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बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास के लिए खतरा, बोलने की क्षमता से लेकर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

सुरभि गुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि बच्चों में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल नींद की कमी, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत...

The Smartphone Childhood: Why Experts Are Worried About India's Youngest Users
बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास के लिए खतरा, बोलने की क्षमता से लेकर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर (GETTY IMAGES)
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By ETV Bharat Health Team

Published : June 22, 2026 at 7:55 PM IST

11 Min Read
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नई दिल्ली: भारत में स्वास्थ्य अधिकारियों ने बच्चों और युवाओं के बीच डिजिटल डिवाइस पर बढ़ती निर्भरता और स्क्रीन टाइम में हो रही बढ़ोतरी को लेकर गहरी चिंता जताई है. हाल ही में हुए एक आर्थिक सर्वेक्षण में डिजिटल लत को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़े संकट के तौर पर भी चिह्नित किया गया है. EY (अर्न्स्ट एंड यंग) की एक रिपोर्ट में पाया गया कि भारतीयों ने 2024 में अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए कुल मिलाकर लगभग 1.1 लाख करोड़ घंटे बिताए, जो औसतन रोजाना लगभग पांच घंटे है. इसमें से लगभग 70 फीसदी समय सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और गेम खेलने में बिताया गया. यह डेटा दिखाता है कि स्क्रीन का इस्तेमाल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कितना घुल-मिल गया है.

यह ट्रेंड खासकर बच्चों और किशोरों में साफ तौर पर देखा जा सकता है. शिक्षा विशेषज्ञ, हेल्थकेयर प्रोफेशनल और सरकारी अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि स्क्रीन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल युवाओं के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पर बुरा असर डाल सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं में स्क्रीन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल तनाव, डिप्रेशन, नींद न आने की समस्या और ध्यान लगाने की क्षमता में कमी से जुड़ा है. इसके अलावा, कम उम्र में गलत पोस्चर और मोटापे जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं.

छात्रों का ध्यान लगाने का समय कम होता जा रहा है
इस साल नेशनल काउंसिल ऑफ CBSE स्कूल्स की तरफ से पूरे देश में की गई एक स्टडी से स्कूली बच्चों की स्क्रीन की आदतों के बारे में चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. 6.3 लाख पार्टिसिपेंट्स के जवाबों के आधार पर, सर्वे में पाया गया कि 74 फीसदी CBSE स्टूडेंट्स पढ़ाई के अलावा दूसरी एक्टिविटीज के लिए रोजाना दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन पर बिताते हैं. चिंता की बात यह है कि 21 फीसदी स्टूडेंट्स स्क्रीन-बेस्ड एंटरटेनमेंट पर रोजाना चार घंटे से ज्यादा बिताते हैं. हाल की स्टडीज से पता चलता है कि 69 फीसदी टीचर्स और स्कूल हेड्स का मानना ​​है कि उनके स्टूडेंट्स के कॉन्संट्रेशन और फोकस करने की क्षमता में कमी आई है. इससे पता चलता है कि डिजिटल मीडिया के साथ बहुत ज्यादा जुड़ाव सीखने की प्रक्रिया पर बुरा असर डाल सकता है. इन स्टडीज के नतीजों ने टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल और बचपन के हेल्दी विकास के बीच बैलेंस बनाने पर बहस को और तेज कर दिया है.

The Smartphone Childhood: Why Experts Are Worried About India's Youngest Users
बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास के लिए खतरा, बोलने की क्षमता से लेकर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर (GETTY IMAGES)

कर्नाटक ने उठाया पहला कानूनी कदम
डिजिटल एडिक्शन और ऑनलाइन सेफ्टी को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, कर्नाटक भारत का पहला राज्य बन गया है जिसने मार्च 2026 तक 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर बैन लगाने की दिशा में कदम उठाए हैं. इस कदम से बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और एडिक्टिव ऑनलाइन कंटेंट के लंबे समय तक इस्तेमाल से बचाने के लिए सख्त नियम बनाने पर बहस शुरू हो गई है.

