PCOS सिर्फ एक 'हॉर्मोनल समस्या' नहीं, यह आपकी मेटाबोलिक और मानसिक सेहत पर भी डालता है बुरा असर
PCOS सिर्फ एक रीप्रॉडक्टिव समस्या नहीं है, बल्कि यह एक मेटाबॉलिक और हार्मोनल असंतुलन है. इसीलिए सिर्फ पीरियड्स लाने की दवा खा लेना इसका स्थाई...

Published : August 31, 2026 at 2:14 PM IST
ज्यादातर लोग जानते हैं कि पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) का असर पीरियड्स, ओव्यूलेशन और फर्टिलिटी पर पड़ सकता है. हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह स्थिति मेटाबोलिक और इमोशनल हेल्थ से भी जुड़ी है. PCOS सिर्फ पीरियड्स या फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या नहीं है. यह हार्मोनल असंतुलन के कारण होने वाली एक गंभीर मेटाबोलिक स्थिति है. इसका असर बच्चे पैदा करने की उम्र बीत जाने के बाद भी सेहत पर पड़ सकता है. असल में, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) PCOS को एक ऐसी मेटाबोलिक स्थिति मानता है जो बच्चे पैदा करने की उम्र के बाद भी बनी रह सकती है.
50-80 फीसदी महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या
सैफी हॉस्पिटल की ऑब्सटेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. निधि शर्मा चौहान बताती हैं कि PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) सिर्फ रिप्रोडक्टिव समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर एंडोक्राइन और मेटाबोलिक डिसऑर्डर है. स्टडीज से पता चलता है कि PCOS वाली लगभग 50 फीसदी से 80 फीसदी महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होती है, यानी शरीर इंसुलिन पर ठीक से प्रतिक्रिया नहीं देता, चाहे उनका वजन नॉर्मल हो या ज्यादा. इस स्थिति के कारण पेट के आसपास वजन बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है और समय के साथ टाइप 2 डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. हालांकि PCOS वाली हर महिला को ये खास समस्याएं नहीं होतीं, लेकिन इनसे जुड़े खतरों को देखते हुए सिर्फ पीरियड्स से जुड़े लक्षणों को मैनेज करने से आगे बढ़कर सोचना जरूरी है.
मेटाबॉलिक और मेंटल हेल्थ पर असर
डॉ. निधि शर्मा चौहान बताती हैं कि इर्रेगुलर पीरियड्स, मुंहासे, चेहरे पर अनचाहे बाल, वजन में उतार-चढ़ाव, या कंसीव करने में मुश्किल जैसी दिक्कतों के साथ जीना मेंटल और इमोशनल तौर पर बहुत भारी पड़ सकता है. कई औरतें अपने शरीर को लेकर फ्रस्ट्रेटेड महसूस करती हैं, लगातार अपने लुक को लेकर परेशान रहती हैं, या अपनी फर्टिलिटी को लेकर एंग्जायटी महसूस करती हैं. PCOS सेल्फ-कॉन्फिडेंस, बॉडी इमेज और पूरी जिंदगी की क्वालिटी पर असर डाल सकता है. इंटरनेशनल गाइडलाइंस में PCOS वाली महिलाओं की डिप्रेशन और एंग्जायटी के लिए स्क्रीनिंग करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ये समस्याएं अलग या गौण (secondary) नहीं, बल्कि कुल देखभाल का अहम हिस्सा हैं.
होलिस्टिक नजरिए की जरूरत
डॉ. निधि शर्मा चौहान बताती हैं कि PCOS सिर्फ प्रजनन से जुड़ी समस्या नहीं है. यह मेटाबॉलिज्म और हार्मोन के असंतुलन की समस्या है. इसलिए, सिर्फ दवा लेकर पीरियड्स लाना इसका पक्का समाधान नहीं है. इसे ठीक करने के लिए एक होलिस्टिक नजरिए की जरूरत होती है. हर व्यक्ति के हिसाब से इसमें हेल्थ चेक-अप, हेल्दी डाइट, शारीरिक गतिविधि, नींद और तनाव के स्तर पर ध्यान देना और मानसिक सेहत का ख्याल रखना शामिल हो सकता है. सबसे जरूरी बात यह है कि जीवनशैली में बदलाव को सजा के तौर पर नहीं देखना चाहिए और न ही इसे सिर्फ वजन घटाने तक सीमित रखना चाहिए. हेल्दी आदतें सेहत और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकती हैं, भले ही वजन घटाना मुख्य लक्ष्य न हो.
स्थिति की गंभीरता को जल्दी पहचानना जरूरी
डॉ. निधि शर्मा का कहना है कि शायद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव पीसीओएस के बारे में बात करने के तरीके में करने की जरूरत है. किसी महिला को अपनी स्थिति को गंभीरता से लिए जाने के लिए तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक कि वह गर्भवती होने की कोशिश न कर रही हो, उसका वजन न बढ़ रहा हो, या वह भावनात्मक परेशानी का सामना न कर रही हो. PCOS सिर्फ 'पीरियड्स से जुड़ी समस्या' नहीं है. यह लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य स्थिति है जिसमें शरीर, मेटाबॉलिज्म और मन पर ध्यान देने की जरूरत होती है.
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और सुझाव केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हैं. हम यह जानकारी वैज्ञानिक शोध, अध्ययनों और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की अनुशंसाओं के आधार पर प्रदान कर रहे हैं. इन सुझावों का पालन करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करना सर्वोत्तम होगा.)

