पहाड़ के मेहनतकश लोगों को क्यों हो रही है डायबिटीज ? आंकड़े और वजह दोनों हैरान करने वाली
पहाड़ी राज्य होने के कारण हिमाचल के लोग शारीरिक श्रम भी करते हैं फिर भी हर दूसरे घर में डायबिटीक हैं. आखिर ऐसा क्यों?

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : May 1, 2026 at 3:50 PM IST
|Updated : May 1, 2026 at 4:20 PM IST
श्रेया शर्मा की रिपोर्ट
शिमला: आमतौर पर धारणा है कि पहाड़ों पर लोग शुद्ध आबोहवा के बीच सादा और कड़ी मेहनत वाला जीवन जीते हैं.पहाड़ों पर हर छोटे-बड़े काम के लिए पैदल चलना होता है, ऐसे में सवाल है कि पहाड़ों पर डायबिटीज (मधुमेह) जैसी बीमारी क्यों फैल रही है. क्योंकि एक्सपर्ट डॉक्टर हिमाचल जैसे राज्य में डायबिटीज को बीमारी नहीं महा-बीमारी बता चुके हैं.
'हिमाचल में डायबिटीज महा-बीमारी'
हिमाचल के आईजीएमसी अस्पताल के डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता (प्रोफेसर मेडिसिन) डायबिटीज के क्षेत्र में काफी अनुभव और शोध रहा है. वो बताते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में किसी बीमारी की व्यापकता (prevalence) 10% से अधिक हो जाती है, तो उसे बीमारी नहीं, बल्कि 'महा-बीमारी' (Epidemic) माना जाता है. हिमाचल प्रदेश बदकिस्मती से इस दायरे में आ चुका है. हिमाचल में आईसीएमआर (ICMR) की ओर से भी डायबिटीज को लेकर आंकड़े जुटाए गए थे और डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता उस टीम में थे. इन आंकड़ों के आधार पर यह समझने की कोशिश करेंगे कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में यह बीमारी इतनी तेजी से क्यों फैल रहा है.
मीठा नहीं खाते तो शुगर कैसे हो गई ?
यह एक आम धारणा है कि ज्यादा चीनी या मिठाई खाने से डायबिटीज होती है. डॉ. मोक्ता बताते हैं कि, उनके ओपीडी में अक्सर मरीज हैरान होकर पूछते हैं. "डॉक्टर साहब, मैं तो बहुत कम मीठा खाता हूं, फिर भी मुझे शुगर हो गई. ऐसा क्यों?" यह सवाल आज हिमाचल के हर दूसरे घर में गूंज रहा है. लोग शारीरिक श्रम भी करते हैं, मिठाई से परहेज भी करते हैं, फिर भी रिपोर्ट पॉजिटिव आती है.
इसकी गहराई में जाने के लिए हमें 2019 के आंकड़ों और हिमाचल की बदलती जीवनशैली (Lifestyle) को समझना होगा. डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता बताते हैं कि, "डायबिटीज का संबंध सिर्फ चीनी खाने से नहीं है, बल्कि हमारे शरीर में जाने वाले कुल कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी की खपत, तनाव और जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) के जटिल संतुलन से है."
हिमाचल के चौंकाने वाले आंकड़े
2019 में हिमाचल प्रदेश में पहली बार डायबिटीज को लेकर एक बड़ा और व्यवस्थित विश्लेषण किया गया. यह ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट था, जिसके चेयरमैन डॉ. जितेंद्र मोक्ता स्वयं थे और डॉ. रमेश इसके को-चेयरमैन थे. इस सर्वे से जो आंकड़े निकलकर सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक थे.

डायबिटीज की व्यापकता (Prevalence)
अखिल भारतीय (All India) औसत लगभग 11% है. हिमाचल प्रदेश में 14.5 फीसदी है, यानी हिमाचल में राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा लोग डायबिटीज की चपेट में हैं. वहीं, प्री-डायबिटीज (Pre-Diabetes) भी खतरे की घंटी बजा रहा है. यह वह अवस्था है, जहां शुगर लेवल सामान्य से अधिक होता है, लेकिन अभी टाइप 2 डायबिटीज के स्तर तक नहीं पहुंचा होता है. इसे डायबिटीज की पहली स्टेज कहते हैं. अखिल भारतीय औसत 14.5% है, जबकि हिमाचल प्रदेश में 17% है.