AIIMS की एक स्टडी में बड़ा खुलासा

AIIMS की हालिया रिसर्च और AIIMS रायपुर की एक मेटा-एनालिसिस से पता चला है कि कम उम्र में मोबाइल फोन या टेलीविन के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों में ऑटिज्म (ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर) और वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं. इस स्टडी ने भारत में बहुत छोटे बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसमें पाया गया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चे रोज़ाना औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन के सामने बिताते हैं, जबकि दो साल से कम उम्र के बच्चे औसतन 1.2 घंटे बिताते हैं, जबकि सलाह यह दी जाती है कि इस उम्र के बच्चों को स्क्रीन टाइम से पूरी तरह बचना चाहिए या इसे बहुत कम रखना चाहिए. AIIMS के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 18 महीने (डेढ़ साल) से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम पूरी तरह से 'जीरो' होना चाहिए.

डॉक्टरों ने बेबीसिटर के तौर पर स्क्रीन इस्तेमाल करने के खिलाफ चेतावनी दी है
बच्चों के डॉक्टरों के अनुसार, खाना खिलाते समय या बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें स्मार्टफोन देना माता-पिता की सबसे आम और गंभीर गलतियों में से एक है. ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) की हालिया स्टडी से पता चला है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चे दिन में औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन के सामने बिताते हैं, जो उनके विकास के लिए बहुत नुकसानदायक है.

इस बीच, शांति नर्सिंग होम के पीडियाट्रिशियन (बच्चों के डॉक्टर) डॉ. नरेश गुप्ता ने बताया कि कुछ साल पहले, माता-पिता अपने बच्चों को खांसी, बुखार या पेट की बीमारियों जैसी समस्याओं के लिए उनके पास लाते थे, लेकिन आज, ज्यादातर माता-पिता की मुख्य चिंता यह होती है कि वे अपने बच्चों को स्मार्टफोन की लत से कैसे बचाएं. क्योंकि, आज के समय में स्क्रिन ज्यादा देर तक देखने की लत के कारण बच्चों को आंखों पर जोर पड़ने, ध्यान न लगा पाने और नींद की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे यह स्वास्थ्य से जुड़ी एक बढ़ती हुई चिंता बन गई है.

बच्चों को खाना खाते समय कभी भी फोन न दें
उन्होंने बच्चों को खाना खाते समय स्मार्टफोन न देने की भी सलाह दी, क्योंकि इससे उनका ध्यान भटक सकता है. जानकारों का कहना है कि खाना खाते समय स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से बच्चों का ध्यान भटक सकता है और उन्हें यह पता नहीं चल पाता कि उन्हें कितनी भूख लगी है या उनका पेट भर गया है. इसलिए, उनकी उम्र के हिसाब से स्क्रीन टाइम सीमित रखें. आम तौर पर, दो साल से कम उम्र के बच्चों को बिल्कुल भी स्क्रीन नहीं दिखानी चाहिए. घर पर स्क्रीन-फ्री समय तय करें, खासकर खाना खाते समय और सोने से पहले. पढ़ने, कहानी सुनने-सुनाने, ड्रॉइंग करने, पजल सुलझाने और बाहर खेलने जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दें. पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल करें और आपका बच्चा ऑनलाइन जो कंटेंट देखता है, उस पर नजर रखें. भाषा और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आमने-सामने बातचीत और परिवार के साथ समय बिताने को प्रोत्साहित करें.

The Smartphone Childhood: Why Experts Are Worried About India's Youngest Users
बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के विकास के लिए खतरा, बोलने की क्षमता से लेकर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर (GETTY IMAGES)

