धान के कटोरे छत्तीसगढ़ में क्यों बढ़ रहे शुगर मरीज, जानिए लक्षण, कारण और एक्सपर्ट से निवारण
एक्सपर्ट कहते हैं, ''शुगर से लड़ने के लिए प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं. 1 आदमी को महीने में कम से कम 2 किलो दाल खाना चाहिए.''

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : May 2, 2026 at 6:19 PM IST
रायपुर: डायबिटीज को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा चल रही है, यह माना जा रहा है कि खान-पान और रहन-सहन डायबिटीज के बढ़ने का बहुत बड़ा कारण है. भोजन पद्धति भी डायबिटीज के बढ़ने का बड़ा कारण है. छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, यहां किसान धान ज्यादा पैदा करते हैं. चावल यहां ज्यादा खाया भी जाता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या चावल खाने से डायबिटीज बढ़ता है या रहन-सहन, भौगोलिक दशाएं और मिट्टी, डायबिटीज के बढ़ने का कारण हो सकती हैं. वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर कुलदीप सोलंकी कहते हैं, ''छत्तीसगढ़ में जिस तरह का वातावरण है, वह पूरे विश्व में सबसे बेहतर मिट्टी के तौर पर जाना जाता है. चावल खाने से डायबिटीज नहीं होता यह तय है.''
सवाल: छत्तीसगढ़ के किसान सबसे ज्यादा चावल पैदा करते हैं और खाते हैं. क्या चावल शुगर के लेवल को बढ़ाता है ?
जवाब: चावल सुपाच्य भोजन है, इससे शुगर नहीं बढ़ता है. मैं यह पूरे दावे के साथ कह रहा हूं, चावल खाने से शुगर नहीं बढ़ता. गेहूं पैदा करने वाली एक लॉबी के द्वारा यह बात फैलाई जा रही है. पैकेट बंद जितने भी फूड्स आते हैं, वह चावल से नहीं बनते हैं. वह सभी गेहूं से बनते है, इसलिए इस तरह का एक मिथक फैलाया गया है कि चावल खाने से शुगर बढ़ता है. इसका कोई साइंटिफिक बेसिस नहीं है. चावल और गेहूं को कंपेयर करेंगे तो गेहूं डायबिटीज वाले मरीजों के लिए ज्यादा हानिकारक है. क्योंकि चावल हमारा लोकल प्रोडक्ट है, यहां की जलवायु के लिए सर्वोत्तम खाद्य पदार्थ है. चावल को डायबिटीज से जोड़ना बेमानी है. मैं तो कहता हूं कि अच्छा चावल खाएं और नियमित चावल खाएं. चावल के साथ क्या होता है कि वह टेस्टी लगता है तो आदमी थोड़ा लिमिट से ज्यादा खा लेता है. ऐसे में आप ये सोच सकते हैं, फिर शुगर के बढ़ने का असली कारण क्या हो सकता है. दरअसल छत्तीसगढ़ में हमारा जो लोकल खानपान है, वह पिछले 100-150 सालों में बिगड़ गया है. बिगड़ ऐसे गया है कि एक संतुलित आहार में तीन कंपोनेंट होते हैं. कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन. प्रोटीन के लिए कहा जाता है कि प्रतिदिन बॉडी वेट के अनुसार 50 ग्राम प्रोटीन जरूरी है. 50 ग्राम प्रोटीन खाने के लिए आपको तीन कटोरी दाल हर दिन खाना पड़ेगा. दूध और दूध से बनी हुई विभिन्न वस्तुओं का सेवन बहुत कम होता जा रहा है. इसलिए लोगों का जो प्रोटीन इनटेक है, वह कम हो गया है. यह एक प्रमुख कारण हो सकता है अर्ली डायबिटीज होने का. डायबिटीज के साथ अलग-अलग जो मेटाबॉलिक सिंड्रोम की बीमारियां हैं, जैसे ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ये सब चीजें एक-एक कर बढ़ने लगती है.
सवाल: छत्तीसगढ़ की व्यवस्था जंगल आधारित थी. मेहनत थी लेकिन अब हम बदल रहे हैं, कहीं यह बड़े कारण तो नहीं बन रहे छत्तीसगढ़ में डायबिटीज के बढ़ने के ?