यदि हम डायबिटीज (14.5%) और प्री-डायबिटीज (17%) के आंकड़ों को जोड़ दें, तो हिमाचल प्रदेश की लगभग 31.5% (डॉ. मोक्ता के अनुसार लगभग 29% से 31%) आबादी का ब्लड शुगर लेवल सामान्य नहीं है. यह एक तिहाई आबादी के खतरे में होने का संकेत है. ये आंकड़े साबित करते हैं कि हिमाचल अब इस 'महा-बीमारी' का हॉटस्पॉट बन रहा है.
90 के दशक से अब तक क्या-क्या बदला?
डॉ. मोक्ता पुरानी यादों को ताजा करते हुए एक बड़ा बदलाव रेखांकित करते हैं. वह कहते हैं, "90 के दशक में मेरे गांव में एक भी व्यक्ति डायबिटिक नहीं था. लेकिन आज स्थिति यह है कि हर घर में कोई न कोई इस बीमारी से ग्रसित है." महज तीन दशकों में ऐसा क्या बदल गया? हिमाचल के लोग अभी भी मेहनतकश माने जाते हैं, फिर यह बीमारी कैसे घर कर गई? इसके पीछे डॉ. मोक्ता कई प्रमुख कारण बताते हैं.

शारीरिक श्रम में भारी कमी (Physical Inactivity): भले ही हम कहें कि हम पहाड़ी हैं और चलते-फिरते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मशीनीकरण और आधुनिकता ने हमारे जीवन को सुस्त बना दिया है.
बचपन कैद हो गया: पहले बच्चे मिलों पैदल स्कूल जाते थे, शाम को मैदानों में खेलते थे. आज बच्चा स्कूल बस (गाड़ी) में जाता है. स्कूल से आते ही टीवी, मोबाइल या वीडियो गेम में खो जाता है. खेलकूद और शारीरिक गतिविधियां शून्य हो गई हैं.
बड़ों का जीवन आसान: पहले महिलाएं हाथ से कपड़े धोती थीं, पानी भरकर लाती थीं. अब वॉशिंग मशीन है, हर घर में नल है. खेतों में काम करने वाले लोग कम हो गए हैं.
गाड़ियों का बढ़ता उपयोग: छोटी-छोटी दूरी के लिए भी अब पैदल चलने के बजाय दोपहिया या चौपहिया वाहनों का इस्तेमाल हो रहा है. अन्य राज्यों के मुकाबले हम (हिमाचली) आज भी शायद ज्यादा चलते हों, लेकिन हमारे अपने पास्ट (अतीत) के मुकाबले हमारे शारीरिक श्रम में भारी कमी आई है.
खान-पान में 'जहर' का प्रवेश (Bad Foods): डॉ. मोक्ता अपना एक अनुभव साझा करते हैं. वह बताते हैं, "2005 में मैं काजा (लाहौल-स्पीति जिले का सुदूर क्षेत्र) में पोस्टेड था. उस समय भी, इतने दुर्गम इलाके में कुरकुरे, पैकेटबंद जूस, कोल्ड ड्रिंक और बर्गर आसानी से उपलब्ध थे. यह दर्शाता है कि 'वेस्टर्नाइज्ड फूड' हिमाचल के गांव-गांव तक पहुंच गया है. पहले लोग कोदरा, जौ, मक्की और स्थानीय सब्जियां खाते थे. अब उनकी जगह मैदा, सफेद चावल, और फास्ट फूड ने ले ली है."
काज़ा दुनिया भर में क्यों है मशहूर?
काज़ा, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्पीति नदी के किनारे स्थित एक प्रमुख प्रशासनिक शहर है. काज़ा, लाहौल और स्पीति का उप-मंडल मुख्यालय है. इस क्षेत्र में पर्यटन का प्रमुख आधार है. यह 11,980 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. दुनिया का सबसे ऊंचा पेट्रोल पंप (3650 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर) भी काज़ा में स्थित है. यह प्रसिद्ध स्पीति घाटी का सांस्कृतिक एवं कमर्शियल सेंटर है, जो अपने ठंडे मरुस्थलीय वातावरण, अद्भुत भौगोलिक परिदृश्य और प्राचीन के लिए जाना जाता है. इसके पास में ही दुनिया का सबसे ऊंचा पोस्ट ऑफिस (हिक्किम) है.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड: बिस्कुट, नमकीन, भुजिया, समोसा- ये सब 'बैड शुगर' के स्रोत हैं. डॉ. मोक्ता स्पष्ट करते हैं कि पैकेटबंद फ्रूट जूस भी शुगर ही है. समोसा सिर्फ मैदा नहीं, बल्कि शरीर में जाकर शुगर में ही बदलता है.