बोलने की क्षमता में कमी

समर्थ चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के डायरेक्टर और बच्चों के डॉक्टर, डॉ. गणेश पाटिल ने बताया कि क्लिनिकल प्रैक्टिस में ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें अक्सर ऐसे मरीज मिलते हैं, खासकर, माता-पिता बच्चों को खाना खिलाते समय अक्सर उन्हें मोबाइल फोन दे देते हैं. छोटे बच्चों में स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल माता-पिता और बच्चे के बीच बातचीत को कम करता है और इससे नींद में परेशानी, ध्यान लगाने में दिक्कत और खाने की खराब आदतें जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कई बच्चे स्क्रीन न मिलने पर खाना खाने से मना कर देते हैं. स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से बोलने और भाषा के विकास में भी देरी हो सकती है. जानकारों का कहना है कि बच्चे मुख्य रूप से अपनी देखभाल करने वालों के साथ बातचीत करके बातचीत करने और सामाजिक कौशल सीखते हैं और सिर्फ स्क्रीन देखने से इसकी जगह नहीं ली जा सकती.

बचपन का शुरुआती विकास खतरे में
AIIMS दिल्ली में पीडियाट्रिक कंसल्टेंट और पूर्व सीनियर रेजिडेंट डॉ. राकेश बागड़ी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बचपन में बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम के दूरगामी नतीजे हो सकते हैं. उन्होंने ETV भारत को बताया कि इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस के अनुसार, दो से पांच साल के बच्चों को आदर्श रूप से हर दिन एक घंटे से कम स्क्रीन टाइम देना चाहिए. माता-पिता को कुल स्क्रीन टाइम को सीमित करने और हाई-क्वालिटी एजुकेशनल कंटेंट को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि हाल के सालों में तेजी से टेक्नोलॉजी अपनाने से बचपन के अनुभव बदल गए हैं

मस्तिष्क का विकास प्रभावित होता है
डॉ. बागड़ी ने कहा कि रिसर्च से पता चलता है कि बचपन में ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने से फिजिकल, कॉग्निटिव और सोशियो-इमोशनल डेवलपमेंट पर बुरा असर पड़ सकता है. इसे भाषा के विकास में कमी, कॉग्निटिव कामकाज में कमी, सोशल स्किल्स में कमी, मोटापा, नींद के पैटर्न में गड़बड़ी और कॉन्संट्रेशन की समस्याओं से जोड़ा गया है.

दिमाग के विकास के लिए लोगों से बातचीत जरूरी है
बच्चों के डॉक्टर डॉ. पिटिशन वशिष्ठ ने इस बात पर जोर दिया कि बचपन में हेल्दी दिमाग के विकास के लिए मतलब वाली बातचीत जरूरी है. उन्होंने ETV भारत को बताया कि बातचीत इंसान की एक बेसिक जरूरत है. एकतरफा बातचीत बड़ों के लिए भी नुकसानदायक हो सकती है, लेकिन यह छोटे बच्चों के लिए खास तौर पर चिंता की बात है, जिनका दिमाग मतलब वाले सोशल इंटरैक्शन, आपसी मेलजोल और देखभाल पर निर्भर करता है.

डॉ. वशिष्ठ के मुताबिक, आज के बच्चे आमने-सामने की बातचीत की कीमत पर स्मार्टफोन, टैबलेट, वीडियो गेम और सोशल मीडिया के संपर्क में आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने से भाषा सीखने, सोशल-इमोशनल डेवलपमेंट, ध्यान, नींद की क्वालिटी और साइकोलॉजिकल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है. जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे रोजमर्रा के कामों में शामिल हो रही है, माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के विकास को लेकर ज्यादा परेशान हो रहे हैं क्योंकि वे स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताते हैं.

साथ ही, उन्होंने WHO की गाइडलाइंस पर भी बात की, जिसमें 12 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन टाइम न देने, 12-24 महीने के बच्चों को स्क्रीन पर बैठे रहने और 2 से 4 साल के बच्चों को दिन में 1 घंटे से ज्यादा स्क्रीन न देखने की सलाह दी गई है.

(डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी हेल्थ जानकारी और सुझाव सिर्फ आपकी समझ के लिए हैं. यह जानकारी साइंटिफिक रिसर्च, स्टडीज और मेडिकल और हेल्थ एक्सपर्ट्स की सलाह के आधार पर दी जा रही है. हालांकि, इन टिप्स को फॉलो करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लेना सबसे अच्छा है.

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