जवाब: मैं इसे अलग तरीके से देखता हूं. हमारी लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़ी है. छत्तीसगढ़ के एक औसत व्यक्ति की जो पहले लाइफ एक्सपेक्टेंसी 50 साल थी, वह आज 60 क्रॉस कर चुकी है. हमारी हेल्थ फैसेलिटीज भी अच्छी हुई है. हमारा रहन-सहन अच्छा हुआ है. पानी की गंदगी से होने वाली बीमारियां और इंफेक्शंसपहले खतरनाक साबित होते थे. गांव के गांव खाली हो जाते थे. अब ऐसा नहीं होता है. गैस्ट्रोएन्टराइटिस में सैकड़ों की संख्या में लोगों की जान चली जाती थी. अब हमारा रहन-सहन और खानपान बेहतर हुआ है. लेकिन जिस गति से होना चाहिए था, उस गति से नहीं हुआ. उसका यह कारण नहीं कि हमारे यहां के लोग गरीब हैं. छत्तीसगढ़ इज ए गोल्ड माइन. यहां तो चार फीट आप जमीन खोद देंगे तो आपको कीमती चीजें मिलने लगेंगी. छत्तीसगढ़ का पर कैपिटा इनकम भी बहुत अच्छा है और यहां के लोग संतोषी जीव हैं, उन्हें पैसे की कमी नहीं है. हम महंगा तो खा रहे हैं लेकिन अच्छा नहीं खा रहे.

हम अगर छोटे बच्चों की बात करें, तो हर व्यक्ति चाहता है कि उसको जो जीवन में नहीं मिला है, उसके बच्चों को वो मिले. इस चक्कर में माता-पिता जंक फूड बच्चों को दे रहे हैं. ये जंक फूड बच्चों की सेहत बिगाड़ रहे हैं. जंक फूड में सिर्फ और सिर्फ कार्बोहाइड्रेट और फैट होता है.जंक फूड के बजाय अगर हम पारंपरिक खाद्य पदार्थों में जाएं तो बच्चों के लिए बेहतर होगा. न्यूट्रीशन में अभी तक विश्व की सबसे बड़ी डिस्कवरी यह है कि वेजिटेरियन डाइट में चावल और दाल का कंबीनेशन भारत से आया है. चाहे वह नॉर्थ इंडिया हो या साउथ इंडिया. यहां पर दाल चावल बीमार आदमी को देते हैं. मूंग दाल की खिचड़ी सबके लिए बेस्ट होती है. साउथ इंडिया चले जाएंगे तो डोसा सांभर, इडली सांभर, सांभर वड़ा लोग खाते हैं. इसमें चावल और दाल का ही मिश्रण होता है. चावल में एसेंशियल अमीनो एसिड की कमी होती है. दाल में मिथोनीन की कमी होती है. लेकिन जब दोनों एक साथ मिल जाते हैं तो दोनों की कमी दूर हो जाती है और दोनों एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं. चावल और दाल का कंबीनेशन सही मात्रा में अगर कोई व्यक्ति ले रहा है, तो उसके लिए नॉनवेज डाइट की जरूरत नहीं है.
खाने के क्षेत्र में हमारे जो दुश्मन हैं, उन दुश्मनों को हमें पहचानना होगा. पैक्ड फूड, प्रिजर्व्ड फूड और केमिकल कलर्स के इस्तेमाल से बने फूड्स हमारे लिए खतरनाक हैं. हम इंडियंस जो नॉनवेज खा रहे हैं, वो हमारे लिए फायदेमंद कम और नुकसानदायक ज्यादा हैं. भारत में जिस तरह से नॉनवेज कुक किया जाता है, वो डेड फूड होता है. यही नॉनवेज जो विदेशों में अमेरिका में खाया जाता है, वो ब्वॉयल्ड कर खाते हैं. उसकी पौष्टिकता बनी रहती है. बेशक उबालकर खाना स्वाद के नजरिए से बेहतर नहीं होगा, लेकिन फायदेमंद होगा ये साबित हो चुका है. देर तक पकाने से उसके प्रोटीन और अमीनो एसिड जैसे बेसिक स्ट्रक्चर हमें फायदा नहीं नुकसान पहुंचाते हैं, वो डेड फूड साबित होते हैं.

सवाल: छत्तीसगढ़ में जो भौगोलिक संरचना है, उसमें बहुत सारी चीजों की पैदावार नहीं होती है, हम दूसरे भोजन ले लेते हैं. आर्थिक संरचना जिनकी मजबूत नहीं है, वह चावल और दूसरी चीजों पर निर्भर रहता है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या चावल खाने से शुगर बढ़ता है ?