तनाव और नींद की कमी (Stress & Lack of Sleep): डॉ. मोक्ता कहते हैं, आधुनिक जीवनशैली अपने साथ मानसिक तनाव लेकर आई है. गांवों से शहरों की ओर पलायन और वहां की 'फास्ट लाइफ' ने पहाड़ियों की मानसिक सेहत बिगाड़ दी है. डॉ. मोक्ता के अनुसार, हर घर में अब किसी न किसी बात का तनाव है और लोगों की नींद की गुणवत्ता खराब हुई है, जो डायबिटीज का एक बड़ा कारण है.

'थिन-फैट इंडियंस' (Thin-Fat Indians) का फेनोमेना
डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता के अनुसार, हिमाचलियों के लिए यह शब्द बहुत सटीक बैठता है. दिखने में पहाड़ी लोग पतले लगते हैं, लेकिन उनके पेट के आसपास चर्बी (Visceral Fat) जमा होती है. सर्वे के अनुसार, 45% हिमाचली लोग दिखने में पतले होने के बावजूद 'अनहेल्दी' (Unhealthy) की श्रेणी में आते हैं. यह अंदरूनी चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करती है और डायबिटीज का कारण बनती है.
जेनेटिक्स और गर्भावस्था: क्या हम आने वाली पीढ़ी को 'बीमार' बना रहे हैं?
पाठकों का एक बड़ा सवाल होता है कि क्या यह बीमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी (Generation to Generation) चलती है? और क्या गर्भवती महिलाओं में शुगर का स्तर बढ़ना आने वाली नस्लों के लिए खतरा है? डॉ. मोक्ता इन सवालों का विस्तार से जवाब दिया है
1. जेनेटिक्स का रोल: हां, टाइप 2 डायबिटीज में आनुवंशिकी की बड़ी भूमिका है. यदि माता-पिता दोनों को डायबिटीज है, तो बच्चे को यह बीमारी होने का खतरा बहुत अधिक (लगभग 70-80%) हो जाता है. यदि एक को है, तो खतरा थोड़ा कम होता है, लेकिन रहता है.
2. गर्भावधि मधुमेह (Gestational Diabetes) एक बड़ा खतरा: आजकल गर्भवती महिलाओं में शुगर का स्तर अचानक बढ़ जाना (जेस्टेशनल डायबिटीज) एक बहुत बड़ी और गंभीर समस्या बन गई है. डॉ. मोक्ता चेतावनी देते हैं, "यह न केवल मां के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी जन्म से ही 'बीमार' बना रहा है." यदि गर्भावस्था के दौरान मां का शुगर लेवल अनियंत्रित रहता है, तो पेट में पल रहे बच्चे का वजन असामान्य रूप से बढ़ सकता है. ऐसे बच्चों को जन्म के समय तो खतरा होता ही है, लेकिन इससे भी बड़ा खतरा यह है कि इन बच्चों में भविष्य में (किशोरावस्था या युवावस्था में) मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और ब्लड प्रेशर होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.

3. एक मां को किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?
डॉ. मोक्ता सलाह देते हैं कि, एक गर्भवती महिला को अपनी और अपने होने वाले बच्चे की सुरक्षा के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए. इनमें नियमित स्क्रीनिंग जैसे गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों से ही नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच (GTT - Glucose Tolerance Test) करवानी चाहिए. संतुलित आहार जैसे मीठे, मैदा और प्रोसेस्ड फूड से पूरी तरह परहेज करें. डॉक्टर और डायटीशियन की सलाह के अनुसार ही डाइट चार्ट फॉलो करें. हल्का व्यायाम, डॉक्टर की सलाह से हल्की सैर या योगासन जारी रखें. इसके साथ ही तनाव मुक्त रहें. मां का मानसिक स्वास्थ्य बच्चे के विकास के लिए बहुत जरूरी है.
डायबिटीज में टाइप 1 से टाइप 5 क्या है?
