया कि उन्हें लंबे समय से कमर में तेज दर्द था. उन्होंने कई जगह इलाज करवाया, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला. इसके बाद वह आयुष अस्पताल नाहन में डॉ. जयदीप के पास पहुंचीं. जांच के बाद उन्हें कपिंग थेरेपी की सलाह दी गई. महिला मरीज के अनुसार पहली बार कपिंग के बाद ही उन्हें काफी राहत महसूस हुई. 15 दिन बाद दोबारा कपिंग करवाई गई, जिससे और अधिक आराम मिला. तीन बार कपिंग करवाने के बाद अब उनका दर्द समाप्त हो गया है और वह ठीक से चल-फिर पा रही हैं.
अब आधुनिक रूप में हो रही यह चिकित्सा
वर्तमान समय में कपिंग थेरेपी को आधुनिक तकनीक और स्वच्छता मानकों के साथ अपनाया जा रहा है. अब प्राकृतिक यंत्रों या श्रृंगी की जगह विशेष मेडिकल-ग्रेड कप्स का उपयोग किया जाता है. सभी उपकरण पूरी तरह स्टरलाइज किए जाते हैं और आधुनिक प्रशिक्षण प्राप्त आयुष डॉक्टर, रोगी की पूरी जांच और काउंसलिंग के बाद ही यह प्रक्रिया करते हैं. जिला सिरमौर में कपिंग थेरेपी यह संदेश दे रही हैं कि आयुर्वेद की प्राचीन उपचार पद्धतियां आज भी आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं में प्रभावी साबित हो रही हैं. बिना दवाई और बिना किसी साइड इफेक्ट के दर्द से राहत देने वाली यह चिकित्सा लोगों को दोबारा सक्रिय और स्वस्थ जीवन की ओर लौटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