जवाब: छत्तीसगढ़ का एक बड़ा भाग मैदानी एरिया है. यहां दाल और चने की खेती होती है. लोगों को जानकारी की कमी है. चना भी एक प्रकार से दाल है. यहां किसान मूंग की पैदावार भी करते हैं और उससे ज्यादा सोयाबीन की खेती करते हैं. एक सिंपल उपाये हमें ये करना चाहिए कि हम आटे में चना या सोयाबीन को मिलाकर रोटी खाएं. इससे जो प्रोटीन की मात्रा हमें चाहिए वो मिल जाएगी. 1 किलो चावल या गेहूं के आटे में हमें 200 ग्राम के आस पास सोयाबीन या चना मिला देना चाहिए. इससे हमारी जो प्रोटीन की जरूरत है, वो पूरी हो जाएगी. खासकर बच्चों में जो प्रोटीन की कमी होती है, वो दूर हो जाएगी. आजकल हमारे यहां बच्चे दूध नहीं पीते. ऐसे में उनको दूध से बने प्रोडक्ट दें, जैसे दही और पनीर. ये सारी चीजें जब बच्चों और यंगस्टर्स को मिलेंगी, तो वो मजबूत बनेंगे. मजबूत बनेंगे तो बीमारी उनके पास नहीं आएगी. आप अमीर हों, चाहे गरीब प्रोटीन की मात्रा बराबर लें. मूंगफली जरूर खाएं, ये काफी फायदेमंद होता है. मूंगफली और दाल के सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. मैं ये मानता हूं कि डायबिटीज एक लाइफस्टाइल डिजीज भी है. हमारी जो लाइफ स्टाइल है, उसमें वर्कआउट कम करते हैं, तनाव ज्यादा लेते हैं. छत्तीसगढ़ में एक बहुत बड़ी महामारी आ रही है, वह डायबिटीज से भी खतरनाक है, जिसका नाम है, लीवर डिजीज. लीवर डिजीज का कारण है शराब. शराब खपत में छत्तीसगढ़ काफी आगे है.
सवाल: शराब या नशा सभी डायबिटीज के कारणों में शामिल है क्या ?
जवाब: हां डायबिटीज का एक बड़ा कारण शराब और नशा है. ये हमारे पैंक्रियाज को प्रभावित करता है. पैंक्रियाज हमारे शरीर में बढ़ाने वाले डायबिटीज को 95%कंट्रोल करने का काम करता है, लेकिन अब ये समस्या दूसरी जगह शिफ्ट हो गई है. डोडनियम से 80% डायबिटीज अब कंट्रोल हो रहा है. लेकिन जब कोई व्यक्ति नशा करता है, शराब पीता है या फिर तंबाकू खाता है, तब डोडनियम का इनर लेयर उसको नुकसान पहुंचाने लगता है. जिसके कारण शुगर का इनफ्लक्स और कोलेस्ट्रॉल का इनफ्लक्स ब्लड में बढ़ जाता है. इसको एक स्टेज तक लीवर हैंडल करता है. पर जब लीवर कमजोर हो जाता है, तभी सीधे डायबिटीज और अन्य प्रकार की बीमारी, जिसमें कैंसर भी शामिल है, उसके लिए जिम्मेदार होता है. इसके साथ ही घर में उपयोग होने वाले बर्तन साफ करने के डिटर्जेंट से भी हमारे शरीर को नुकसान पहुंचता है. इसको ब्रिज डोडनियम बैरियर सिंड्रोम भी कहा जाता है. इसलिए हमें किसी भी फॉर्म में नशे का सेवन नहीं करना चाहिए, ये हमारे शरीर की आयु को काम करता है. अल्कोहल जो हमारे शरीर के अंदर जाता है, वह हमारे लाइफ का समय हमसे छीन लेता है.
सवाल: आजकल डायबिटीज छोटे बच्चों में डिटेक्ट हो रहा है, इसके क्या कारण हैं ?
जवाब: छोटे बच्चों में डायबिटीज के कारणों में एक तो जेनेटिक होता है. लेकिन दूसरा जो इसका इंर्पोटेंट पार्ट है, वह फूड इंडस्ट्रीज है, जो एक बड़ा रोल प्ले कर रही है. पैक्ड और प्रिजर्व्ड फूड डायबिटीज को बढ़ाने का काम करती है. इसलिए मैं इस तरह के फूड को डेड फूड कहता हूं. टूथ पेस्ट में भी जो प्रिजर्वेटिव्स होते हैं, वो जब ब्रश करते वक्त हमारे पेट में गलती से चले जाते हैं, तो वो हमारे लिवर और पैंक्रियाज को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. कुल मिलाकर फिजिकल एक्टिविटी ना करना भी एक बड़ा कारण है.