आमतौर पर लोग सिर्फ टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज के बारे में ही जानते हैं. लेकिन चिकित्सा विज्ञान अब इसे और अधिक सूक्ष्मता से वर्गीकृत करता है. डॉ. मोक्ता ने बताया कि, अब डायबिटीज के स्टेज टाइप 1 से टाइप 5 तक माने जाते हैं, और 2024 तक इस पर और अधिक स्पष्टता आई है.

टाइप 1 डायबिटीज (Type 1 Diabetes): यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है. इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम ही पैंक्रियास की उन कोशिकाओं (Beta Cells) को नष्ट कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं. शरीर में इंसुलिन बिल्कुल नहीं बनता. मरीज को जीवित रहने के लिए बाहर से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने ही पड़ते हैं. यह आमतौर पर बच्चों या युवाओं में पाई जाती है. विश्व में इसकी औसत उम्र 29 साल के आसपास देखी गई है.
टाइप 2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes): यह सबसे आम प्रकार है. हिमाचल प्रदेश में भी टाइप 2 के ही सबसे ज्यादा केसेस हैं. इसमें शरीर इंसुलिन तो बनाता है, लेकिन या तो वह पर्याप्त नहीं होता या शरीर की कोशिकाएं उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं (इंसुलिन रेजिस्टेंस). इसका मुख्य कारण मोटापा, खराब जीवनशैली, जंक फूड और शारीरिक श्रम की कमी है. यह अब युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही है.
टाइप 3 से टाइप 5 (The New Classifications): मेडिकल साइंस ने हाल के वर्षों में (खासकर 2024 तक) टाइप 2 डायबिटीज को उसके कारणों और गंभीरता के आधार पर और अधिक सूक्ष्मता से विभाजित किया है.
टाइप 3 (Severe Insulin Deficient Diabetes - SIDD): यह टाइप 2 का वह रूप है, जहां इंसुलिन की बहुत ज्यादा कमी हो जाती है, लेकिन यह ऑटोइम्यून नहीं होता (टाइप 1 की तरह). इन मरीजों को जल्दी इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है और इनमें आंखों (Retinopathy) की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है.
टाइप 4 (Severe Insulin Resistant Diabetes - SIRD): इस प्रकार में इंसुलिन तो बहुत बनता है, लेकिन शरीर उस पर प्रतिक्रिया नहीं करता. यह अक्सर बहुत ज्यादा मोटापे (Obesity) से जुड़ा होता है. इन मरीजों में किडनी की बीमारी (Nephropathy) और लिवर की समस्याओं का खतरा सबसे ज्यादा होता है.
टाइप 5 (Mild Age-Related Diabetes - MARD): यह टाइप 2 का सबसे 'हल्का' रूप माना जाता है. यह आमतौर पर उम्र बढ़ने (बुजुर्गों) के साथ होता है. इसमें शुगर लेवल बहुत ज्यादा नहीं बढ़ता और जटिलताएं (Complications) भी धीरे-धीरे विकसित होती हैं. इसे लाइफस्टाइल और हल्की दवाओं से मैनेज किया जा सकता है.
'साइलेंट किलर' के लक्षण और अंगों पर 'हमला'
डॉ. मोक्ता एक और डरावना तथ्य साझा करते हैं, "हिमाचल में एक सर्वे के अनुसार, 60 से 70 प्रतिशत लोगों में डायबिटीज का कोई लक्षण (Symptom) ही नहीं होता." अक्सर लोगों को तब पता चलता है जब वे किसी अन्य बीमारी या सर्जरी के लिए ब्लड टेस्ट करवाते हैं. इसलिए इसे 'साइलेंट किलर' कहा जाता है. फिर भी, डॉ. मोक्ता 5 मुख्य लक्षण बताते हैं जिन्हें कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए.
अत्यधिक प्यास लगना (Polydipsia): बार-बार गला सूखना और पानी पीने की इच्छा होना.
बार-बार पेशाब आना (Polyuria): खासकर रात के समय बार-बार टॉयलेट जाना.
अत्यधिक भूख लगना (Polyphagia): खाना खाने के तुरंत बाद फिर भूख महसूस होना.
अकारण वजन कम होना (Unexplained Weight Loss): बिना डाइट या एक्सरसाइज के तेजी से वजन गिरना.
अत्यधिक थकान और आलस (Fatigue & Laziness): हर समय कमजोरी महसूस होना और काम में मन न लगना.
