क्या इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ से के कारण हो सकता है मुंह का कैंसर? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ
कुछ अक्ल दाढ़ें सामान्य रूप से निकलती हैं और अन्य दाढ़ों की तरह ही काम करती हैं. परेशानी तब शुरू होती है जब जबड़े में...

Published : July 22, 2026 at 7:03 PM IST
अक्ल दाढ़ (wisdom teeth) आमतौर पर 17 से 25 साल की उम्र के बीच निकलती हैं. चूंकि अक्सर जबड़े में इनके लिए पर्याप्त जगह नहीं होती, इसलिए ये अजीब कोणों पर निकल सकती हैं, मसूड़ों के अंदर फंसी रह सकती हैं (इम्पैक्टेड हो सकती हैं), या दर्द और संक्रमण का कारण बन सकती हैं, ऐसी समस्याएं जिनसे मुंह की सेहत से जुड़ी गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं. नतीजतन, लोग अक्सर इन्हें निकलवा देते हैं. हालांकि, कई लोग डॉक्टरों से पूछते हैं कि क्या अक्ल दाढ़ मुंह के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती हैं या इसके विकास में योगदान दे सकती हैं. इस सवाल का जवाब जानने के लिए इस खबर को पूरा पढ़ें...
अक्ल दाढ़ और मुंह के कैंसर के बीच संबंध
MRIIRS (फरीदाबाद) के मानव रचना डेंटल कॉलेज में ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के प्रोफेसर और हेड, डॉ. कुमार रक्षक आनंद के अनुसार का कहना है कि अक्ल दाढ़ सीधे मुंह के कैंसर का कारण नहीं बनती हैं. हालांकि, वे अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी स्थितियां बना सकती हैं जिनसे खतरा बढ़ जाता है. क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, अक्ल दाढ़, जिन्हें थर्ड मोलर्स भी कहा जाता है, बड़े होने पर निकलने वाले दांतों का आखिरी सेट होता है और ये मुंह के बिल्कुल पीछे होते हैं. इन्हें 'अक्ल दाढ़' इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये उस उम्र में निकलते हैं जब लोगों को मैच्योरिटी या अक्ल आ गई मानी जाती है. जब जबड़े में जगह कम होती है, तो वे इम्पैक्टेड (दब) हो जाते हैं, मतलब वे मसूड़ों के टिशू या हड्डी के नीचे फंसे रहते हैं. इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकती हैं जिनसे आखिर में मुंह का कैंसर हो सकता है.
इसे ऐसे समझें कि जब अक्ल दाढ़ मसूड़ों के नीचे फंस जाती हैं, तो पानी से भरी थैलियां बन सकती हैं. अगर इन थैलियों को नहीं हटाया जाता है, तो वे सख्त हो सकती हैं और ट्यूमर बन सकती हैं, जिससे मुंह का कैंसर या दूसरी गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम हो सकती हैं. इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ अपने आप में कैंसर नहीं होती हैं, उस जगह पर लगातार इन्फेक्शन या जलन मुंह के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है.
दबी हुई अक्ल दाढ़ मुंह के कैंसर का खतरा कैसे बढ़ाती है?
- क्रोनिक जलन: गाल या मसूड़ों से रगड़ने वाली दबी हुई अक्ल दाढ़ लगातार चोट या जलन पैदा कर सकती है. लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से टिशू में बदलाव हो सकते हैं.
- बैक्टीरियल इन्फेक्शन: जब खाने के कण और बैक्टीरिया मसूड़ों के नीचे जमा हो जाते हैं, तो वे टॉक्सिन बनाते हैं जो आस-पास के सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं.
- सिस्ट बनना: दबी हुई अक्ल दाढ़ के आसपास पानी से भरी थैलियां (डेंटीजरस सिस्ट) बन सकती हैं. हालांकि ये आमतौर पर बिनाइन (नॉन-कैंसरस) होती हैं, लेकिन अगर इनका इलाज न किया जाए, तो कुछ सिस्ट खतरनाक हो सकते हैं या जबड़े के दुर्लभ ट्यूमर में बदल सकते हैं.
- कमजोर इम्यून डिफेंस: क्रोनिक सूजन लोकल इम्यूनिटी को कमजोर करती है, जिससे कैंसर से पहले के बदलाव आसानी से हो जाते हैं.
- कैनेडियन कैंसर सोसाइटी की रिसर्च में क्रोनिक जलन और इन्फेक्शन को मुंह के कैंसर के संभावित रिस्क फैक्टर के रूप में पहचाना गया है, खासकर जब इसके साथ स्मोकिंग, शराब पीना या HPV का संपर्क हो.
अक्ल दाढ़ निकलवाने के बाद क्या बदलाव होते हैं?
अक्ल दाढ़ निकलवाना एक आम ओरल सर्जरी है. इस प्रोसेस से जुड़े कुछ खास बदलाव और फायदे इस तरह हैं...
दर्द: कुछ दिनों तक दांत के आस-पास हल्का दर्द और सूजन रहेगी. इसे सही दवा से मैनेज किया जा सकता है. कुछ घंटों तक हल्की ब्लीडिंग भी हो सकती है. कुछ मामलों में, अगर खून ठीक से जम नहीं पाता है, तो 'ड्राई सॉकेट' नाम की दर्दनाक कंडिशन हो सकती है.
फायदे: यह अक्ल दाढ़ की वजह से होने वाले पुराने दर्द और परेशानी से राहत देता है. यह बार-बार होने वाले मसूड़ों के इन्फेक्शन (पेरिकोरोनाइटिस) और उससे जुड़ी सूजन को कम करता है. यह कैविटी और मसूड़ों की बीमारी का खतरा कम करता है.
यह अक्ल दाढ़ की वजह से आस-पास के दांतों को होने वाले नुकसान से बचाता है. यह जबड़े के सही विकास में मदद करता है और दूसरे दांतों को गलत अलाइनमेंट में आने से रोकता है. यह ओरल कैंसर का खतरा कम करता है. आसान शब्दों में, दांत निकलवाने के बाद कुछ समय के लिए थोड़ी परेशानी हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले फायदे आपके ओरल हेल्थ और हाइजीन में काफी सुधार करेंगे, साथ ही दर्द से भी राहत देंगे.