सवाल: पहले हम लोग टॉफी खाया करते थे, जो 5 से 10 पैसे की आती थी. अब बच्चे चॉकलेट खाते हैं, जिसे अच्छे से सजाकर बेचा जा रहा है. बच्चे उसे पाने के लिए जिद करते हैं और न मिले तो विरोध करते हैं, क्या ये भी एक बड़ा कारण है ?
जवाब: मैं कहना चाहूंगा कि यह जो हमारी सेंचुरी है, इसके पिछले 50 साल तो पैकेजिंग इंडस्ट्रीज के नाम हैं. सिंपल चीज को भी आप कलरफुल पैकेज करके अंदर मटेरियल कुछ भी ना हो, बेच देते हैं. पहले के बच्चों के पास नॉलेज कम था, लेकिन विवेक अधिक था. अब बच्चों के पास नॉलेज ज्यादा है, लेकिन विवेक नहीं है. विवेक कम होने से बच्चे चिड़चिड़े हो रहे हैं. बच्चों की पोलाइटनेश कम हो रही है. दूसरों की सुन नहीं रहे हैं. आजकल जो एड कैंपने चल रहा है, वो हमारी जिंदगी को तबाह कर रहा है. मीठे और चॉकलेट को लेकर एड बनाए जा रहे हैं. लेकिन मैं बताऊं कि लड्डू सबसे बेस्ट मीठा है, और फिर सफेद वाला रसगुल्ला जो छेने से बनता है. फर्स्ट हंड्रेड बेस्ट मीठे में भी चॉकलेट नहीं आएगा. चॉकलेट में एक तो प्रिजर्वेटिव होता है, दूसरा जब उसे बनाने की प्रक्रिया करते हैं तो उसमें कोको मिलाया जाता है. यूएस एफडीए ने यह छूट दी है कि 100 ग्राम चॉकलेट में कॉकरोच के पार्ट्स अलाउड हैं, जो पांच जिंदा कॉकरोच के बराबर होते हैं. तो बच्चा इसे जब खाता है और आप 1 साल के बच्चों को खिला कर यह सोच रहे हैं कि अपने बच्चों को बेस्ट दिया, तो आप गलत हैं. आपकी जानकारी की कमी है. इस वजह से भी लोगों में डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है. चॉकलेट की वजह से छोटे बच्चों में अस्थमा और एलर्जी की तकलीफ बढ़ रही है, इम्यूनिटी घट रही है. वेस्टर्न लाइफ की कॉपी हमें ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. हम अपने बेसिक से दूर हुए तो उसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ा.
सवाल: बच्चे जरूरत से ज्यादा डिजिटल गैजेट्स पर टाइम स्पेंड कर रहे हैं. डॉक्टर भी शुगर पेशेंट को कहते हैं,आप चिंता ज्यादा मत करिए नहीं तो शुगर बढ़ जाएगा. क्या वास्तव में इन बातों में सच्चाई है ?
जवाब: यह बहुत बड़ी सच्चाई है. तनाव मतलब कहीं तो आग लगी है. छोटी सी आग लगी है तो तनाव वह मिट्टी तेल है, जो हमारा ट्रीटमेंट है वह पानी है. अगर हम पानी और मिट्टी तेल साथ में डाल रहे हैं तो आग नहीं बुझेगी बल्कि और भड़केगी. तनाव वह मिट्टी तेल है, जो हर बीमारी को बढ़ाता है, उसके स्वरुप को बड़ा कर देता है. आज की डेट में यंगस्टर हों, चाहे सीनियर सिटीजन हों, सब लोग रील्स देख रहे हैं. अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक्टिव रहते हैं. दो से चार घंटा और कोई-कोई तो 8 घंटे तक इनका यूज कर रहे हैं. इससे शरीर में खास कर ब्रेन में जो केमिकल रिएक्शन हो रहे हैं, उससे उत्तेजना वाले केमिकल बढ़ रहे हैं. हम एडिकेट होते जा रहे हैं और यह जो बच्चे हैं, जो आज मोबाइल स्क्रीन को नहीं छोड़ रहे हैं, यह अगले 10 साल में नशे की गिरफ्त में होंगे. चाहे वह लड़की हो चाहे लड़का हो. इन मामलों में अभिभावकों में भी कमी देखी जा रही है.