शुगर कंट्रोल न हो, तो किन अंगों पर सबसे पहले 'हमला' होता है?
डॉ. मोक्ता आगाह करते हुए कहते हैं, यदि शुगर लेवल लगातार हाई रहता है, तो यह शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंचाता है. सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं:

आंखें (Retinopathy): धुंधला दिखना और धीरे-धीरे रोशनी चले जाने का खतरा.
किडनी (Nephropathy): किडनी का काम करना बंद कर देना, जिससे डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की नौबत आ सकती है.
दिल (Heart): हार्ट अटैक और स्ट्रोक (लकवा) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
नसें (Neuropathy): पैरों में सुन्नपन, जलन या चोट लगने पर घाव न भरना, जिससे पैर काटने (Amputation) तक की नौबत आ सकती है.
डॉ. मोक्ता एक महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि, भारत में औसतन 51 साल की उम्र में ही प्राकृतिक बीमारियां (जैसे डायबिटीज) होने लगती हैं, जबकि अमेरिका (US) में यह उम्र 65 साल है. हम अमेरिका से 14 साल पहले ही बीमार हो रहे हैं, जो हमारी युवा पूंजी के लिए एक बड़ा नुकसान है.
मिथ vs हकीकत - क्या करेले का जूस ही इलाज है?
समाज में डायबिटीज को लेकर कई गलतफहमियां फैली हुई हैं. सबसे बड़ी गलतफहमी खान-पान को लेकर है.
1. "कार्बोहाइड्रेट का जाल"
हिमाचल में 70 से 80% लोग कार्बोहाइड्रेट ही खाते हैं. डॉ. मोक्ता स्पष्ट करते हैं कि सफेद चावल (Rice) - कार्बोहाइड्रेट है. मैदे का परांठा - कार्बोहाइड्रेट है
समोसा - कार्बोहाइड्रेट और बैड फैट है. ये सभी चीजें शरीर में जाकर अंततः शुगर में ही टूटती हैं.
2. "करेले के जूस का मिथक"
डॉ. मोक्ता से जब पूछा गया कि, क्या करेले का जूस पीने से वाकई सब ठीक हो जाता है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ एक मिथक (Myth) है. करेले या मेथी का पानी शुगर कंट्रोल में 'थोड़ी मदद' (Auxiliary help) कर सकता है, लेकिन यह दवाओं का विकल्प बिल्कुल नहीं है. कई मरीज सिर्फ घरेलू नुस्खों के भरोसे दवाएं छोड़ देते हैं और गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचते हैं.

'देसी सुपरफूड्स' और लाइफस्टाइल
डॉ. मोक्ता का मानना है कि, दवाओं के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव ही इस बीमारी को हराने का एकमात्र तरीका है. हमें अपने पूर्वजों की आदतों की ओर लौटना होगा.
शुगर कंट्रोल करने वाले 'देसी सुपरफूड्स' और सही आहार
डॉ. मोक्ता ने अनहेल्दी फूड (बिस्कुट, नमकीन, जूस) को छोड़कर इन चीजों को अपनाने की सलाह दी है. उन्होंने कहा है, हरी सब्जियां (Vegetables)- ज्यादा से ज्यादा मौसमी सब्जियां खाएं. साबुत अनाज (Whole Grains)- सफेद आटे के बजाय जौ, बाजरा, कोदरा या चोकरयुक्त गेहूं का आटा इस्तेमाल करें. सूखे मेवे (Dry Fruits & Nuts)- बादाम, अखरोट आदि सीमित मात्रा में लें. दालें (Pulses/Dales)- प्रोटीन के लिए बेहतर स्रोत हैं. डेयरी उत्पाद (Dairy Products)- दूध, दही, पनीर (कम फैट वाला) सेवन करें.

लाइफस्टाइल में बदलाव
डॉ. मोक्ता कहते हैं कि, शुगर कंट्रोल करने के लिए मोटापा कम करें. जिन लोगों का वजन ज्यादा है, उनमें खतरा सबसे ज्यादा है. वजन कम करने से शुगर लेवल में चमत्कारी सुधार होता है. तनाव प्रबंधन- योग, प्राणायाम और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएं. इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि- प्रतिदिन कम से कम 45 मिनट तेज सैर (Brisk Walk) या कोई भी कसरत करें.