आपके और हमारे जमाने में मदर ने बोल दिया बात फाइनल होती थी, पिताजी तक बात जाती ही नहीं थी, और गई भी तो पिताजी ने घूर कर देख लिया तो वहीं पर वो चेप्टर क्लोज हो जाता था. आजकल ऐसा नहीं है. बच्चे जिद्दी होते जा रहे हैं, माता पिता की बात नहीं सुनते. एक और बात जो ध्यान में रखने वाली है, वो ये कि माता-पिता आजकर बच्चों के दोस्त बनने लगे हैं. दोस्त बनते ही पेरेंट्स बच्चों की हर जिद को पूरी करने लगे हैं. माता पिता का डर खत्म होते ही बच्चे अपनी राह पर चल पड़ते हैं.
फिजिकल एक्टिविटी, फिजिकल वेलनेस, मेंटल वेलनेस को कंप्रोमाइज होते हम देख रहे हैं. मैं सब तरह के मरीजों को देखता हूं. मैंने ये गौर किया है कि शहरी मरीजों में फिजिकल एक्टिविटी, फिजिकल वेलनेस, मेंटल वेलनेस में कमी आती जा रही है. जबकि हमारा ग्रामीण क्षेत्र का बच्चा जो है, उसकी मुस्कुराहट अभी भी कायम है.
सवाल: ग्रामीण इलाकों में भी शुगर के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. क्या इसकी वजह अनियमित खान-पान और दैनिक दिनचर्या कारण है ?
जवाब: हमारे भीतर 48% जेनेटिक मैटेरियल है. बाकी इस शरीर में 52% माइक्रोऑर्गेनाइज्म है. ट्रिलियन माइक्रोऑर्गेनाइज्म जिसमें वायरओइट्स हैं, वायरस हैं बैक्टीरिया हैं, जो 99% अच्छे वाले हैं, और ये जेनेटिक मैटेरियल है. ये हेल्दी शरीर में मिलेगा. अगर किसी में बैड बैक्टीरिया जो पेट में रहते हैं 1 से 2% हो गया, जिसे हम माइक्रोबायोटा कहते हैं, वह बीमारी को जन्म देगा. यह माइक्रोबायोटा आते कहां से हैं. जमीन से जो हमारे पांच तत्व हैं, जिसमें भूमि उसका उपजाऊ होना माइक्रोबायोटा पर डिपेंड करता है. यही इंसान की फिजिक्स और नेचर को डिसाइड करता है. रेत और मिट्टी में डिफरेंस यह है कि अगर ऑर्गेनिक कंटेंट 2 परसेंट से कम है तो वह रेत जिससे आप बिल्डिंग बनाते हैं और अगर 2% से अधिक है तो वहां पर कुछ भी नहीं फलेगा फूलेगा. यूरोप और अमेरिका में 5 से 6% मिट्टी का ऑर्गेनिक कंटेंट होता है. लेकिन इंडिया में यह एवरेज है 9 से 10% और छत्तीसगढ़ में यह 13 से 14 परसेंट है. तो माइक्रोबायोटा या ऑर्गेनिक कंटेंट ऑफ स्वायल आदमी की सेहत, उसकी लोंगेविटी को उसकी मेंटल और फिजिकल हेल्थ को डिसाइड करता है. छत्तीसगढ़ में मिनरल्स के अलावा कई जगहों पर माइक्रोबायोटा काफी अच्छा है. दुनिया में अगर कोई अच्छी जगह है तो वह छत्तीसगढ़ की जमीन है. हमारी जो कृषि की पद्धति है और जो हमारा खान-पान है हमें उसमें थोड़ा बदलाव करने की जरूरत है. हमें प्रोटीन के कंटेंट को बढ़ाना होगा. प्रति व्यक्ति ढाई किलो दाल प्रति व्यक्ति के हिसाब से महीने में इस्तेमाल करना होगा. चना, दाल, मूंगफली यह सब एक प्रजाति के हैं इनका कंटेंट हमें खानपान में बढ़ाना चाहिए. इनके नियमित इस्तेमाल से हमारे बच्चों की हाइट हेल्थ अच्छी रहेगी, वह ओलंपिक में मेडल जीतने लायक हो जाएंगे.
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