डॉ. जितेंद्र मोक्ता कहते हैं, "मुझे सबसे ज्यादा चिंता आने वाली जनरेशन (पीढ़ी) की है. बच्चों के पास खेलने के लिए न तो मैदान (Playgrounds) बचे हैं और न ही समय. वे सिर्फ कुरकुरे और जंक फूड खा रहे हैं. 2008 में जहां 85% पुरुष डायबिटिक थे, वहीं आज के समय में 55% महिलाएं डायबिटिक हैं. यह बीमारी अब जेंडर और क्लास (अमीर-गरीब) का भेद मिटा चुकी है. यह अब अमीरों की नहीं, हर घर की बीमारी है. अगर आप 30 साल से ऊपर के हैं, तो साल में कम से कम एक बार ब्लड शुगर का टेस्ट जरूर करवाएं, चाहे आपको कोई लक्षण हो या न हो और अगर आपमें वो 5 लक्षण (ज्यादा प्यास, ज्यादा भूख, ज्यादा पेशाब, वजन कम होना, थकान) दिख रहे हैं तो देर न करें और तुरंत डॉक्टर से सलाह लें."
'डायबिटीज: बचाव में ही बचाव है'
वहीं, डॉ. राजेश कश्यप (प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, मेडिसिन विभाग, MMU मेडिकल कॉलेज, सोलन) ने इस महा-बीमारी पर आम जनता के लिए एक मार्गदर्शक पुस्तक लिखी है, "डायबिटीज: बचाव में ही बचाव है". डॉ. कश्यप कहते हैं, "हिमाचल के लोग अब पहले जैसे नहीं रहे. पहले लोग मीलों पैदल चलते थे, आज हर किसी के पास अपनी गाड़ी है. छोटे से काम के लिए भी हम पैदल चलना भूल गए हैं. यह सुस्ती ही बीमारियों की जड़ है. यह केवल हिमाचल या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक 'इंटरनेशनल बीमारी' बन चुकी है जिसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है."
पुस्तक की मुख्य बातें और डॉ. कश्यप का विज़न
जागरूकता ही सबसे बड़ी दवा: डॉ. राजेश कश्यप का मानना है कि डायबिटीज लाइलाज नहीं है, बल्कि इसे सही जानकारी से 'मैनेज' किया जा सकता है. उनकी पुस्तक का मूल मंत्र है कि अगर हम डायबिटीज की बीमारी होने से पहले ही सावधान हो जाएं, तो अस्पताल जाने की नौबत ही नहीं आएगी.

हिमाचली जीवनशैली पर केंद्रित: पुस्तक में विशेष रूप से पहाड़ी परिवेश, यहां के खान-पान और बदलती आदतों का जिक्र किया गया है. डॉ. कश्यप ने विस्तार से बताया है कि कैसे हमारे पारंपरिक 'सिड्डू', 'बबरू' या 'अंकली' जैसे पकवानों के साथ-साथ अब जंक फूड का मेल हमारी सेहत बिगाड़ रहा है.
इंसुलिन और दवाओं का डर दूर करना: समाज में इंसुलिन को लेकर बहुत डर है. डॉ. कश्यप ने अपनी किताब के जरिए इस भ्रम को तोड़ा है और बताया है कि कब दवाएं और कब इंसुलिन जीवन रक्षक साबित होते हैं.
व्यायाम और मानसिक स्वास्थ्य: पुस्तक में केवल डाइट ही नहीं, बल्कि 'मानसिक तनाव' (Stress) और 'योग' की भूमिका पर भी विशेष अध्याय दिए गए हैं. उनका कहना है कि शांत मन, शुगर कंट्रोल करने की पहली सीढ़ी है.
आम जनता के लिए गाइड: यह किताब केवल मरीजों के लिए नहीं, बल्कि उन स्वस्थ लोगों के लिए भी है जो भविष्य में इस बीमारी से बचना चाहते हैं. इसमें 'अर्ली स्क्रीनिंग' (समय पर जांच) पर बहुत जोर दिया गया है.
डॉ. राजेश कश्यप अपनी पुस्तक में कहते हैं, "डायबिटीज को लेकर डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे समझने की जरूरत है. आपकी रसोई आपका पहला अस्पताल है और आपकी सक्रिय जीवनशैली आपकी सबसे बड़ी ढाल. याद रखें, डायबिटीज के मामले में बचाव में ही बचाव है."
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